पशु पक्षियों की अठखेलियों से पता चल जाता है बारिश कब होगी

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सेटेलाइट से हमारे मौसम विभाग द्वारा वर्तमान समय में बारिश पर भविष्यवाणी की जाती है। लेकिन जब आज का आधुनिक सिस्टम नही था विज्ञान नही था तब भी हमारे बुजुर्ग भी अनूठे तरीकों से अनुमान लगा लेते थे और आज भी गांवों में बड़े बुजुर्ग कई तरीकों से बारिश का अनुमान बता देते है। पारंपरिक तरीके से बुजुर्ग कीट, पतंग, पशु व पक्षियों के व्यवहार से ही बरसात का अनुमान लगा लेते थे और आज भी बुजुर्गो से ये तरीके सुनने को मिल जाते है। प्रकृति को लगातार महसूस करने…

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एक ऊंठा ऊंठा बी ऊंठा साढ़े सात – मारजाओ के पहाड़े और पढ़ाने के तरीके

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एक ऊंठा ऊंठा बी ऊंठा साढ़े सात – मारजाओ के पहाड़े और पढ़ाने के तरीके आज की पीढ़ी को ये समझ ही नहीं आयेगा कि ये ऊंठा – ढूंचा क्या है ये कौनसा पहाड़ा होता है ? लेकिन हमारी पिछली पीढ़ियों ने पढ़ाई ही इन तरीकों से की है गणित के पहाड़ों को याद इसी तरीके से किया है। इसलिए पिताजी दादाजी को हिसाब के लिए कैलकुलेटर की जरूरत ही नहीं पड़ी। कोई भी हिसाब हो पॉइंट्स का हो या लाखों का आज भी मुखजुबानी कर देते है। हमें कोई…

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‘घी’ ढुळे तो कोई बात नीं, ‘पानी’ ढुळे तो म्होरो जी बळे”

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याद आने लगे बीकानेर के कुएं ! ‘घी’ ढुळे तो कोई बात नीं,’पानी’ ढुळे तो म्होरो जी बळे” बीकानेर शहर में इन्दिरा गांधी नहर (पूर्व में राजस्थान नहर/गंग नहर) से पहले पानी का स्रोत तालाब, कुण्ड, बावड़ी व कुएं ही थे। बीकानेर में लगभग 50 से अधिक कुए थे। कुछ रियासत ने और कुछ धनाढ्य लागों या समूह द्वारा बनाए गए थे। कुछ कुए पूर्ण बन्द हो गए, कुछ अभी भी सम्भवतः चालू है और कुछ को चालू किया जा सकता है ऐसी अवस्था मे भी है। कुछ अतिक्रमण से…

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रमक झमक संस्थान द्वारा ‘मारजाओं’ का हुआ सम्मान

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बीकानेर 2 मई। संभागीय आयुक्त व राजस्थानी भाषा अकादमी अध्यक्ष डाॅ. नीरज कुमार पवन ने कहा कि शिक्षक अपने शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। डाॅ. पवन सोमवार को रमक झमक संस्थान की ओर से नगर स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में संस्थान परिसर में पुरातन शिक्षा प्रणाली के शिक्षकों ‘मारजाओं’ के अभिनंदन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। डाॅ. पवन ने कहा कि बीकानेर की पौषवालों में ‘मारजाओं’ द्वारा विद्यार्थियों को बेहतरीन शिक्षा प्रदान की जाती थी।…

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जानिए स्थापना दिवस पर चंदा उड़ाने से लेकर खिचड़ा बनाने व मटकी पूजन की परंपरा के बारे में

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बीकानेर को राती घाटी, जांगल प्रदेश, उंटो का प्रदेश, धर्मनगरी का शहर कहा जाता है। इस वर्ष बीकानेर शहर अपना 535 वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस शहर की स्थापना राव बीकाजी द्वारा 1488 ई में करणी माता के आशीर्वाद से हुई थी। बीकाजी ने अपने पिता के राज्य के राज पाठ को छोड़ ये नया शहर बीकानेर बसाया था। आखाबीज के दिन राव बीकाजी ने बीकानेर शहर की स्थापना की थी। उस समय से शहर में चंदा उड़ाने से लेकर हर घर में खिचड़ा, इमलानी, बड़ी की सब्जी,…

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बीकानेर की ‘पौषवाळ’ और बीकानेर के ‘मारजा’

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बीकानेर शहर में शिक्षा प्राप्त करने के लिये उन दिनों पौषवाळ हुआ करती थी। जिसमें महाजनी पद्धति चलती थी। बाणिका पढ़ाया जाता और साथ साथ हिंदी भी पढ़ाते। (गंगाशाही पट्टो बहियो में लिखावट बाणिका में ही है) । मुख्य रूप से पहाड़ों पर ज्यादा जोर दिया जाता। छुट्टी से पहले पहाड़ों की मालनी बोलाई जाती थी। पहाड़ो में 1 से 40 तक पेली कक्षा तक सीख जाते, फिर सवाया, डोढ़ा, पूणा, ढुंचा और उण्ठा के पहाड़े होते। पौषवाळ में मारजा से पढ़े कुछ शिष्य आज भी है जो मौखिक हिसाब…

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जानिए कैसे हुई बीकानेर की स्थापना

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पिछली 5 सदियों से भी अधिक समय से अपनी संस्कृति की जड़ों से जुड़ा बीकानेर शहर हर वर्ष आखाबीज के दिन अपने जन्मदिन यानी स्थापना दिवस को मनाता है। इस शहर की स्थापना राव बीकाजी ने अक्षय तृतिया से एक दिन पहले करणी माता के आशीर्वाद से की थी। राव बीकाजी जोधपुर के राजा राव जोधा के सबसे बड़े पुत्र थे और राजवंश की परंपरा के तौर पर वे अगले जोधपुर के राजा होते लेकिन ऐसा न होकर उन्होंने नया शहर बसाने का निर्णय क्यों लिया आइए जानते है। पिता…

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