‘सावो टिपग्यो रे, किण नै ही म्हारे पर दया नीं आई रे’ पुष्करणा सावे के अवसर पर हुआ कवि सम्मलेन देखे वीडियो

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‘कल तक खेली कूदी झगड़ी, इस घर के आंगन में, तेरी किलकारी से आती खुशियां,इस जीवन में’ विदाई गीत की ये पंक्तिया शुक्रवार को रमक झमक संस्थान की ओर से पुष्करणा सावा ऑलम्पिक के उपलक्ष्य में आयोजित ‘सावा काव्य धारा’ कार्यक्रम में कवि संजय आचार्य वरुण ने प्रस्तुत की । कार्यक्रम में कवि कथाकार कमल रंगा नर ‘सावा है भाइपे री,सामूहिकता रौ भाव है’ प्रस्तुत की । हास्य व्यंग्य कवि बाबूलाल छंगाणी ने सावा धमाल ‘सावो टिपग्यो रे,किण नै ही म्हारे पर दया नीं आई रे’ प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को गुदगुदाया । डॉ कृष्णा आचार्य ने घर आंगन में बेटी के महत्व का गीत ‘आ बाबाजी री लाडली म्हाने लागे बाली रे’ पढ़कर सराहना प्राप्त की । कवि जुगलकिशोर पुरोहित ने ‘कालजिये री कोर तू म्हारी लाडली’ रचना का पाठ किया ।आनन्द मस्ताना पुरोहित ने अपनी रचना ‘लेवण म्हारी लक्ष्मी ने,म्हे विष्णु रूप में जाउला’ के माध्यम से विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकने का संदेश दिया । कार्यक्रम के आरम्भ में रमक झमक के अध्यक्ष प्रहलाद ओझा ‘भैरू’ ने कहा कि ‘ऑलम्पिक सामूहिक सावा हमारी सास्कृतिक व सामाजिक धरोहर है । साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से सावे की रमक झमक को दूर दूर तक पहुचा रहे है । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुवे राजस्थानी के वरिष्ठ कवि शिवराज छंगाणी ने कहा कि 1300 वर्ष पुरानी परम्परा पूरे भारत की पहचान है । साहित्यकार व कवि की कलम में भी सावा का चित्रण अनूठा कार्य का प्रयास है रमक झमक का । राधे ओझा ने आभार व्यक्त किया ।

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