सांस्कृतिक

मौसम और राशन पर ख्याल बनाने व रम्मत के लिये प्रसिद्ध शहर

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बिस्सो का चौक
बीकानेर शहर यात्रा(5)
संजय श्रीमाली, उस्ताबारी, बीकानेर।

बिस्सों के चौक में बिस्सा जाति के बाहुल्य के कारण इस चौक का नाम बिस्सों का चौक हुआ। बिस्सा जाति के लो बीकानेर की बसावट के समय से ही यहां आकर बसने प्रारम्भ हो गये। पोकरण के पास ‘बीला’ गांव से काम की तलाश में यहां आना प्रारम्भ हुए। बिस्सों के चौक में रहने वाले लोगों का मुख्य कार्य रसोई बनाना तथा खाता-बही का कार्य करना था।
बिस्सों के चौक का क्षेत्रफल बहुत कम है। बिस्सों के चौक के पूर्व में बिन्नाणी चौक, पश्चिम में व्यासो का चौक, दम्माणी चौक उतर में डागों का चौक तथा दक्षिण में व्यासों का चौक है। बिस्सों के चौक में काफी समय पूर्व से ही ख्याल बनाकर गाये जाते रहे है। यहां के लोग मौसम एवं राशन विषय पर ख्याल गाते बनाते थे। इस चौक में होली पर आयोजित रम्मत में बाहर से पार्टियों को बुलाया जाता था। भगत पूर्णमल तथा नौटंकी की रम्मत का वृहद आयोजन हुआ करता था। पिछले 50 वर्षों से ‘रमणसा बिस्सा’ के नाम से रम्मत हो रही है। रमणसा बिस्सा बजरंग व्यायाम शाला के उस्ताद थे। रमणलाल जी बिस्सा ‘रमणसा बिस्सा’ गंगासिंह के समय रायबहादुर (पदवी डागा परिवार) के घर पर खाता-बही का काम करते। जुबली गंगासिंह के समारोह के आयोजन में ‘रमणसा’ ने भी अहम भूमिका निभाई थी। वर्तमान में चौक में नौटंकी रम्मत विशेषकर होती है इसमें भुजाई (भाभी) के ताने देने पर देवर के संवादों का बहुत ही रोचक एवं व्यग्यात्म संवाद ख्याल के माध्यम से गाया जाता है।

Bissa chowk bikaner

Bisso ka chowk


एक समय सोनारों की गुवाड में नौटंकी रम्मत हो रही थी। उस समय नौटंकी बने मूलचंद दास स्वामी जो नौटंकी का पात्र निभा रहे थे उनकी सुन्दरता पर मोहित होकर एक स्त्री ऊपर से गिर गई और उसका देहान्त हो गया। इस घटना के बाद गंगासिंह ने नौटंकी रम्मत को बंद करवा दी। उसके बाद बीकानेर नगर में नौटंकी रम्मत का आयोजन नहीं होता था। श्री रमणसा बिस्सा ने ‘महाराजा गंगासिंह जी’ से मंजूरी लेकर बिस्सों के चौक में दुबारा आयोजन करवाया।
Bissa chowk bhairav mandir

Bissa chowk Bhairav Mandir


बिस्सों के चौक में मुख्य रूप से जागनाथ जी बिस्सा महापुरूष हुए जो कि पूजा-पाठ के साथ साथ बहीखाता का कार्य करते थे। इसी प्रकार रामसुखदास बिस्सा बहीखाते का काम करते थे। राजा सूरजसिंह के समय में श्री रामसुख दास बिस्सा ने तय किया कि वह पुष्करणा समाज के सभी लोगों को खाना खिलायेगे। कई लोगो ने खाने पर इतराज किया, लेकिन खाना हुआ। खाना बन रहा था किसी ने कह दिया कि इसमें लकड़ी दो और बीकानेर के दीवान ने उसमें लकड़ी दे दी अब सब जगह इस बात का प्रचार हो गया सभी ने कहा की वाह रे रामसुख दास तुम्हारे खाने में तो बीकानेर के दीवान ने लकड़ी दी, उस समय यह बहुत बड़ी बात थी।

