बारहमासा गणगौर कथा व व्रत की सम्पूर्ण विधि तथा नियम

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यह व्रत चैत्र सुदी रामनवमी के दिन शुरू होता है। यह सुहागन औरतें ही करती है। अखंड सुहाग, मंगल कामना, वंश वृद्धि, सद्बुद्धि व मोक्ष के लिए व्रत किया जाता है। एक कहानी के अनुसार इस व्रत को सर्वप्रथम राजा युधिष्ठिर व द्रोपदी ने भगवान कृष्ण से आज्ञा प्राप्त करके किया। जिससे मोक्ष प्राप्त हुआ। यह व्रत रामनवमी से एकादशी तक यह किया जाता है।

वैधव्य से छुटकारा दिलाता है ये व्रत –

बारहमासा गवर की पूजा विधवा स्त्री भी कर सकती है विधवाओं को भी इस व्रत उपवास के दिन दंत धावन स्नानादि करके शुद्ध वस्त्र पहन कर केवल केशर आदि की बिंदी लगाकर गौरी व्रत नियम पूर्वक करना चाहिए। संकल्प करना चाहिए। इसे करने से उन्हें आगे जन्म जन्मांतर तक वैधव्य नहीं होता।

बारहमासा गवर की कथा –

द्वारका में राजा कृष्ण राज्य कर रहे थे 1 दिन भगवान जंगल में घूमने गए। अपने शहर के बीच कृष्ण भगवान को उन्हीं के दुश्मनों ने अपहरण कर लिया। काफी समय तक श्री कृष्ण द्वारका नहीं आए तब सब सारी द्वारका नगरी चिंतित हो गई तब सत्यभामा और रुक्मणी ने ब्राह्मणों व विद्वानों को बुलाया उन्होंने गौरी पूजन के अनुष्ठान की सलाह दी तब द्वारका में मां गणगौर का पूजन विधि विधान से किया गया । तब श्री कृष्ण भगवान वापस द्वारका आए इसलिए कृष्ण भगवान ने मां गवरजा की कृपा से अपहरण से मुक्ति पाई। उसी दिन से गणगौर का उत्सव द्वारका नगरी में धूमधाम से मनाया जाता है।

इसी निरंतरता में महाभारत युद्ध में युद्ध के संपन्न होने के पश्चात महाराज युधिष्ठिर ने त्रिलोकेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी महाराज से पूछा कि हे प्रभु इतना नरसंहार हो गया है तो हम मुक्त कैसे होंगे ? तब भगवान का वचन था कि गणगौर यानी गौरी मां पूजन केवल देव लोक की कन्या ही कर सकती है परंतु आप जैसे मुमुक्षु धरती पर नहीं है तब रुक्मणी को कहा जाओ गंगाजल लाकर संपूर्ण भूमंडल को शुद्ध करो प्रभु आज्ञा अनुसार ऐसा किया गया परंतु द्रोपदी का मन असंतुष्ट था और उसने पूछ ही लिया की तन तो शुद्ध हो गया गंगाजल से परंतु मन शुद्ध नहीं हुआ तब श्री कृष्ण जी ने गणगौर व्रत 12 महीने तक करने का आदेश दिया व इसकी विधि बताई।

व्रत का नियम – क्या खाएं, क्या चढ़ाए किसकी पूजा करें –

चैत्र रामनवमीं से शुरू करें । चेत्र में पद देना चाहिये।
वैशाख में पीपल पूजन करना चाहिये व चप्पल दान देना चाहिये।

जेष्ठ माह में बड़ की पूजा करना व मांग कर पानी पीना, मटकी गिलास, लोटा गलना व टंकी भर पानी देना चाहिए।

आषाढ़ में जमीन पर सोना, सेज, चटाई, तकिया, चद्दर, पंखी, चप्पल, थाली व मिठाई देना चाहिए ।

श्रावण में हरी सब्जी ना खाना, हरी सब्जी दान देना।

भाद्रपद में दही न खाना, दही दान देना ।
अश्विन माह में खीर नहीं खाना बल्कि खीर दान करना चाहिए।
कार्तिक में तुलसी की पूजा करना, घी नहीं खाना । दीपक, रुई व माचिस दान देना चाहिए।
मार्गशीर्ष में मुंग नहीं खाना, मूंग दान देना ।
पौष माह में नमक नहीं खाना, नमक व खाण्ड दान देना।
माघ माह में कोरे घड़े के पानी से स्नान करना, सूर्य दर्शन कर बाहर निकलना चाहिए तथा दो वस्त्र पहनना, वस्त्र दान करना, सीधा दान देना चाहिए।
फाल्गुन माह में ठाकुर जी को गुलाब खेलाना, मंदिर में गुलाब दान देने का महत्व है।

चैत्र महीने में गवर पूजना। अमावस्या के दिन दीवार पर गवर मांड कर पूजा करनी । चैत्र सुदी बारस के दिन वस्त्र आभूषण सहित गवर किसी को पूजाना । जयंती व्रत हमेशा निकोट या फलाहार से करना उचित । सुआ, सूतक, नखत, प्रतिष्ठा व तुलादान का भोजन नहीं खाना। चैत्र माह में 16 सुहागिनों को भोजन करवाकर वस्त्र भेट करना चाहिये ।

बारहमासा गणगौर व्रत में वर्जित चीजे –

एकम से लगातार 16 तिथियों को क्रमशः निम्न चीजें व्रत के समय वर्जित बताई गई है:- कुम्डा, कटेरिका फल, लवण, तिल, खटाई, तेल, आंवला, नारीयल, काशीफल, परवल, निष्पाव, मसूर, बैंगन, शहद, जुआ व स्त्री प्रसंग ।

पद दान की वस्तुएं –

आसन, गौमुखी, रुद्राक्ष या तुलसी की माला, स्वर्ण की अंगूठी, कमंडल या लोटा, मिठाई, थाली, कटोरी, वस्त्र उपवस्त्र, यज्ञोपवीत, सुपारी दक्षिणा, छत्र/छाता व पगरखी कुल तेरह।

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