बीकानेर शहर की ये 20 बातें जिसके कारण पहचाना जाता है पूरे विश्व में

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बीकानेर धर्म संस्कृति और कला के तौर पर विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान तो रखता ही है साथ ही ऐसी और भी वजह है जिसके कारण बीकानेर को दुनिया में पहचाना जाता है। इनमे बहुत सी ऐसी बाते है जो आपको सायद ही पता हो,  तो आइए जानते हैं 20 ऐसी वो जगह और ऐसे तथ्य जिसके कारण बीकानेर की दुनिया में एक अलग पहचान है जो आपको जरूर मालूम होना चाहिए और इसके लिए पुरे 20 तथ्य जरूर देखें –

20 – महाजन फाइल फायरिंग रेंज-

 

एशिया का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास केन्द्र बीकानेर के महाजन में है। सेना की दक्षिण-पश्चिमी कमान द्वारा विश्व स्तरीय ट्रेनिंग नोड के रूप में स्थापित की गई महाजन फील्ड फायरिंग रेंज एशिया का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास केंद्र है। यहां भारतीय सेना प्रचंड गर्मी में भी बड़े स्तर पर टैंको और मिसाइल्स के साथ युद्धाभ्यास करती रहती है। आंतकवाद के खिलाफ भारतीय सेना मित्र देशों फ्रांस अमेरिका यूके के साथ यहां ज्वाइंट मिलिट्री एक्सरसाइज करती रहती है। सबसे बड़े फायरिंग फील्ड रेंज होने के कारण यहां युद्धाभ्यास के लिए हर वर्ष दुनियाभर के सैनिक भारत के साथ मिलकर युद्धाभ्यास करते है।

 

19 – ऊन मंडी-

 

एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी ऊन मंडी बीकानेर में है। स्टेट वूलन मिल्स लिमिटेड भी बीकानेर में है। बीकानेर में बने ऊनी दरियाँ और गलीचे विदेशो में भी एक्सपोर्ट किए जाते है। पूरे देश और विदेशों में बीकानेर के कारपेट को बहुत पसंद किया जाता है। यहां बने कारपेट की क्वालिटी दुनिया के सबसे बेहतरीन कालीन निर्माताओं में अच्छी मानी जाती है। यहां बने हैंडीक्राफ्ट भी आने वाले पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है।

 

18 – कैमल फार्म-

 

भारत का नेशनल कैमल रिसर्च सेंटर जोहड़ बीकानेर में है जो कि एशिया का पहला और सबसे बड़ा ऊंट अनुसंधान केंद्र है । ऊंट के दूध की डेयरी भी आपको सिर्फ जोहडबीड बीकानेर में ही देखने को मिलेगी। यहां ऊंट के दूध से बने दही और आइसक्रीम भी मिलती है। 1984 से स्थापित इस कैमल फार्म में आज भी ऊंटों और उसके दूध पर गहन अध्ययन किया जाता है साथ ही उनको प्रशिक्षित भी किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर बीकानेर को इस अनुसंधान के लिए जाना जाता है।

 

17 – केसरिया बालम पधारो म्हारे देश गीत-

 

राजस्थान का सबसे लोकप्रिय गीत ‘ केसरिया बालम पधारो म्हारे देश ‘ बीकानेर की मांड गायिका अल्ला जिलाई बाई द्वारा गाया गया था। उन्होंने सबसे पहले यह गीत महाराजा गंगासिंह जी के दरबार में गाकर सुनाया। महाराजा गंगा सिंह जी ने अल्लाह जिला बाई की छोटी उम्र में ही इस प्रतिभा को पहचान लिया था और वो 13 वर्ष की उम्र में राजगायिका बन गई। केसरिया बालम गीत को लेकर अल्ला जिलाई बाई को 1982 में भारत के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों में से एक पद्मश्री से नवाजा गया।

 

16 – अग्नि नृत्य –

 