बिस्सों के चौक के लोग घोड़े भी रखते थे। इसमें श्री चम्पालाल जी बिस्सा प्रमुख है। श्री नृसिंह दास बिस्सा (नृसिंह महाराज) जिनके पास पाकिस्तानी घोड़ा (पाकिस्तान लाया हुआ) था। यह घोड़ा 17 वर्ष तक घुड़ दौड़ में प्रथम रहा।
फोटो – श्री शिवकुमार रंगा

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पाटों पर रात को भविष्य देखने वाला शहर

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बीकानेर शहर यात्रा(4)
भट्ठड़ों का चौक
-संजय श्रीमाली, उस्ता बारी, बीकानेर।

बीकानेर शहर परकोटा ज्योतिषियों पंडितों के लिये भी जाना जाता है लेकिन रात को पाटे पर बैठकर कुण्डली देखने की बात आए तो समझ लीजिये भट्ठड़ों के चौक की बात हो रही है ।

भट्ठड़ों के चौक का पुराना नाम पिपलियों का चौक था। लगभग 100 वर्ष पहले चौक के बीचो-बीच बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था जिसके कारण यह पीपलियों के चौक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस चौक में भट्ड जाति के लोगों के घर अधिक थे तथा इसके अलावा सेवग, नाई, पुष्करणा ब्राह्मण एवं श्रीमाली जाति के भी कुछ घर रहे। उस समय भट्ठ परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध थे। भट्ड जाति के लोगों का बीकानेर रियासत में महाराजाओं के आना-जाना था।एक समय भट्ठ परिवार में लड़के की शादी थी उस दौरान उस शादी का भव्य झलसा किया गया। इस झलसे की चर्चा पूरे बीकानेर रियासत में हुई तथा उसी दिन से इस चौक को भटठड़ों के चौक से जाना जाने लगा।

Bhatdo ka chowk bikaner

Bhatdo ka chowk bikaner

भट्ठड़ों के चौक के पूर्व में बाहेती चौक, पश्चिम में बेणीसर बारी, उतर में बारह गुवाड़ तथा दक्षिण में आचार्यों की घाटी लगती है। चौक में चारो दिशाओं में रास्ते निकलते है जो अलग-अलग मोहल्लों में निकलते है। चौक के बीच में श्री रघुनाथ जी का प्राचीन मंदिर बना हुआ है जो कि रावतसर के ठाकरों का है, तथा लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत के ससुराल वालो का है।

भट्ड़ों के चौक में नाईयों की गली (टोपसिया नाईयों की गुवाड़), जाल की गली (अतीत में इस गली में जाल का पेड़ था इस कारण यह गली जाल की गली के नाम से पसिद्ध है), आंचलिया का फळसा (ओसवाल जाति) आदि है। आंचलिया फळसा में ओसवाल जाति के लोग रहते थे। अतीत में राजा रतनसिंह जी के समय में किसी बात को लेकर अनबन होने के कारण रातो-रात यह लोग यह फळसा छोड़ कर चले गये तथा इस फळसे की जिम्मेवारी कालूराम जी व्यास को दे दी।

भट्डों के चौक में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर करीब 200 वर्ष पुराना है साथ ही में चौक के मध्य में अचलेश्वर वाचनालय संचालित होता था। यह वाचनालय वेदमित्र व्यास एवं श्री गणेश दत्त जी की देखरेख में संचालित होती थी तथा कालान्तर में 1967 में श्री कन्हैयालाल व्यास की देखरेख में इस मंदिर एवं वाचनालय का जिर्णोद्वार हुआ।

Bhatdo ka Chowk Pata Bikaner

Bhatdo ka Chowk Pata Bikaner

चौक के बीचो-बीच पानी भरने का स्टेण्ड स्थित है। इस स्टेण्ड को श्री रिखभदास बाहेती द्वारा निर्माण करवाया गया। पानी के स्टेण्ड के पास सर्दियों में देर रात तक धूणा जलता है, वहीं गर्मियांं में पाटे पर देर रात तक चौक के लोग बैठते है।

