ब्रह्मचर्य क्या है ?

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सनातन धर्म में शरीर मन और अध्यात्म की सबसे उत्कृष्ट अवस्था को पाने के लिए ब्रह्मचर्य का आचरण करने को कहा गया है ब्रह्मचर्य के आचरण से आप यशस्वी बलवान और ज्ञानवान बनते हैं सत्य आपके मुख पर तेज की तरह चमकता है लेकिन आज समाज में ब्रह्मचर्य को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां है। समाज में अविवाहित पुरुष या स्त्री को ही ब्रह्मचारी माना जाने लगा है। अब विवेकानंद और दयानंद सरस्वती और अन्य महापुरुषों को इसलिए ब्रह्मचारी नहीं मानते कि वह ज्ञानी थे हम इसलिए मारते हैं क्योंकि वह अविवाहित थे। हम जानने की कोशिश ही नहीं करते की हमारे शास्त्रों और ग्रंथों में ब्रह्मचर्य को लेकर क्या दिया गया है। पूरे आर्टिकल को पढ़ लेने के बाद सही मायने में आपको ब्रह्मचर्य का पता चलेगा और सभी इस सनातन संस्कृति के ब्रह्मचर्य के नियम को समझकर पालना करेंगे। तो आइए हम जानने है की ब्रह्मचर्य क्या है इसका पालन कैसे होता है और क्यों करना चाहिए।

ब्रह्मचर्य का अर्थ

अगर ब्रम्हचर्य का शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो ‘ब्रह्म’ का मतलब होता है कि जो अनंत है अनादि है परम सत्य है। ‘चर्य’ का मतलब होता है आचरण करना। अगर परिभाषा देखी जाए तो वह सभी आचरण में ब्रह्म की तरफ ले जाते हैं, परम सत्य की तरफ लेकर जाते हैं, वह सभी ब्रह्मचर्य के अंतर्गत आते हैं। ब्रह्मचर्य सनातन धर्म के सबसे शुद्ध आचरण में आता है जो सभी लोगों के लिए है भी नहीं। जो आम क्रियाकलापों में दिन बीतते है जिनको परिवार बनाना है जिनकी जरुरते है आकांक्षाएं है उनके लिए ब्रह्मचर्य नहीं है। ब्रह्मचर्य उन्हीं के लिए है जीवन में सबसे उत्कृष्ट अवस्था में पहुंचना है और स्वयं ब्रह्म हो जाना है।

प्रकृति और ब्रह्मचर्य का संबंध

प्रकृति ने मनुष्य को छोड़कर जितनी भी चीजें हैं वह सभी ब्रह्मचर्य से बंधी हुई है वह सभी ब्रह्म के नियम या कहे प्रकृति के नियम को मानते है। उनकी ब्रह्म के विरुद्ध या प्रकृति के विरुद्ध खुद की कोई सत्ता नहीं होती है। जैसे चलाई जाती हैं वैसे ही वह चलती हैं चाहे पशु हो पक्षी हो या वृक्ष हो। लेकिन मनुष्य ही ऐसा जीव है जो ब्रह्म के विरुद्ध जा सकता है। इसीलिए वो सभी आचरण वो सभी कर्म जो ब्रह्म की तरफ ले जाते हैं, सत्य की तरफ ले जाते हैं, प्रकृति की तरफ ले जाते है वो सभी ब्रम्हचर्य में आते हैं।

ब्रह्मचारी को क्या करना चाहिए क्या नहीं –

ब्रह्मचारी के आचरण में बहुत सारे ऐसे कर्म होते है जो ब्रह्मचारी को करने होते हैं । इनमें सबसे पहले आती है ‘अहिंसा’ । जब आप शक्तिशाली हो और फिर भी किसी पर हिंसा ना करें और किसी को कष्ट न पहुंचाएं तो आप परम शक्तिशाली बन जाते हैं । अपनी शक्ति का प्रयोग अपने के बराबर से या फिर अपने बराबर या कोई ज्यादा शक्तिशाली दुश्मन है तो उसपर करें उसका अनायास प्रयोग ना करें ।