जसनाथी सम्प्रदाय की प्रधानपीठ कतरियासर बीकानेर में है। इस सम्प्रदाय का अग्नि नृत्य विश्वभर में प्रसिद्ध है। अग्नि-नृत्य पुरुषों द्वारा नंगे पावों से अंगारों के ढ़ेर (धूणा) पर किया जाता है। इस नृत्य के दौरान फतेह-फतेह का नारा बोला जाता है और सर से मतिरा फोड़ने की कला का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस नृत्य को देखने देश विदेश के सैकड़ों लोग आते है ये नृत्य और संप्रदाय काफी लोकप्रिय है। इस नृत्य का नृत्यकार नाचणिया और इस सम्प्रदाय का संत सिद्ध कहलाता है। विदेशी पर्यटक अंगारों पर नृत्य करते हुए देखने के लिए बीकानेर आते है।

15 – देविकूंड सागर –

 

देवीकुंड सागर की छतरिया अपनी कलाकृतियों की वजह से प्रसिद्ध है। बीकानेर राजघराने का अंतिम स्थल देविकुंड सागर है यहाँ बीकानेर के हुए राजाओं महाराजाओं के अंतिम स्थल पर संगमरमर की छतरिया बनी हुई है और मुगल काल की कलाकृतियां दिखाई देती है। यहां का सती माता मंदिर भी चमत्कारी माना जाता है और यहां की एक छतरी से दूध निकलने की घटना भी लोगों में चर्चा का विषय रहती है। इसके बारे में विस्तृत वीडियो आप रमक झमक यूट्यूब चैनल पर देख सकते है।

14 – जूनागढ़ किला –

 

जमीन के जेवर कहे जाने वाले इस दुर्ग की सुंदरता को देखने हजारों लोग आते है। ज्यादातर बने किले पहाड़ी या किसी ऊंचाई पर बने है लेकिन बीकानेर का जूनागढ़ किला शहर के बीचों बीच समतल जगह पर से बनाया गया है। साथ ही ये बहुत कम लोगों को मालूम है कि राजस्थान का एकमात्र हेरंभ गणेश मंदिर जिसमें भगवान गणेश जी शेर की सवारी करते है उनकी प्रतिमा सिर्फ बीकानेर में है। इसी स्थान पर 33 कोटि देवी देवताओं का मंदिर भी है। हालांकि इस मंदिर को जूनागढ़ में आम लोगों और पर्यटकों के लिए नहीं खोला गया है।बीकानेर में आने वाले पर्यटक सबसे ज्यादा जूनागढ़ किले को देखने आते है।

13 – गणगौर उत्सव

 

राजस्थान का सांस्कृतिक त्योहार गणगौर पूजन पूरे भारतवर्ष में विख्यात है। जयपुर और बीकानेर में गणगौर के सबसे बड़े मेलों का आयोजन होता है लेकिन बीकानेर में सैकड़ों वर्षों से भादानी जाति की गवर को दौड़ाकर ले जाने की परंपरा रही है। बीकानेर के जूनागढ़ किले से जैसे ही शाही रथयात्रा निकलती है तो दूसरी ओर भादानी जाति की गणगौर को दौड़ाकर वहां से ले जाते है। यह नजारा बीकानेर में गणगौर मेले के दौरान देखने लायक होता है। इसके पीछे क्या कहानी है जानने के लिए आप हमारे यूट्यूब चैनल या फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।

12 – कैमल फेस्टिवल-

 

बीकानेर बसाने के बाद राव बीकाजी ने ऊंटों का पालन पोषण शुरू किया। राजस्थान में ऊंटों के महत्व के कारण ही इसे रेगिस्तान का जहाज कहा गया। भारतीय थल सेना में एक टुकड़ी ऐसी भी है जो ऊंट से देश की सीमा की चौकीदारी करती है। बीकानेर में ऊंट उत्सव हर वर्ष जनवरी के महीने में पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किया जाता है। उत्सव के दौरान अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इनमें दहकते अंगारों पर पारंपरिक नृत्य करना, ऊंट की सवारी, ऊंट नृत्य और विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियां की जाती हैं। सैकड़ों विदेशी पर्यटक इसका लुत्फ उठाते हैं।

11 – जांभोजी स्थल मुकाम-

 

विश्नोई सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ मुकाम बीकानेर के नोखा में है। गुरु जांभेश्वर जी ने जीवन के 29 नियम दिए और इनके नियम मानने वाले बिश्नोई कहलाएं। गुरु जंभेश्वर जी के मुकाम स्थल पर बिश्नोई संप्रदाय का सबसे बड़ा मेला भरता है यहां हजारों की संख्या में लोग आहुतियां देते है। बिश्नोई संप्रदाय के लोग पर्यावरण प्रेमी होते है। पेड़ पोधो और जानवरों के लिए इनके बलिदान की कहानियां पूरी दुनिया में कहीं जाती है। भारत में कहीं भी रह रहे बिश्नोई संप्रदाय के लोग यहां दर्शन करने जरूर आते है। बिश्नोई नाम 20+9 (29 नियम) 29 नियम होने के कारण पड़ा है।