होली के अवसर पर चौक में फागूराम जी व्यास की रम्मत होती थी। इस रम्मत के लिए रियासत से परमिशन नाई जाति को दी जाती थी। यह नाई समाज की रम्मत थी और फागुजी को उस्ताद समझते थे। वहीं ख्याल आदि बनाते थे। चौक के श्री मूलजी के लड़के श्री गंगादास जी सेवग को तकनीकी ज्ञान बहुत था। श्री गंगादास सेवग होली पर आयोजित होने वाली रम्मत में गत्ते की घोड़ी बनाकर कच्छी घोड़ी नृत्य करते थे, इस प्रकार का नृत्य बीकानेर रियासत में सबसे पहले इन्होंने ही किया। होलीका दहन के समय नाई समाज के गुरू छंगाणी (खाबेड़ी) परिवार वालों को बुलवाया जाता है तथा नाई समाज के चौधरी इस होली को मंगलाते है। उसके पश्चात नाई समाज की गेवर निकलती है। श्री अन्नत लाल श्रीमाली भजन, रम्मत एवं वाणियों के उस्ताद थे। श्री लूणजी नाई भी वाणियों के लिए प्रसिद्ध थे।

भटड़ों के चौक में आरम्भ से ही शिक्षा के प्रति लोगों का रूझान रहा है। भारत आजाद होने के उपरान्त जब ‘फिकी’(फेडरेशन चेम्बर कॉमर्स और इण्डिस्ट्रीज) का गठन किया गया तथा इस चौक के श्री भतमाल भटठ को चेयरमेन नियुक्त किया गया। श्री सूरज करण आचार्य ‘ज्योतिषाचार्य’ ने लगभग 90 वर्ष पहले अपने पैसो से पांवर हाऊस से भट्डों के चौक तक बिजली के खम्बें लगवाकर बिजली का प्रबन्ध किया।

इसी चौक के श्री गणेश दास भटड पुत्र श्री केवल दास भटड बांगड़ ग्रुप के आर्थिक सलाहकार थे। उस समय में श्री सुन्दरलाल भट्ड हिन्दूस्तान मोटरर्स के चेयरमेन थे तथा इनके भाई मोहनलाल भटड ओरिएन्टल कम्पनी में एम.डी. के पद पर आसीन थे। मोहल्ले के पोला महाराज बड़े तपस्वी थे।

Mahadev Mandir Bhatdo ka chowk

Achleshwar Mahadev Mandir

श्री गोवरधन दास बोड़ा बिड़ला परिवार के मुख्य रसोइये थे। चौक के शिवप्रताप व्यास एवं श्री मदनगोपाल जी बीकानेर के जाने-माने रसोईये थे। इनकी विशेषता थी कि मोहल्ले में किसी लड़की की शादी में निःशुल्क खाना बनाते थे और एक क्विटंल बेसन की बूंदी एक जैसी लगातार निकाल देते थे। श्री रामकिशन व्यास ‘‘ढाटीजी’’ तेजी मंदी के बहुत बड़े व्यापारी थे। सेठ सांगीदास थानवी (फलौदी वाले) के साथ साझेदारी थी। लगभग 70 वर्ष पहले मगजी श्रीमाली ने इनको मुहर्त दिया तथा इन्होंने मुम्बई जाकर अपना व्यापार आरम्भ किया। श्री व्यास ने स्थानीय अचलेश्वर महादेव को 1 आना साझेदारी की। उस दौरान इन्होंने अच्छा लाभ कमाया तथा यहां आकर स्थानीय मंदिर में चांदी का श्रृंगार, बर्तन भेंट किए तथा मंदिर पर मार्बल लगवाया।

इसी मोहल्ले के व्यापारी वर्ग में राधाकिशन-शिवकिशन ऊन के बहुत बड़े व्यापारी थे। वर्तमान में इनका कार्य श्री शंकरलाल आचार्य देख रहे है। श्री नंदलाल व्यास एवं स्व. छगनलाल व्यास बिड़ला ग्रुप में मुख्य सलाहकार थे और उनकी देखरेख में सारी इण्डस्ट्रिज (कोलकाता) में चलती थी। इनकी विशेषता थी कि यह जब भी बीकानेर में आते तो अपने दोस्तों को घर बुलाकर कर खाना खिलाना, भांग पिलाना आदि कार्यों में खूब आन्नद लेते थे।

श्री सीनजी पुरोहित मुम्बई में तेजी-मंदी एवं चांदी के बड़े व्यापारी हुए। इनके पुत्र श्री हरिगोपाल जी पुरोहित ‘फनको जी’ ने इनके व्यापार को संभाला। इनके द्वारा निर्मित ‘गोल कटला’ स्टेशन रोड़, ‘बीकानेर भुजिया भण्डार’ के ऊपर बना पूरे बीकानेर में मशहूर है।

