एक ऊंठा ऊंठा बी ऊंठा साढ़े सात – मारजाओ के पहाड़े और पढ़ाने के तरीके

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एक ऊंठा ऊंठा बी ऊंठा साढ़े सात – मारजाओ के पहाड़े और पढ़ाने के तरीके

आज की पीढ़ी को ये समझ ही नहीं आयेगा कि ये ऊंठा – ढूंचा क्या है ये कौनसा पहाड़ा होता है ? लेकिन हमारी पिछली पीढ़ियों ने पढ़ाई ही इन तरीकों से की है गणित के पहाड़ों को याद इसी तरीके से किया है। इसलिए पिताजी दादाजी को हिसाब के लिए कैलकुलेटर की जरूरत ही नहीं पड़ी। कोई भी हिसाब हो पॉइंट्स का हो या लाखों का आज भी मुखजुबानी कर देते है। हमें कोई पूछ ले की 1.75 पैसे की चीज कोई 5 लेनी हो तो एकबार दिमाग की बत्ती गुल हो जाती है फिर सायद हम जवाब दे पाए मुमकिन है की इसके लिए भी मोबाइल में कैलकुलेटर खोल ले। लेकिन 85 वर्ष के मारजा इसमें 1 सैकंड का वक्त भी नहीं लेते क्युकी उनको सवाया, डेढ़ा, पूणा के पहाड़े याद है।

 ‘पौषवाळ’ और ‘मारजा’

शिक्षा प्राप्त करने के लिये उन दिनों स्कूल नही बल्कि पौषवाळ हुआ करती थी और पौषवाळ में पढ़ाने वाले शिक्षकों को मारजा कहा जाता था। गणित विषय के पहाड़ों को ‘ मालनी’ बोला जाता था छुट्टी से पहले सभी को मालनी बोलवाई जाती थी। मालनी को बोलने का तरीका ऐसा होता कि सभी बच्चे एकसाथ मजे से बोलते और जब कठिन पहाड़ा 18 का आता तो बोल और संगीत ऐसे निकलता था की सभी बच्चे इस पहाड़े पर नाचने लगते। श्री बद्री मारजा कहते है कि उन दिनों पौषवाळ में गुरु शिष्य परम्परा देखी जा सकती थी। मारजा और शिष्यों का मन निर्मल था गुरु के प्रति सम्मान का भाव था। पौषवाळ में प्रवेश व निकलते सब शिष्य मारजा के पैर छूते।

मारजाओं के अनोखे किस्से अनुभव और पहाड़े

मारजाओं ने रमक झमक के साथ अपने कई अनुभव वीडियो में शेयर किए है उन्होंने उस समय बोले जाने वाले पहाड़े बताए चुटकियों में हिसाब कर बताया। उस समय गाई जाने वाली ‘ काल चिड़ी ए काल चिड़ी’ कविता बताई और आज की पढ़ाई और उस समय की पढ़ाई में अंतर को बताया। ये वीडियो आपको जरूर देखना चाहिए इनके अनुभव से जरूर कुछ सीखने को मिलेगा। आप रमक झमक की हर पोस्ट से जुड़े रहने के लिए हमारे फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल से जरूर जुड़े।

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