10- मथेरण कला-

 

मथेरण कला की उत्पति भी बीकानेर से ही हुई है। गणगौर उत्सव में गवर और ईशर पर हस्तकला द्वारा जो कलाकृति कर उन्हें बनाया और तैयार किया जाता उसे मथेरन कला कहा जाता है। मथेरा जाति द्वारा इस हस्तकला के विकास के कारण ही इस कला का नाम मथेरण कला पड़ा बीकानेर के बड़ा बाज़ार में मथेरा जाति के परिवार रहते है। इनके द्वारा बनाई गई गणगौर की मांग भारत के हर उस हिस्से में रहती है जहां गणगौर पूजन किया जाता है। विश्व में कहीं भी रहने वाले राजस्थान के लोग गणगौर यही से लेना पसंद करते है और यहां से विदेशों तक इसका एक्सपोर्ट होता है। मथेरण कला क्या है इसकी शुरुआत कैसे हुई इसकी विस्तृत जानकारी के लिए आप रमक झमक यूट्यूब चैनल पर देख सकते है।

9 – बीकानेर की हवेलियाँ-

 

बीकानेर को हज़ार हवेलियों का शहर कहा जाता है। कहा जाता है कि महाराजा गंगासिंह जी ने यहाँ 1001 हवेलियों के निर्माण का आज्ञापत्र दिया था। बीकानेर में कोई विदेशी पर्यटक आए और रामपुरिया हवेली ना देखे ऐसा नहीं हो सकता। इन हवेलियों की खासियत ये है कि इनमें भारतीय वास्तुकला के साथ यूरोपियन कल्चर भी दिखाई पड़ता है। पर्यटकों को हवेलियों की इस गली में पुराने यूरोप देश की संस्कृति का एहसास होता है। बीकानेर में ज्यादातर हवेली बीकानेर रियासत के महाराजाओ ने बीकानेर में व्यापार करने वाले व्यापारियों को बना के दी थी ताकि वे बीकानेर को अपना निवास स्थान बनाकर यहाँ व्यापार अच्छे से कर सके और ये हवेलियां शहर का वैभव बढ़ाती है। रामपुरिया हवेली का नाम यहां रहने वाले व्यापारी रामपुरिया परिवार की वजह से पड़ा।

8 – शादियों का ओलंपिक पुष्करणा सावा-

 

बीकानेर एक मात्रा ऐसा शहर है जहां शादियों के ओलंपिक का आयोजन किया जाता है। यह कोई खेल नहीं बल्कि सच में पूरे शहर में शादियों का आयोजन होता है। ये शहर और समाज की संस्कृति है। यहां हर 2 वर्ष में एक बार पुष्करणा सावा (शादियों का ओलंपिक) का आयोजन पुष्करणा समाज द्वारा किया जाता है। इस एक दिन में एक ही समय एक ही मुहूर्त में सैकड़ों शादियां होती है और दूल्हे का स्वरूप आम दूल्हों की तरह नहीं बल्कि विष्णु रूप होता है और दुल्हन माता लक्ष्मी के रूप में होती है। यहां दूल्हा शादी करने घोड़ी पर नहीं बल्कि पैदल ही अपनी लक्ष्मी को लेने जाता है। बीकानेर की ये परंपरा अन्य समाज को धार्मिक परंपरा के रूप में और कम खर्च में विवाह करने का संदेश देती है। रमक झमक संस्था इस संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य करती है। शादियों का ओलंपिक क्या है इसकी शुरुआत कैसे हुई हर दूल्हा विष्णु रूप क्यों होता है इसकी विस्तृत जानकारी हमारे Ramak Jhamak यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है।

7 – कपिल मुनि मंदिर कोलायत-

 

