करवो ले बाई करवो ले भाइयो री बहना करवो ले- करवा चौथ की कथा, महत्व व पूरी जानकारी

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सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा व्रत करवा चौथ आ रहा है। इस व्रत को लेकर महिलाएं बेहद उत्साहित रहती है। नए कपड़े खरीदने से लेकर व्रत के लिए उपयोग में आने वाले चलनी/छलनी तक की सजावट करती है। करवा चौथ का व्रत मुख्यतः उत्तर भारत के राज्यों में प्रचलित था लेकिन अब टीवी में धारावाहिकों और फिल्मों के माध्यम से यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। आज लगभग पूरे भारत मे ही करवा चौथ के व्रत को बड़े ही उत्साह के साथ उत्सव के रूप में मनाया जाता है। सुहागिन महिलाओं द्वारा इस व्रत को अपनी पति की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए निराहार रहकर सम्पन्न किया जाता है। हालांकि इसकी कहानी कथाओं और मान्यताओं में स्थानीय प्रभाव अलग अलग है । कुछ जगह इसे अलग अलग स्वरूप में मनाया जाता है लेकिन ये जरूर है कि पूरे देश मे महिलाओं द्वारा इस व्रत को रखा जाता है।

महिलाओं के लिए उत्सव है करवा चौथ

ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ करवाचौथ का व्रत बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय चतुर्थी के दिन किया जाता है। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की पूजा अर्चना का भी विशेष महत्व माना जाता है। करवाचौथ में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।

क्या है ‘करवा चौथ’ का अर्थ

करवा चौथ में ‘करवा’ का अर्थ मिट्टी के बर्तन से है करवा मिट्टी तथा तांबे का भी होता है। ‘चौथ’ का अर्थ चतुर्थी तिथि से है। इस दिन करवे का विशेष महत्व होता है महिलाएं करवे को विशेषरूप से सजाकर तैयार करती है। करवे के अलावा मिट्टी से 10 की संख्या में दशरथि (मिट्टी के कुलड़े की तरह) भी बनाकर इनकी पूजा की जाती है। कहीं कहीं चौथ माता की पूजा की जाती है तो कहीं दीवार पर 10 आकृतियां बनाकर भी पूजा की जाती है।

‘करवो ले करवो ले’ भाइयो री बहना ‘करवो’ ले

करवा चौथ के दिन सुबह या दोपहर को देवरानी-जेठानी, ननद-भाभी तथा घर की सुहागिन महिलाएं एक दूसरे के सामने या गोल घेरे में बैठकर एक दूसरे को करवे का आदान-प्रदान करती है। करवे के ऊपर छलनी को रखा जाता है और इसके ऊपर खाजा (मैदे से बना हुआ), बेर, फली, काचर, रुपये आदि रखे जाते है। महिलाएं एक दूसरे से लेनदेन करते हुए ‘करवो ले बाई करवो ले भाइयो री बहना करवो ले, कलह काटनी करवो ले, चालनी/छलनी में चांद देखणी करवो ले, उवा सुवा करवो ले, व्रत भाँगणी करवो ले’ स्थानीय भाषा मे ये गीत गाती है। इसके पश्चात महिलाएं एक दूसरे के लिए अमर सुहाग की कामना करती है।

गौरीपूजन तथा सुहाग के श्रृंगार भेंट का महत्व

सौभाग्यवती (सुहागिन) महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहाते समय सिर के बाल धोती है और नए कपड़े पहनकर श्रृंगार कर तैयार होती है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन मेहंदी लगती है और माता गौरी (पार्वती माता का रूप) और भगवान शिव तथा गणेश की पूजा करती है। अखंड सौभाग्य के लिए माता गौरी को सुहाग सामग्री भी भेंट की जाती है । व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सुहाग के श्रृंगार का सामान चूड़ी, टिकी, मेहंदी, शीशा, कंघी, सिंदूर आदि सुहागिन सुहासिनी औरतों को या मंदिर में भेंट करती है।

करवा चौथ पर चंद्रमा का विशेष महत्व

करवा चौथ का व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन अपना व्रत शाम चंद्रोदय के पश्चात ही खोलती है। कई जगह शाम हो जाने के बाद निर्जल रहकर महिलाएं चंद्रोदय का इंतिजार करती है। चंद्रमा उग जाने के बाद महिलाएं छत पर जाकर चंद्रमा को अर्घ्य देती है। छलनी के जरिये चंद्रमा के दर्शन करती है और घी के दीपक से चाँद की आरती करती है। चंद्रमा से पति के लंबे और खुशहाल जीवन के लिए प्राथना करती है। पूजा हो जाने के बाद महिला घर परिवार में मौजूद अपने बड़ो के पैर छूकर आशीर्वाद लेती है। अपने पति से आज्ञा लेकर ही पत्नी अपने व्रत को खोलती है और प्रसाद ग्रहण करती है।

इस बार चंद्रोदय का समय

करवा चौथ बुधवार दिनांक 4 नवंबर 2020 को होगा साथ ही इस दिन गणेश चौथ का व्रत भी होता है। चंद्रोदय का समय रात्रि 8: 31 पर होगा।

करवा चौथ की कथा

हज़ारो सालो से चली आ रही परम्पराओं में कई कहानियां और कथाएं जुड़ती चली जाती है। ऐसे ही करवा चौथ की कथा भी महाभारत काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि श्री कृष्ण के कथा कहे जाने के बाद सबसे पहले यह व्रत द्रौपदी ने रखा था। समय उपरांत कई कहानियां इससे जुड़ती चली गई है जिनमे कई प्रचलित कथाएं है उनमें से मुख्य हम आपके साथ साझा कर रहे है।

एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपने काम से घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।

इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है और उसके पैर पकड़ लेती है। (कहीं कहीं कथा में 10 दशरथियों का स्थान बताया गया है।)

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

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4 Thoughts to “करवो ले बाई करवो ले भाइयो री बहना करवो ले- करवा चौथ की कथा, महत्व व पूरी जानकारी”

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