दूसरा दृष्टिकोण यह है कि जब आप शक्ति का प्रयोग करें किसी पर हिंसा करते हैं तो आप कर्म के बंधन में फंस जाते हैं और सांसारिक बाधा उत्पन्न होती है आपके ब्रह्मचर्य के मार्ग को बाधित करती है। इसलिए अहिंसा को सबसे ऊपर रखा गया है और इसी लिस्ट में फिर आगे बोला गया है कि सत्य बोलना चाहिए हमेशा सत्य का समर्थन करना चाहिए । उसके बाद ध्यान करना चाहिए । ज्ञानार्जन करना चाहिए। नशे से दूर रहना चाहिए । और केवल यौन सुख के लिए जो संभोग किया जाता है उससे भी दूर रहना चाहिए। बहुत ढेर सारे ऐसे काम है जो ब्रम्हचर्य के आचरण की लिस्ट में दिए गए हैं।

एक बात समझना बहुत जरूरी है वह यह कि ऐसा क्या कारण रहा है ऐसी कौन सी बातें हो गई हम ने कौन से श्लोक पढ़ लिए हैं या उनका गलत इंटरप्रिटेशन कर लिया है जिससे आज हमें लगता है कि ब्रह्मचर्य केवल और केवल के लिए जो किया गया संभोग है उससे दूर रहने की आचरण को माना जाने लगा है तो पहले ये देख लेते है।

ब्रह्मचर्य का इंद्रिय सुख से संबंध

पतंजलि जी के योग सूत्र में 2 सूत्र ऐसे आते हैं जो ब्रह्मचर्य के संदर्भ में सबसे ज्यादा प्रयोग में लाए जाते हैं पहला सूत्र है दूसरे अध्याय में तीसवा सूत्र जो बोलता है कि

– अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्य परिग्रहा यमा:

और दूसरा सूत्र भी इसी अध्याय में आता है 38 वां सूत्र है कि

– ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायाम वीर्य लाभः

पहले सूत्र में पतंजलि जी ने पांच यम के बारे में बताया है यम वह कर्म होते जो हमें नहीं करना है उन्होंने बताया कि हमें हिंसा नहीं करनी है हमें असत्य नहीं बोलना है हमें चोरी नहीं करनी है फिर उन्होंने हमें अपनी इंद्रियों को वश में रखना है यानी ब्रह्मचर्य के बारे में बताया है।

उसके बाद पांचवा बताया है कि हमें किसी भी चीज का संग्रह नहीं करना है मतलब अपरिग्रह तो यहां पर क्या हुआ है कि यहां पर चूंकि ब्रह्मचर्य को सत्य अहिंसा और असत्य के साथ अलग से रखा गया है इसलिए हमें लगने लगता है कि यह कोई अलग चीज है। फिर हम इसका अर्थ निकाल लेते हैं कि अपने गुप्तांगों को या फिर गुप्त इंद्रियों को वश में रखने को ब्रह्मचर्य माना जाता है। लेकिन अगर व्यास जी का भाष्य देखे जिसमे उन्होंने पतंजलि जी के सूत्रों पर कहा है पतंजलि के योग सूत्र में उन्होंने कहा है जो ब्रह्मचर्य है जो ब्रम्हचर्य यम है उसके लिए विशेष रूप से संयम शब्द का प्रयोग किया है। इसमें सम उपसर्ग को यम में जोड़ेंगे तो संयम बना हैं । इसका अर्थ यह होता है कि वह सभी आचरण या ऐसे कर्म जिनको करने पर आपकी सारी की सारी इंद्रियां एक साथ उत्तेजित हो जाती हो आवेशित हो जाती हो और आपके नियंत्रण से बाहर चली जाती हो तो उनको नियंत्रण में रखना है उनको वश में रखना है उसको ब्रह्मचर्य बोला गया है। ऐसा नहीं बोला कि केवल गुप्त इंद्रिय ही। यह बोला कि कोई भी ऐसा कर्म है इसमें सारी की सारी इंद्रियां एक साथ आपके नियंत्रण के बाहर जा रही हो तो उनको रोकना ब्रह्मचर्य का पालन करना है और उनमें से एक योन क्रीड़ा भी है।