कोलायत में सांख्य दर्शन के प्रणेता ऋषि कपिलमुनि का आश्रम है। यह महान संत कपिल मुनि की तपोस्थली मानी जाती है । यहां माना जाता है कि कपिल मुनि के दर्शन और यहां के सरोवर में डुबकी लगाने वाले को गंगासागर भी जाना जरूरी नहीं है। प्राचीन मान्यता के अनुसार कपिलमुनि ने अपनी माता की मुक्ति के लिए यहाँ से ‘पाताल गंगा’ निकाली जिसे वर्तमान में कपिल सरोवर कहते हैं। पश्चिमी राजस्थान में कपिल सरोवर को गंगा तुल्य ही माना जाता है। मरू प्रदेश का सबसे बड़ा मेला भी यही भरता है। कपिल मुनि मंदिर का इतिहास क्या है भारत में और मंदिर कहां कहां है इसका पूरा वीडियो आपको रमक झमक यूट्यूब चैनल पर मिल जायेगा।

6 – बीकानेर की उस्ता कला-

 

बीकानेर में की जाने वाली ऊंट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी और नक्काशी का कार्य उस्ता कला के नाम से जाना जाता है। अब ये उस्ता आर्ट लकड़ी, कांच और संगमरमर पर भी की जाती है। उस्ता आर्ट के आर्टिस्ट और उनके द्वारा बनाई गई आर्ट देश विदेशों में काफी प्रचलित हैं। इस उस्ता कला का विकास बीकानेर के पदम श्री से सम्मानित श्री हिसामुद्दीन उस्ता द्वारा किया गया था। बीकानेर में जूनागढ़ फोर्ट, हवेलियां और कई धार्मिक स्थलों पर उस्ता कला का बेहतरीन कार्य देखने को मिलता है। बीकानेर का कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर उस्ता कला का प्रशिक्षण संस्थान है। बीकानेर में उस्तों का मोहल्ला भी है जहां कई परिवार इस उस्ता आर्ट का कार्य करते है।

5 – बीकानेर के पापड़ भुजिया-

 

बीकानेर के बारे में बात हो और पापड़ भुजिया का नाम नहीं आए तो ऐसा हो नहीं सकता पापड़ और भुजिया का आविष्कारक बीकानेर को ही माना जाता है। बीकानेर के रहने वाले हल्दीराम जी ने भुजिया का आविष्कार किया था आज पूरे विश्व में हल्दीराम और बीकाजी फर्म जो एक ही परिवार से हैं पूरे विश्व में इनके नमकीन और मिठाई के स्टोर है। भुजिया पापड़ और मिठाई के मामले में बीकानेर के इस ब्रांड का एकाधिकार रहा है। आज भारत के सबसे बड़े ब्रांड में बीकाजी और हल्दीराम को गिना जाता है। बीकानेर के इस 2 ब्रांड ने बीकानेर के नाम को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। बीकानेर में हल्दीराम के नाम से हार्ट हॉस्पिटल का संचालन भी होता है। भुजिया का आविष्कार कैसे हुआ और इसकी शुरुआत कैसे हुई अगर आप डिटेल में जानना चाहते हैं तो आप हमारे रमक झमक यूट्यूब चैनल पर जाकर वीडियो देख सकते हैं।

4 – आचार्य तुलसी समाधि स्थल-

 

बीसवीं सदी के आध्यात्मिक क्षितिज पर प्रमुखता से उभरने वाले एक महान संत आचार्य श्री तुलसी की पावन जन्म भूमि लांडनू और समाधि स्थल गंगाशहर बीकानेर में है। जैन धर्म व तेरापंथ संप्रदाय से प्रतिबद्ध होने पर भी आचार्य तुलसी का दृष्टिकोण असांप्रदायिक रहा और उनकी मानवीय संवदेना ने पूरी मानवता को करुणा और शांति का संदेश दिया। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक भी आचार्य तुलसी ही थे इनके नाम से बीकानेर में कैंसर हॉस्पिटल का भी संचालन होता है जिससे हजारों लोग लाभान्वित होते है।

3 -भांडाशाह जैन मन्दिर-

 