यह चौक में ज्योतिषियों के लिए भी जाना जाता है। यहां देर रात्री को पाटे पर ज्योतिष चर्चाएं एवं कुण्डियों का अध्ययन किया जाता है। इस चौक में ज्योतिष विद्या हेतु ‘मोमू महाराज’ प्रसिद्ध है। इस चौक के डॉ एम सी मारू व डॉ के एल मारू ने चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया। चौक के ममु महराज, भंवर पुरोहित , सीन महाराज व सुनील बोड़ा जैसी अनेक शख्शियत सामाजिक सरोकार व पाटो की शान है।

चौक में राजनीति क्षेत्र में भी अग्रणी रहा है सन् 1967 में श्री मक्खन लाल शास्त्री चुनाव प्रचार हेतु यहां आए तब रात को इसी चौक में विश्राम किया। श्री रिखबदास बोड़ा को 1975 के आपतकाल में जिंदा या मुर्दा पकड़ने का वांरट निकला, लेकिन अपनी चतुराई के कारण श्री बोड़ा पकड़ में नहीं आ पाए।

शिव कुमार सोनी का योगदान
रमक झमक की बीकानेर शहर यात्रा की सीरीज में अपनी ओर से उस शख्शियत का योगदान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है जिनका शहर परकोटा सस्कृति में महत्ती भूमिका रही है ।
सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय के सहा/अति.प्रशासनिक अधिकारी शिवकुमार सोनी ने वर्षो तक शहर की सास्कृतिक धरोहर,सास्कृतिक विरासत व सास्कृतिक आयोजन को खूब अच्छे ढंग से कवरेज किया है । शहर के मोहल्ले व गली तक श्री सोनी की सास्कृतिक पकड़ मजबूत है ।आज इस सीरीज को आप तक पहुचाने में श्री संजय श्रीमाली ने भी उनके आलेखों का आभार जताया है।(रमक झमक)

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पुरुष से भी अधिक महिला को सम्मान देने वाला शहर

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मरुनायक चौक
बीकानेर शहर यात्रा(3)

-संजय श्रीमाली,
उस्ता बारी, बीकानेर।

नाटेश्वर महादेव जहाँ पार्वती
महादेव से आगे।

मरूनायक चौक को मंदिरों का चौक कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी हर शिव मन्दिर में शिवलिंग के पीछे पार्वती की मूर्ति होती है या कई जगह शिव मूर्ति के साथ बराबर में पार्वती की मूर्ति होती है,लेकिन बीकानेर शहर के मरुनायक चौक में ऐसा शिव मंदिर है जहां मन्दिर में शिव लिंग से पहले मां पार्वती की मूर्ती है, यानि आगे है।
आज के युग में महिला सम्मान व समानता की बात करने वाले यहाँ आकर देखें तो पता चलता है कि इस शहर में महिलाओं को पुरुष से अधिक सम्मान दिया है और अपने आस्था में भी शिव से पहले पार्वती की पूजा की है।

Marunayak Chowk Shiv Temple Jain Temple Bikaner

Marunayak Chowk Bikaner


मरुनायक चौक का नाटेश्वर महादेव मंदिर इसका उदाहरण है। सगे सम्बन्धी जब परम्परा या रिश्ते या रीत रिवाज की कोई भी बात करते है तो इस चौक के पुरुष सीधा जवाब देते है फाइनल बात या निर्णय पत्नी करेगी, जब कोई कहता है मुखिया तो आप हो,आदमी आप हो,तो उनका साफ साफ जवाब होता है वे नाटेश्वर महादेव के क्षेत्र में रहते है और हमारे नाटेश्वर ने महिला को आगे रखा है उनको सम्मान दिया उनकी पूजा से अपने से पहले यानि अपनी पार्वती को अपने से पहले पूजा का सम्मान दिया है और हम सब भी नाटेश्वर के भक्त है। हमारी पत्नियां ऐसे कामों में हम से अग्रणीय रहेगी व सम्मानीय रहेगी।
इस चौक में भव्य एवं कलात्मक मंदिर तथा समय-समय पर मेलो एवं उत्सवों के कारण वास्तव में आनन्द का माहौल रहता है। इस चौक में मरूनायक जी मंदिर, मदन मोहन जी का मंदिर, नाटेश्वर महादेव जी का मंदिर, जागनाथ शिव जी का मंदिर तथा चौक के छोर पर बने भगवान महावीर जी का जैन मंदिर श्रद्धालुओं के आस्था और विश्वास का केन्द्र है। प्राचीन काल से ही मरूनायक जी मंदिर व मदन मोहन जी के मंदिर में प्रति वर्ष जन्माष्टमी पर विशेष उत्सव मनाये जाते है। उत्सव के अवसर पर चौक में मेला लगता है। शीतलाष्टमी के दिन मरूनायक मंदिर के आगे छोटा मेला लगता हैं। इसी चौक का मदन मोहन भवन वैवाहिक व सामाजिक कार्यों के लिए सार्वजनिक भवन है।