अब जो सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और अहिंसा जो चीजें हैं यह हमें लगने लगा है कि ब्रह्मचर्या से अलग है । लेकिन अगर आप छांदोग्योपनिषद के आठवें अध्याय के पांचवे खंड को देखेंगे तो पूरा का पूरा जो चैप्टर है पूरा पूरा अध्याय है वह ब्रह्मचर्य पर ही है वहां पर बताया गया है कि सत्य बोलना, मनन करना, यज्ञ करना, त्याग करना, वन में संन्यासी की तरह अपना जीवन, ईश्वर की भक्ति करना ये सभी ब्रह्मचर्य के अंतर्गत आते हैं । क्योंकि यह सभी आपको ब्रह्म की तरफ ले जाते हैं । पूरे अध्याय में वहां पर यौन सुख की बात नहीं की गई है बात यह कि गई है कि जो इंद्रियों के बाहर ही सुख है जो बाहरी विषय है उनसे दूर रहना चाहिए चाहे वह किसी भी प्रकार के हो।

ब्रह्मचर्य और वीर्य का संबंध

जो दूसरा योगसूत्र है जो कि इसी अध्याय का 38 वां सूत्र है कि

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायाम वीर्य लाभः

तो अक्सर इस काम क्या अर्थ निकाल लेते हैं कि ब्रम्हचर्य कि जब सिद्धि होती है तो वीर्य का लाभ होता है और जब इसको हम इसका आगे भावार्थ निकालते हैं तो इसका मतलब निकाल लेते हैं कि अगर हम यौन क्रीड़ा करेंगे ही नहीं तो हमें वीर्य का नाश नही करना पड़ेगा। फिर उस वीर्य संचन से हमें लाभ मिलता है। लेकिन व्यास जी ने जो इसका भाष्य किया है पतंजलि योग सूत्र में तो वहां पर उन्होंने बताया कि यह वीर्य का मतलब नर के ‘शुक्राणुओं’ से नहीं है यहां पर वीर्य का मतलब ‘ पराक्रम ‘ से है। मतलब जब ब्रह्मचर्य की सिद्धि करते हैं आपके अंदर प्रतिष्ठित हो जाता है तो आप बलवान हो जाते हैं शक्तिशाली हो जाते हैं यहां पर वीर्य का मतलब शक्ति से है ना कि वीर्य संचन से है। और अगर हम यह मान भी लें कि यहां पर जो बात हो रही है वह वीर्य संचन और उससे उत्पन्न बल की हो रही है तो अथर्ववेद के 11वें कांड के पांचवें सूत्र में पूरा का पूरा ब्रह्मचर्य पर सूत्र दिया गया है वहां पर एक मंत्र आता है

ब्रह्मचर्याण कन्या युवान विंदते पतीम।

जिसका अर्थ होता है कि कन्या ब्रह्मचर्य से परिपूर्ण विदुषी और युवती होकर पूर्ण ब्रह्मचारी विद्वान युवा पुरुष से विवाह करें। तो हम देख सकते हैं कि ब्रह्मचर्य केवल पुरुषों या बालकों के लिए ही नहीं है बल्कि महिलाओं और बालिकाओं के लिए भी है तो अगर हम उस सूत्र को देखे जहां पर बोला गया है कि

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायाम वीर्य लाभः

तो यहां पर वीर्य का अर्थ नर के वीर्य से करना उचित नहीं है क्योंकि वहां पर जो वीर्य का अर्थ है वह बालिकाओं के लिए भी है इसलिए वहां पर वीर्य का अर्थ शक्ति और तेज से करना चाहिए।

अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य का विवरण

अथर्ववेद के इसी 11 वें कांड में जो 5 वा सूत्र से जो कि पूरा का पूरा ब्रह्मचर्य दिया गया है इसमें ब्रह्मचर्य आश्रम कैसा होता है और उसमें जो ब्रह्मचर्य के नियम होते हैं वह कैसे होते हैं पूरा बताया गया है 26 मंत्रों में । तो इसमें से जो मुख्य मुख्य तथ्य हैं वो बताए जा रहे है। पहला तथ्य निकलकर आता है इसमें इसमें चौथे मंत्र में बताया गया क्योंकि हमें लगता है कि ब्रह्मचर्य जो है वह केवल सुखों का त्याग है इंद्रियों को वश में करके । लेकिन ब्रह्मचर्य इससे भी बढ़कर है। चौथे मंत्र में बताया गया है कि एक ब्रह्मचारी को पृथ्वी का ज्ञान, जो हमारा सौरमंडल है उसका ज्ञान और सौर मंडल के आगे भी जो चीजें उसका ज्ञान होना चाहिए। इसलिए उपनयन संस्कार के बाद जो शिष्य अपने गुरुकुल में जाता था तो वहां पर उनको खगोल विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) भी पढ़ाई जाती थी क्योंकि ये ब्रह्मचर्य का एक हिस्सा है कि उनको हमारी पृथ्वी, सौरमंडल, सूर्य आदि इसके आगे भी हमें ज्ञान होना चाहिए तो ज्ञान परंपरा में ब्रह्मचर्य का हिस्सा है।

क्या ब्रह्मचारी विवाह नही कर सकता ?