यहां का प्रसिद्ध भांडाशाह मंदिर बीकानेर के सबसे पुराने लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास स्थित है। मंदिर का निर्माण भांडाशाह जैन द्वारा करवाने के कारण इसका नाम भांडाशाह पड़ा । कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में पानी की जगह 40 हजार लीटर शुद्ध देशी का उपयोग किया गया था। मंदिर निर्माण में घी डलवाए जाने और अपनी स्थापत्य कला के कारण यह मंदिर जग प्रसिद्ध है । तभी तो विश्व की प्रमुख ट्रैवल एजेंसी ट्रिप एडवाइजर ने इस मंदिर को भारत के प्रमुख जैनालयों में शामिल किया है। इस जैन मंदिर में पांचवें तीर्थकर भगवान सुमतिनाथ जी मूल वेदी पर विराजमान हैं। इस मंदिर का नाम एक व्यक्ति के नाम भांडाशाह पर क्यों पड़ा यहां की नींव में 40 हजार लीटर घी क्यों डलवाया गया था इसकी पूरी जानकारी आप रमक झमक चैनल पर देख सकते है।

2 – करणी माता का मन्दिर देशनोक-

 

देशनोक करणी माता का मंदिर जिसके चमत्कार और रहस्य के बारे में पूरी दुनिया जानती है। चूहों वाली देवी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर की लोकप्रियता विश्व भर में है। मंदिर के प्रांगण में सैकड़ों चूहे घूमते है और एक भी मंदिर के प्रांगण को छोड़ बाहर नहीं जाता । जहां दुनिया में चूहों के झुठन खाने से बीमारी फैल जाती है लेकिन यहां इसे माता का प्रसाद समझ ग्रहण किया जाता है। यहां के प्रसाद से आजतक कोई बीमारी नहीं हुई है बल्कि बीमार व्यक्ति भी ठीक हो जाते है विज्ञान भी इसे चमत्कार ही मानता है। यहां सफेद चूहे को काबा कहा जाता है काबा के दर्शन को साक्षात माता का आशीर्वाद माना जाता है। बीकानेर की नींव भी करनी माता ने ही रखी है। बीकानेर की जनता का माता पर अटूट विश्वास है और बीकानेर को माता का अमर रहने का आशीर्वाद ।

1. धर्मनगरी छोटीकाशी बीकानेर-

इन सबके अलावा बीकानेर की एक सबसे खास विशेषता और पहचान धर्मनगरी के रूप में है। बीकानेर के हर चौक और गली में मंदिर देखने को मिल जाते हैं। बीकानेर वासी लक्ष्मीनाथ जी मंदिर को अपना नगर सेठ मानकर पूजते है। पशु पक्षीयो और जानवरों के लिए रोटी दाना और चारा डालना तो बीकानेरी लोगों के आचरण में शामिल है। मेले हो या त्योहार यहां सभी लोग धार्मिक सौहार्द के साथ मिलजुल कर मनाते है। जब साल में भादवे का महीना आता है तो बीकानेर शहर के लाखों लोग कोडमदेसर भैरव, सियाणा भैरव, पूनरासर और रामदेवरा मेले के लिए दर्शन करने पदयात्रा करके जाते हैं वहीं रास्ते भर में पदयात्रियों के लिए सेवादारों की भी कोई कमी नहीं रहती। शहर का नजारा ऐसा होता है मानो कोई चारो और धर्म यात्रा चल रही हो । यहां की सबसे बड़ी विशेषता धर्म संस्कृति को आज तक संजोए रखना है। छोटीकाशी धर्मनगरी कहा जाने वाला बीकानेर विद्वान पंडितो की नगरी भी है। इसके अलावा यहां के लोग मस्तमोले, आनंद और संतोषी स्वभाव के कारण हर किसी से मेलजोल बहुत जल्दी कर लेते है। यहां आने वाले पर्यटक भी यहां के लोगों के मस्तमौला स्वभाव की छवि यहां से लेकर जाते है।

बीकानेर से जुड़े तथ्यों व स्थलों की और भी जानकारी जल्द आपके साथ साझा की जाएगी। आपको जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर कर सकते है और आप भी अपनी लिखी ऐसी जानकारी हमें मेल या मैसेज के जरिए भेज सकते है। ऐसी ही डेली अपडेट के लिए आप हमारे फेसबुक पेज रमक झमक से जुड़ सकते है। आप सभी को रमक झमक की ओर से बीकानेर स्थापना दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं। – राधेकृष्ण ओझा

(बीकानेर से जुड़े सभी वीडियो आप इसी वेबसाइट के वीडियो मेनू में जाकर देख सकते है हमारे यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर भी देख सकते है)

 

 

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