धनतेरस का अर्थ क्या है ? इस त्यौहार को क्यों मनाते है ? क्या धनतेरस को धन से जोड़कर देखना सही है ? और इस त्यौहार को क्यों मनाया जाता है धनतेरस का क्या महत्त्व है ? धनतेरस के दिन क्या खरीददारी करना शुभ माना जाता है ? अगर ये जानने की जिज्ञासा आप रखते है तो हम आपको ये सभी जानकारी देने जा रहे है।
क्या है धनतेरस का अर्थ और क्यों मनाया जाता है
पांच दिन के दीपावली पर्व को एकीकृत रूप में देखा जाता है इसके हर एक दिन की अलग और विशेष महत्ता है। इन पांच दिनों के पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। धनतेरस शब्द ‘धन और तेरस’ से मिलकर बना है तो कई इसे ‘धन्य और तेरस’ से मिलकर बना धनतेरस भी कहते है। मुख्य रूप से धनतेरस भगवान धन्वंतरि के कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र मंथन से प्रकट होने के कारण इसे धनतेरस कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में पहला सुख आरोग्य को माना गया है इसे ही स्वास्थ्य धन भी कहा जाता है। कहा जाता है पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख धन और माया। सभी सुखों का भोग करने के लिए यहां तक कि ईश्वर का ध्यान करने के लिए भी स्वास्थ्य का अच्छा होना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। दीपावली की शुरुआत भी सबसे पहले भगवान धन्वंतरि के दिन यानी आरोग्य प्रदान करने वाले देवता के दिन से होती है। भगवान धन्वंतरि ही आयुर्वेद के जनक है इन्हें स्वास्थ्य देवता तथा स्वयं भगवान विष्णु के अंश के रूप में जाना जाता है। अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने वाले भगवान धन्वंतरि को देवताओं का चिकित्सक यानि वैद्य के रूप में माना जाता है। इनके आशीर्वाद से ही औषधियों/दवाइयों में वो शक्ति उत्पन्न होती है जो शारीरिक कष्ट व पीड़ा को दूर करती है।
आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि
हनुमान जी द्वारा लक्ष्मण जी के लिए लाई गई संजीवनी बूटी भी भगवान धन्वन्तरि को प्रार्थना कर ही लायी गयी थी। शारीरिक बीमारियों को दूर करने की औषधियां में शक्ति का प्रवाह धन्वन्तरि भगवान द्वारा ही किया जाता है। धन्वन्तरि ने ही पृथ्वी पर पेड़, पौधों आदि के दोष व गुणों को प्रकट किया था। धन्वन्तरि केवल औषधि से ही नहीं, बल्कि इसके साथ साथ मंत्रों के उच्चारण से भी रोगियों का उपचार करते थे। भारत सरकार भी धनतेरस को ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के रूप में मनाती है।
भगवान धन्वंतरि का आरोग्य प्रदान करने वाला मंत्र
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये: ।
अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय ।।
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप ।
श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
मंत्र का अर्थ– परम भगवान को प्रणाम करते है जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सभी भय को दूर करने वाले हैं, सभी रोगों का नाश करने वाले हैं, तीनों लोकों के स्वामी और उनका निर्वाह करने वाले हैं उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है। महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद भागवत महापुराणादि तथा ग्रंथों सुश्रुत्र संहिता चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय में भगवान धन्वंतरि का विभिन्न रूपों में उल्लेख मिलता है।
पुरादेवऽसुरायुद्धेहताश्चशतशोसुराः।
हेन्यामान्यास्ततो देवाः शतशोऽथसहस्त्रशः।
गरुड़ और मार्कंडेय पुराणों के अनुसार वेद मंत्रों से अभिमंत्रित होने के कारण वे वैद्य कहलाए।
धनतेरस के दिन खरीददारी करना शुभ क्यों माना जाता है
इसका विशेष कारण है की धनतेरस पर कुछ खास ग्रहों के योग बनते हैं। जो बहुत शुभ फलदायक होते हैं। और इस दिन खरीददारी करना बेहद शुभ माना जाता है। और इस दिन के लिए सभी के मन में दुविधा होती है कि धनतेरस को क्या खरीदें। तो चलिए बात करते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में किस चीज की खरीदारी को धनतेरस के दिन शुभ माना गया है और किन वस्तुओं को खरीदने से ग्रहों के अशुभ फल मिलते हैं। धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूँकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनियाँ के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग चाँदी के बने बर्तन खरीदते हैं। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। सन्तोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास सन्तोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं। धनतेरस पर लोहा ,कांच और एलुमिनियम के बर्तन नहीं खरीदना चाहिए। कांच और लोहे आदि धातु क्रूर ग्रह राहु के कारक होते हैं। और धनतेरस के दिन लोहे व कांच आदि को खरीदना अशूभ माना जाता है।
धनतेरस की एक कथा के अनुसार ये भी माना जाता है की इस दिन खरीदी गई वस्तु में कई गुणा वृद्धि होती है इसलिए इस दिन खरीददारी करना शुभ माना जाता है आप आगे धनतेरस से जुडी कथाये देख सकते है।
धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने का विशेष महत्त्व
धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदा जाता है। मान्यता है कि इस दिन झाड़ू खरीदने से गरीबी दूर होती है साथ ही नई झाड़ू से नकारात्मक ऊर्जा दूर जाती है और घर में लक्ष्मी का वास होता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदकर अपने घर में लाना चाहिए। इससे पैसों की तंगी को दूर किया जा सकता है। शास्त्रों में इसे माता लक्ष्मी का प्रतिरूप माना जाता है। हालांकि धनतेरस पर झाड़ू खरीदने के कुछ नियमों का भी पालन करना चाहिए। इन नियमों के प्रति लापरवाही बरतने से देवी लक्ष्मी नाराज भी हो सकती है।
धनतेरस पर अगर झाड़ू खरीदें तो झाड़ू को पकड़ने की जगह पर सफेद रंग का धागा बांध दें. ऐसा करने से देवी लक्ष्मी घर में स्थिर रहती हैं. साथ ही ध्यान रहे कि झाड़ू पर पैर न मारा जाए. कहा जाता है कि झाड़ू पर पैर मारने से देवी लक्ष्मी नाराज हो सकती है. वहीं झाडू मंगलवार, शनिवार और रविवार को खरीदने से बचना चाहिए. इन दिनों में झाड़ू खरीदने से घर में कलह का माहौल हो जाता है। अगर हो सके तो धनतेरस पर तीन झाड़ू खरीदें. तीन झाड़ू साथ में खरीदना शुभ माना जाता है. दो या चार के जोड़े में झाड़ू की खरीद न करें. वहीं धनतेरस पर खरीदी गई झाड़ू को दिवाली के दिन सूर्योदय से पहले मंदिर में दान करने से घर में लक्ष्मी आती है। मंदिर में झाड़ू दान दिवाली के दिन मंदिर में झाड़ू दान करने से घर में लक्ष्मी का निवास होता है। ऐसा तभी होता है जब आप झाड़ू को मंदिर में सूर्योदय से पहले दान करते हैं। ध्यान रखें दान किया जाने वाला झाड़ू धनतेरस के दिन के पहले से खरीदना होगा।
विज्ञान सम्मत और आज के जीवन में व्यावहारिक है हमारी धर्म संस्कृति मान्यताएं
ध्यान रहे कि हमारा धर्म संस्कृति विज्ञान सम्मत है साथ ही यह आज के जीवन में व्यावहारिक भी। इन दिनों साफ सफाई का विशेष महत्व है और झाड़ू से ही साफ सफाई की जाती है जिससे गंदगी को बाहर फेंका जाता है इससे घर की दरिद्रता नकारात्मकता माना गया है साफ सफाई के दौरान बीमारी फैलाने वाली गंदगी मच्छरों की भी सफाई हो जाती है इसलिए झाड़ू का सदुपयोग हमारे जीवन में विशेष महत्व रखता है और आम दिनों में भी यह उपयोगी रहता है साथ ही ऐसी चीज जो कि हमारे दैनिक जीवन में सहायक है उसका महत्व बढ़ जाता है इसलिए धनतेरस के दिन इसका महत्व बताया गया है।
धनतेरस की विभिन्न कथाएं
धनतेरस के दिन की प्रामाणिक कथाओं के साथ कई लोक कथाएं और मान्यताएं भी है जो हम आपको बताने जा रहे है। धनतेरस के सन्दर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या। दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हें परन्तु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया पर विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके।
एक दूत ने बातों ही बातों में तब यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है क्या। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यम देवता ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की संध्या यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की संध्या लोग आँगन में यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं। इस दिन लोग यम देवता के नाम पर व्रत भी रखते हैं।
धनतेरस के दिन की दूसरी कथा
धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोककथा है। कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुँचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा। परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी समय उनमें से एक ने यम देवता से विनती की- हे यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।
धनतेरस की पोराणिक एवं प्रामाणिक कथा
कथा के अनुसार देवताओं को असुरों के राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया था और ये देखकर राजा बलि से कहा कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें मना कर देना क्योंकि वो वामन साक्षात भगवान विष्णु है जो देवताओं की सहायता करने के लिए तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीनने आए हैं। परंतु बली ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी।
वामन भगवान ने सिर्फ 3 पग की भूमि मांगने का आग्रह किया । असुरों का राजा बलि तीन पग भूमि दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे तो बली को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में सूक्ष्म रूप धारण करके प्रवेश कर गए। इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्राचार्य की चाल को समझ गए और भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमंडल में ऐसे डाला कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई और शुक्राचार्य छटपटा कर कमंडल से बाहर निकल आए।
इसके बाद राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से पूरी पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पैर से पूरे अंतरिक्ष को तो तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान ही नहीं बचा तो बलि ने अपना सर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। दान में बलि सब कुछ गवा बैठा था इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन संपत्ति देवताओं से छीन ली थी इससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई इस उपलक्ष में भी धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है।