Marunayak Chowk Temple


मरूनायक चौक के पूर्व में मोहता चौक, उतर में मोहता चौक, पश्चिम में सेवगों का चौक तथा दक्षिण में बैदों का चौक व आचार्यों का चौक है। इस मोहल्ले में कई जातियों के घर है जिसमें माहेश्वरी समाज के मोहता, करनाणी, सादाणी, टेणाणी, द्वावरकाणी, बिहाणी व लखाणी, पुष्करणा ब्राह्मणों में जोशी, देराश्री, पुरोहित, व्यास, गज्जाणी तथा नाई आदि जाति के लोग आपसी सौहार्द के साथ रहते है।
इस मौहल्लें में बाजार आदि पहुंचने के लिए शॉर्टकट गलिया है जिसमें नाईयों की गली हैं इस गली में पत्थर की सड़क बनी हुई है। उसी प्रकार एकदम संकड़ी चौधरियों की गली है इसको चौधरियों की घाटी भी कहते है। चौधरियों की गली मंदिर के मुखिया के निवास स्थान के कारण प्रसिद्ध हुई। इन गलियों में कई मकान लाल पत्थर के बहुत ही कलात्मक बने हुए हैं। मरूनायक चौक में बनी लाल पत्थर हवेली बीकानेर में अपने आप अनूठी है। इस हवेली की बारियों में कलात्मक कारीगरी की गई है। चौक में निर्मित अधिकतर हवेलिया माहेश्वरी बनियों की है। चौक के चांडक हाऊस की बनावट भी बहुत प्रभावी है।

Way to Marunayak chowk through Mohta chowk


मरूनायक चौक में होली के अवसर पर सुप्रसिद्ध हेडाऊ मेरी की रम्मत का आयोजन होता है। यह रम्मत लगभग 200 वर्षों से भी ज्यादा समय से यहां हो रही है। कहा जाता है कि यह रम्मत देशनोक में चारण जाति के लोग करते थे। किसी बात पर चारण और माहेश्वरियों में विवाद हो गया और माहेश्वरियों ने इस रम्मत को बीकानेर में इस मोहल्ले में करने का फैसला किया तथा इसका जिम्मा सेवग जाति को दिया। सेवगों में किसी मतभेद के बाद स्व. मुरली मनोहर गज्जाणी पुरोहित ने इस रम्मत का आयोजन संभाला और निरन्तर चालू रखा। मरूनायक चौक में होने वाली रम्मत में गज्जाणी पुरोहित की अहम भूमिका रहती हैं। गज्जाणी पुरोहित यहां खारबारा से वर्षों पूर्व आकर बसे थे। चौक में गज्जाणी पुरोहितों का फलसा भी है। मदन मोहन भवन के पास की गली में स्थित फलसे अधिकतर गज्जाणी पुरोहितों के घर है। गज्जाणी पुरोहित भाटी राजपूतों के कुल गुरू कहे जाते हैं।

हेडाऊ मेरी की रम्मत श्रृंगार रस और वीर रस प्रधान है। अनेक वर्षो से स्व. मुरली मनोहर पुरोहित के वंशज ही रम्मत के मुख्य पात्र हेडाऊ की भूमिका निभा रहे है। रम्मत में विक्रम संवत 1883 तक भाईयोजी 1886 तक स्व. पदोजी पुरोहित विक्रम संवत 1902 में जगन्नाथन देराश्री हेडाऊ बने। रम्मत के कलाकारों की पोशाक, गीत व संवादों के बोल आकर्षक होते है। जिनका लोग रातभर जाग कर रसा स्वादन करते है। रम्मत में नूरसों का पात्र गज्जाणी पुरोहितों के सगा परसंगी तथा मैरी का पात्र मोहल्ले के किसी जाति के लोग निभा सकते हैं।

