‘करवो ले करवो ले व्रत भोंगनी करवो ले ‘ जानिये करवा चौथ की कथा और चंद्रोदय का समय

karwa chauth 2022
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सुहागिन महिलाओं में जिस व्रत का उत्साह कई दिन पहले शुरू हो जाता है वह करवा चौथ का व्रत आ रहा है। किसी भी व्रत का आधार आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक होता है। जब आप व्रत रखते हैं, तब आपका पूरा शरीर शुद्ध हो जाता है। जब शरीर में से विषैले पदार्थ निकल जाते हैं, तब मन तीक्ष्ण होता है। ऐसी अवस्था में आप जो भी इच्छा करते हैं या जिस भी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, वह पूरा होता है। यह श्रद्धा है, नियम भी है और इसका वैज्ञानिक आधार भी है। लेकिन व्रत के साथ-साथ आपको मन की संकल्प शक्ति को भी बढ़ाना होगा। करवा चौथ के पूरे दिन, आपके मन में बस एक ही इच्छा रहती है कि आपके पति या पत्नी का कल्याण हो। पुराने दिनों में, लोग केवल इसी एक इच्छा के साथ व्रत करते थे।

देशभर में करवा चौथ व्रत की मान्यताएं
पति की लम्बी उम्र के लिए किया जाता हैं, अच्छे दाम्पत्य जीवन के लिए किया जाता हैं पर क्या आप जानते हैं की चन्द्रमा को ही क्यों पूजा जाता हैं ओर पति को छलनी से क्यूँ देखते हैं ? हमारी सनातन परंपरा के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ व्रत मनाया जाता हैं। इस दिन महिलाएं चन्द्रमा की पूजा करती है और अपना व्रत खोलती हैं। इस दिन चंद्रमा की ही पूजा क्यूँ की जाती हैं ? इस समबन्ध में कई कहानियाँ और कथाओं के साथ धार्मिक व मनोवैज्ञानिक पक्ष भी हैं । राम चरितमानस के लंका काण्ड के अनुसार इस समय भगवान् श्री राम समुद्र पार कर लंका में सुबर पर्वत पर उतरे और श्री राम ने पूर्व दिशा की ओर चमकते चंद्रमा को देखा तो अपने साथियो से पूछा की चंद्रमा में जो कालापन हैं वो क्या हैं? सभी ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार जवाब दिया किसी ने कहा पृथ्वी की छाया के कारण चंद्रमा पर कालापन हैं, किसी ने कहा राहू की माया के कारण चंद्रमा पर उसकी दृष्टि हैं और किसी ने कहा की आकाश की काली छाया उस पर दिखाई देती हैं तो भगवान श्री राम ने कहा की विष यानी जहर चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई हैं इसलिए उसने विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा हैं जिसके कारण चंद्रमा में कालापन दिखाई देता हैं। अपने विषयुक्त किरणों को फैला कर वो वियोगी नर नारियो को जलाता रहता हैं।
इसीलिए करवा चौथ के दिन पूजा कर महिलाए ये कामना करती हैं की किसी भी कारण उन्हें अपने प्रियतम का वियोग नहीं सहना पड़े और यही कारण हैं की चंद्रमा की पूजा करने का विधान हैं। सुहागिन महिलाओं द्वारा इस व्रत को अपनी पति की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए निराहार रहकर सम्पन्न किया जाता है। हालांकि इसकी कहानी कथाओं और मान्यताओं में स्थानीय प्रभाव अलग अलग है। कहीं कहीं महिलाओं में धारावाहिकों और फिल्मों का प्रभाव भी साफतौर पर देखा जाता है। कई जगह इसे अलग अलग स्वरूप में मनाया जाता है लेकिन ये जरूर है कि पूरे देश मे महिलाओं द्वारा इस व्रत को रखा जाता है और बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ करवाचौथ का व्रत बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय चतुर्थी के दिन किया जाता है। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की पूजा अर्चना का भी विशेष महत्व माना जाता है। करवाचौथ में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।
क्या है ‘करवा चौथ’ का अर्थ