ब्रह्मचार्ये ति समिद्ध: काष्णम वसानो दिक्षितो दीर्घश्मश्रु:। स सद्य एति पूर्वस्मादूत्तरम समुद्रम लोकांतसंगृभ्य मुहुराचरिक्रत।। (अथर्ववेद 11.5.6)

इसी सूत्र के छठे मंत्र में बोला गया है कि ब्रह्मचारी अपने ज्ञान से प्रकाशित होकर एक आकर्षक व्यक्तित्व के साथ गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है और उसके बाद सत्य और ज्ञान का क्या मूल्य है और उसका क्या प्रयोग है उसकी घोषणा करता है ।

तो मतलब जो शुरू के 20-25 साल हम ब्रह्मचर्य आश्रम में बिताते है। ज्ञान का अर्जन करते हैं गुरु के साथ रहते हैं तो उस ज्ञान के प्रकाश से हम एक नए युवक की तरह बनते हैं तो उसके बाद हमारे पास दो ऑप्शन होते हैं कि हम एक ब्रह्मचारिणी कन्या से विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करें या फिर हम आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करें । यह दोनों ऑप्शन होते हैं ऐसा नहीं है कि ब्रह्मचारी विवाहित नहीं हो सकता है बस यह बस बताया गया है कि विवाह उपरांत अगर आपको ब्रह्मचर्य का आगे भी पालन करना है तो आपको केवल प्रजनन के लिए ही यौन संबंध बनाने चाहिए उसके अलावा नहीं बनाने चाहिए और दोस्तों हमारे शास्त्रों में ऐसे भी उदाहरण देखे गए हैं यहां पर गृहस्थ आश्रम में जाने के बाद भी बहुत से लोगों ने ब्रह्मचर्य का पालन फिर से शुरू कर दिया । आप अगर छांदोग्य उपनिषद के पांचवें अध्याय के 11 में खंड को देखेंगे तो वहां पर ऋषि कैकेई के पास बहुत से ऐसे गृहस्थ आश्रम के लोग थे जो दोबारा ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए ब्रह्मचारी बन गए थे।

ब्रह्मचर्य के लाभ

ब्रम्हचर्य के आचरण से आपकी आयु बढ़ती है उम्र बढ़ती आप दीर्घायु होते हैं अथर्व वेद के उसे 11 कांड के पांचवें सूक्त में 19वां मंत्र अगर आप पढ़े तो वहां पर बताया गया है कि अगर आप ब्रम्हचर्य का आचरण करते हैं और इंद्रियों को वश में रखते हैं तो आप आकस्मिक मृत्यु से बचकर दीर्घायु होते हैं। तो ब्रम्हचर्य ब्रह्म के परम सत्य की ओर अग्रसर करने वाले सभी आचरणों को कहते हैं जिसका व्यभिचार या फिर जो हमारी इंद्रियों के बाहर जो सुख है उनका निषेध एकमात्र अंग है । उसको पूरा ब्रम्हचर्य से जोड़ देना उचित नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण अंग है जो सेलिबेसी का कांसेप्ट है कि कम से कम हमें अपने वीर्य का नाश करना चाहिए या फिर कम से कम यौन संबंध बनाने चाहिए केवल प्रजनन के लिए बनाना चाहिए।

ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥ — (अथर्ववेद ११.५.१८)
अर्थ– वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।

ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।
आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥ — (अथर्ववेद ११.५.१९)
अर्थ– पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है।

अगर आप मन, वाणी व बुद्धि को शुध्द रखना चाहते है तो आप को ब्रह्मचर्य पालन करना बहुत जरुरी है आयुर्वेद का भी यही कहना है कि अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया 3 महीनो तक करते है तो आप को मनोवल, देहवल और वचनवल मे परिवर्तन महसूस होगा , जीवन के ऊँचे से ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का जीवन मे होना बहुत जरुरी है।

ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।
ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढाता है।
ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।
ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।
ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।
ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।

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