बीकानेर की ‘पौषवाळ’ और बीकानेर के ‘मारजा’

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बीकानेर शहर में शिक्षा प्राप्त करने के लिये उन दिनों पौषवाळ हुआ करती थी। जिसमें महाजनी पद्धति चलती थी। बाणिका पढ़ाया जाता और साथ साथ हिंदी भी पढ़ाते। (गंगाशाही पट्टो बहियो में लिखावट बाणिका में ही है) । मुख्य रूप से पहाड़ों पर ज्यादा जोर दिया जाता। छुट्टी से पहले पहाड़ों की मालनी बोलाई जाती थी। पहाड़ो में 1 से 40 तक पेली कक्षा तक सीख जाते, फिर सवाया, डोढ़ा, पूणा, ढुंचा और उण्ठा के पहाड़े होते। पौषवाळ में मारजा से पढ़े कुछ शिष्य आज भी है जो मौखिक हिसाब किताब केलकुलेटर के बटन दबने से पहले कर देते है। उस समय चैक की जगह बड़े बड़े लेन देन ‘हुंडी’ से होते। पौषवाळ में प्रवेश व निकलते सब शिष्य पैर छूते।

मार विद्या सार की कहावत

कठोर अनुशासन और मालनी यानि सब पहाड़े सबको एक साथ बुलवाना । उस समय सब जोश उत्साह देखा जाता आस पास सब को मालनी सुनाई देती । घरों में रात को सोने से पहले मालनी बोलकर प्रणाम कर सोना होता था। कठोर अनुशासन में ‘मार विद्या सार’ कहावत भी सुनने को मिलती।

बीकानेर शहर में कई मारजा हुवे कुछ नाम जो ध्यान है वो ही बता रहा हूँ। हां मारजाओ के नाम से पहले यह बता दूं कि मारजाओं के बाद ‘मास्टर’ प्रचलित हुवे उसके बाद शिक्षक, अध्यापक शब्द आए और इसी क्रम में वो पहाड़ों वाली महाजनी पढ़ाई लुप्त होती रही।

बीकानेर के मारजा:-

लाल मारजा, मीन मारजा, जेठा मारजा, मूलिया मारजा, फागणिया मारजा, छगन मारजा, हीरा मारजा, सरदार मारजा, बैजिया मारजा व गिरधर मारजा, मन्छी मारजा, छीछि मारजा, आदु मारजा, छोटू मारजा, गिरधर मारजा, फकीरा मारजा, जेठा मारजा, बलदेव मारजा, शिवनाथा मारजा, मनिया मारजा, लावरिया मारजा, धूड़िया मारजा, छगन मारजा, टांटिया मारजा व मघा मारजा ।

विद्या अध्ययन में शहर में कुछ मारजाओ से मैं छोटी उम्र में मिला हूं, पिताजी ने बताया भी और उनके बाद हुवे ‘मास्टर’ उनसे तो मैं पढा भी हुँ। इसमें कई नाम जरूर छूटे होंगे वो आप कमेंट में एड जरूर करना। ‘मास्टर’ पर भी अलग कभी लिखा जा सकता है। वैसे सिंधी मास्टर जी, लछु मास्टर जी व बृज लाल मास्टर जी कुछ नाम आज भी जुबान पर है। ‘पहाड़ो’ की मालनी और पहाड़ो से सेकंडों में हिसाब वास्तव में गजब है। आज लोगों को अधिकतम 20 तक पहाड़े यानि मौखिक हिसाब याद है। जबकि 1 रुपये 25 की कोई वस्तु 5 लेनी हो तो आज वाले लोग गुणा करेंगे रुपयों पेसो की जबकि इसका पहाड़ा याद हो वो सीधा बोल देता है ‘पांच सवाए सवा छव’ यानि 6 रुपये 25 पैसे ।

कई पुस्तकें है कुछ आलेख शिवराज जी छंगाणी के वर्षो पहले पढ़े, हाल ही में डॉ राजेन्द्र जोशी, डॉ मुकेश हर्ष व संजय श्रीमाली को पुस्तको में शहर में ऐसी कुछ पुरानी जानकारियां भी है। जो उन्होंने मुझे भी भेंट की। शहर संस्कृति को संजोए रखने में अपनी भूमिका अदा करने वाला हर व्यक्ति का मैं सम्मान आदर करता हूँ। ऐसे लोगों से जो संस्कृति से जुड़े है रमक झमक की ओर से स्वागत है।

यह जानकारी आपको अच्छी लगेगी व बच्चों के लिये शहर इतिहास जीके का काम करेगी। लेकिन आप कमेंट में नाम एड करना, सुझाव देना जारी रखना। लाइक कर शेयर कर इसे आगे बढ़ाना। हमे हमारी परम्परा संस्कृति को जीवंत रखने में योगदान देना है।
प्रहलाद ओझा ‘भैरु’

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