देखिये जूनागढ़ के आगे से निकलती गणगौर की शाही यात्रा और विभिन्न जगहों से प्राप्त हुए गवर के फोटो बीकानेर के जूनागढ़ से परम्परागत तरीके से गणगौर की शाही सवारी निकली । शाही गणगौर के आगे राजपरिवार के बेंड की स्वर लहरिया वातावरण को गणगौर मय बना रहा था । शाही अंदाज में शाही बैंड और उसमे राजपरिवार के लोग भी सामिल हुवे ये शाही सवारी चौतीना कुआ तक पहुची और चौतीना कुआ पर शहर के विभिन्न इलाको से भी लोग अपनी अपनी गणगौर की मूर्तियाँ लेकर पहुचे । जहा…
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क्यों शुरू हुई घुड़ला प्रथा जाने इसके पीछे की ऐतिहासिक घटना
गणगौर के दिनों में शाम के वक्त गली मौहल्ले मे घुड़ला घुमाने की प्रथा चली आ रही हैं जिसे कुंवारी कन्याऐं जो गवर पूजती हैं वो शाम के वक्त एक मिट्टी के बर्तन मे दिपक जलाकर गीत गाती हुई चलती है । इसके बारे मे विस्तृत रूप मे पहले बताया जा चुका हैं । यह परम्परा क्यों चालू हुई इसके पीछे भी एक ऐतिहासिक घटना है जिसका उल्लेख कई किताबों कहानियों मे मिलता हैं । बात लगभग 500 वर्ष पूर्व अजमेर के सूबेदार के सैनिकों ने कोसाणा गांव (जोधपुर) की…
Read Moreम्हारौ तेल बलै घी घाल, घुडलो घुमे छै जी घुमै छै
गणगौर के दिनों में शीतला अष्टमी से शुरू होकर तीज तक गली गुवाड़ मे अविवाहित कन्याओं को घुड़ला लेकर घुमते हुए देखा जा सकता हैं । घुड़ला एक मिट्टी से बना बर्तन एक गले की तरह होता हैं जिसके अंदर मिट्टी बिछाई हुई रहती है और घी या तेल का दिपक जलाया जाता है । गणगौर के 7 दिन बाद से ही ऐसा नजारा देखा जा सकता हैं कि गवर पूजने वाली कन्याऐं शाम के वक्त घुड़ला लेकर निकलती हैं और आस-पास पड़ोस के घरों के आगे जाकर यह गीत…
Read Moreजाने राजस्थान के लोकप्रिय त्यौहार गणगौर के बारे में
गणगौर राजस्थान के सबसे लोकप्रिय त्यौहारों मे से एक है । गणगौर का त्यौहार होली के अगले दिन ही यानि चैत्र की एकम से शुरू हो जाता हैं और अमावस्या के बाद की तीज तक मनाया जाता हैं । गणगौर मे गवर और इश्वर जी को पूजा जाता हैं । इस पूजा मे गवर यानि माता गौरी का रूप और इश्वर जी यानि भगवान शिव का रूप माना गया हैं । तीज तक चलने वाले इस त्यौहार मे यह माना जाता है कि हर वर्ष 16 दिन के लिए गवर…
Read Moreदेखे रम्मतों, हर्षो व्यासो के पानी के खेल, डांडिया और फागानिया फुटबॉल के फोटो ….
रविवार को शहर में विभिन्न जगह होली के रंग देखने को मिले । शुबह बारह गुवाड़ में स्वांग मेहरी रम्मत का आयोजन हुआ तो रात को आचार्यों के चौक में अमर सिंह राठौर की रम्मत का मंचन । वही दोपहर २ बजे हर्षो के चौक में हर्ष-व्यास जाती पानी खेल खेल गया जिसे डोलची मार खेल भी कहा जाता है । इसमें हर्ष और व्यास जाती के लोग डोलची में पानी भर कर एक दुसरे पर फेंकते है । इसे देखने हज़ारों की संख्या में लोग पहुचे जो भी पानी…
Read Moreजाने क्या और क्यों होती है रम्मतें …
रम्मत का अर्थ सामान्य शब्दों में रम्मने यानि खेलने से बना है । अगर आज की भाषा में बात करें तो एक प्रकार का नुक्कड़ नाटक । बीकानेर में स्वांग -मेहरी, हेडाऊ-मेहरी, शहजादी-नव टंकी, अमरसिंह – राठौड़, की मुख्य रम्मतें होती है । ये किसी ना किसी कहानी से जुडी हुई होती है और इसमें वास्तविक कहानी के साथ-साथ लोग अपनी हसी-मजाक और ख्याल तथा चौमासे भी गाते है । यहाँ हर रम्मत से पहले अखाड़े में भगवन गणपति या फिर आशापुरा माता आतें है और उस समय लोगों की…
Read Moreव्यास जाति की गेर आज, बीन को पोखने और हाथ काम की भी निभाई जाति है परम्परा
व्यास जाति की गेर आज शाम निकाली जाएगी । गेर हर साल की ही भांति व्यासो के चौक से रवाना होकर शहर घुमती हुई हर्षो के चौक पहुचती है । गेर में बीन बने बहरूपिये को ले जाया जाता है और और विभिन्न चौक से गुजरने के बाद हर्षो के चौक में पहुच कर वास्तविकता में खातिरदारी भी की जाति है । यही नहीं बल्कि दुल्हे का हाथकाम, पोखना आदि की परम्परा भी निभाई जाति है । दरअसल ये परम्परा होली पर कई बरसो से निभाई जा रही है ।…
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