शीतलाष्टमी को ठंडा भोजन करने से नहीं होते रोग, गधों की भी होती है पूजा

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शीतलाष्टमी को ठंडा भोजन खाने से होती है कृपा,नहीं होता चेचक,माता व खसरा

चैत्र कृष्ण अष्टमी को शीतलाष्टमी पर्व इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और बासी यानी ठंडा भोजन पकवान उनको चढ़ाया जाता है। राजस्थान में यह अष्टमी बड़े धूम धाम से मनाई जाती है। अष्टमी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता, घरों की औरतें सप्तमी को पूरे परिवार व आने वाले मेहमान का अंदाज लगाकर व्यंजन तैयार करती है। गुड़ राब,खट्टी राबड़ी, बाजरा रोटी, मस्सी रोटी, गेंहू रोटी, हलवा, मोगर पूड़ी,बेसन की मसालेदार पूड़ी, जो कई दिनों तक खराब नहीं होने वाली सांगरी सब्जी, मिर्ची अचार, भरता व टिकला तैयार कर रखा जाता जो दूसरे दिन अष्टमी को माता शीतला के मंदिर अथवा मटकी की पूजा कर भोग लगाने के बाद सुबह से रात तक सिर्फ ये ही पकवान सब लोग खाते है।

मान्यता है माता शीतला को ठंडे पानी व ठंडे पकवान चढ़ाने से घर माता की कृपा बनी रहती है और घर मे चेचक, छोटी माता, बड़ी माता, खशरा व स्किन सम्बन्धी रोग नहीं आते,अगर है तो जल्द ही ठीक हो जाएंगे। कई लोग दो ठंडे खाते है, होली से पहले सोम या गुरुवार जैसे ठंडे वार को ठंडा खाते है और होली के बाद अष्टमी को या ठंडे वार को। कई लोग ठंडा खाना को बास्योड़ा कहते कुछ बासी कहते है। इस बुधवार को दिन भर घरों में देशी व दूसरे दिन खराब न होने वाला पकवान भोजन बनाया जाएगा और गुरुवार को ठंडा खाया जाएगा। ऑफिसों में टिफिन में भी ये ठंडे पकवान देखे जा सकेंगे ।

शहर में इस दिन न केवल जहाँ शीतला माता का मंदिर है वहाँ भीड़ होगी बल्कि इनकी सवारी गधे की भी पूजा होगी ।माता के एक हाथ मे झाड़ू व दूसरे में कलश विधमान । मन्दिर में माता को झाड़ू चढ़ाने की परम्परा है ।

रमक झमक
(1)हमारी सस्कृति में हर जीव जंतु का महत्व बताया गया है ।
(2)ठंडा खाना, ये के आस्था व विश्वास के साथ मौसम परिवर्तन भी एक विज्ञान समत्त प्रतीत होता है ।
(3)झाड़ू का संकेत घर की पूर्ण साफ सफाई रखने का संकेत है जिससे रोग नही फेल पाए और दरिद्रता दूर होती है।

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