करवा चौथ में ‘करवा’ का अर्थ मिट्टी के बर्तन से है करवा मिट्टी तथा तांबे का भी होता है। ‘चौथ’ का अर्थ चतुर्थी तिथि से है। इस दिन करवे का विशेष महत्व होता है महिलाएं करवे को विशेषरूप से सजाकर तैयार करती है। करवे के अलावा मिट्टी से 10 की संख्या में दशरथि (मिट्टी के कुलड़े की तरह) भी बनाकर इनकी पूजा की जाती है। कहीं कहीं चौथ माता की पूजा की जाती है तो कहीं दीवार पर 10 आकृतियां बनाकर भी पूजा की जाती है।
‘करवो ले करवो ले व्रत भांगणी करवो’ ले
करवा चौथ के दिन सुबह या दोपहर को देवरानी-जेठानी, ननद-भाभी तथा घर की सुहागिन महिलाएं एक दूसरे के सामने या गोल घेरे में बैठकर एक दूसरे को करवे का आदान-प्रदान करती है। करवे के ऊपर छलनी को रखा जाता है और इसके ऊपर खाजा (मैदे से बना हुआ), बेर, फली, काचर, रुपये आदि रखे जाते है। महिलाएं एक दूसरे से लेनदेन करते हुए ‘करवो ले बाई करवो ले भाइयो री बहना करवो ले, कलह काटनी करवो ले, चालनी/छलनी में चांद देखणी करवो ले, उवा सुवा करवो ले, व्रत भाँगणी करवो ले’ स्थानीय भाषा मे ये गीत गाती है। इसके पश्चात महिलाएं एक दूसरे के लिए अमर सुहाग की कामना करती है।
इस दिन गौरीपूजन तथा सुहाग के श्रृंगार भेंट का महत्व
सौभाग्यवती (सुहागिन) महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहाते समय सिर के बाल धोती है और नए कपड़े पहनकर श्रृंगार कर तैयार होती है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन मेहंदी लगती है और माता गौरी (पार्वती माता का रूप) और भगवान शिव तथा गणेश की पूजा करती है। अखंड सौभाग्य के लिए माता गौरी को सुहाग सामग्री भी भेंट की जाती है । व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सुहाग के श्रृंगार का सामान चूड़ी, टिकी, मेहंदी, शीशा, कंघी, सिंदूर आदि सुहागिन सुहासिनी औरतों को या मंदिर में भेंट करती है।
चंद्रोदय के साथ खुलता है करवा चौथ का व्रत
करवा चौथ का व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन अपना व्रत शाम चंद्रोदय के पश्चात ही खोलती है। कई जगह शाम हो जाने के बाद निर्जल रहकर महिलाएं चंद्रोदय का इंतिजार करती है। चंद्रमा उग जाने के बाद महिलाएं छत पर जाकर चंद्रमा को अर्घ्य देती है। छलनी के जरिये चंद्रमा के दर्शन करती है और घी के दीपक से चाँद की आरती करती है। चंद्रमा से पति के लंबे और खुशहाल जीवन के लिए प्राथना करती है। पूजा हो जाने के बाद महिला घर परिवार में मौजूद अपने बड़ो के पैर छूकर आशीर्वाद लेती है। अपने पति से आज्ञा लेकर ही पत्नी अपने व्रत को खोलती है और प्रसाद ग्रहण करती है।
चंद्रोदय का समय
करवा चौथ गुरुवार दिनांक 13 अक्टूबर 2022 को होगा साथ ही इस दिन गणेश चौथ का व्रत भी होता है। चंद्रोदय का समय रात्रि 8: 18 बजे के आस पास होगा।
करवा चौथ की कथाएं
हज़ारो सालो से चली आ रही परम्पराओं में कई कहानियां और कथाएं जुड़ती चली जाती है। ऐसे ही करवा चौथ की कथा भी महाभारत काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि श्री कृष्ण के कथा कहे जाने के बाद सबसे पहले यह व्रत द्रौपदी ने रखा था। समय उपरांत कई कहानियां इससे जुड़ती चली गई है जिनमे कई प्रचलित कथाएं है उनमें से मुख्य हम आपके साथ साझा कर रहे है।
पहली कथा
एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपने काम से घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।
सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है और उसके पैर पकड़ लेती है। (कहीं कहीं कथा में 10 दशरथियों का स्थान बताया गया है।)
अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।
द्वितीय कथा
एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।
तृतीय कथा
एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था।
पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।
तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी। भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।
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