Naateshwar Mahadev Mandir

स्व. मुरली मनोहर पुरोहित के बारे में कहा जाता है कि वे कवि, ज्योतिषि, दुर्गा तथा भैरव के उपासक थे। उन्होंने चमत्कारी कार्य किए जो आज भी चर्चा में आते है। मरूनायक चौक की नाइयों की गली में रहने वाले नाई जाति के लोग राजा रायसिंह की महारानी गंगाजी के साथ सन् 1592 में जैसलमेर से आए थे। चौक के स्व. रामचंद्र जी हड्डी जोड़ व देशी इलाज के प्रसिद्ध चिकित्सक थे। नाईयों में स्व. रामनाथ, स्व. शिवप्रताप उर्फ भाईजी को चौधरी का सम्मान प्राप्त था। सामाजिक कार्यों में चौधरी परिवार की अहम भूमिका रहती है।
चौक में डांडिया नृत्य, मोरा, मीठा मोरा सहित ढोल की विभिन्न चालों के साथ नृत्य के दौर चलते हैं जिसमें चौक के सभी जाति समुदाय के लोग उत्साह से भाग लेते हैं। इस चौक के अनेक कलाकार बीकानेर से बाहर भी डांडियां नृत्य की प्रस्तुति दे चुके है। डांडिया नृत्य में नृतकों की विशेष पौशाक (बड़े बागे) दर्शकों को प्रभावित करते है। चौक में होने वाली रम्मत व डांडिया नृत्य में नगाड़ा स्व. शिवकिशन उर्फ गिन्डोजी सेवग, स्व. गंगादास सेवग, स्व. शिवदयाल बजाते तथा इनकी पीढी दर पीढी रम्मत में नगाड़ा बजाती रही है।

बीकानेर शहर की विशेष कहानी देखिये वीडियो में

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दानवीर व रंगबाजों का शहर- दम्माणी चौक बीकानेर

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बीकानेर शहर यात्रा (2)

दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है दम्माणी चौक। छतरी वाला पाटा और चौक को फ़िल्म यादगार में दिखाया गया फ़िल्म का गाना इसी चौक में फिल्माया गया। शहर के सबसे चहल-पहल वाले चौकों में दम्माणी चौक छतरी के पाटे तथा घर की छत पर छतरी हेतु प्रसिद्ध है। शहर के पुराने चौको में से दम्माणी चौक भी है जो कि 300-400 वर्षों का इतिहास अपने में समेटे हुए है।

दम्माणी चौक में ज्यादातर दम्माणी (माहेश्वरी) जाति के लोग तथा पुष्करणा ब्राह्मण जाति के लोग रहते है। दामोदर दास राठी को बोलचाल की भाषा में दम्मजी या दमणजी कहा जाता था। इन्हीं दम्मणजी के वंशज दम्माणी कहलाए। दामोदरजी के पांच पुत्र थे। लक्ष्मीचंद, विजयराम, हरदेव राम, मुरलीधर व मूलचंद। इन्ही से दम्माणियों की वंशवृद्धि हुई तथा लाल पत्थर की कलात्मक कारीगरी व भित्ती चित्रों से युक्त दामोदरजी के वंशजो के अनेक मकान आज भी चौक में देखे जा सकते है। दम्माणियों का व्यवसाय मुम्बई, कोलकाता तथा चैन्नई व नागपुर में होने के कारण उनके कई घर खाली पड़े है।
इस चौक के निवासियों ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति अर्जित की है। केन्द्रीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व कोषाध्यक्ष सोलापुर (महाराष्ट्र) के सांसद स्व. सूरज रतन दम्माणी, अमरीका में ब्रोकर राधाकिशन दम्माणी, प्रमुख व्यवसाई भैरव रतन दम्माणी तथा प्रसिद्ध ख्याल लेखक बच्छराज व्यास इसी चौक के है।

रम्मतों के प्रसिद्ध ख्याल बनाने वाले 95 वर्षीय बच्छराज व्यास ने चौक की स्थापना के बारे में बताया कि पहले यह चौक पुष्करणा समाज के व्यासों का था जो कालान्तर में दम्माणियों के अधिक संख्या में बसने के कारण व व्यासों का चौक अलग से स्थापित होने के कारण दम्माणियों का चौक कहलाने लगा। व्यासों का चौक कालान्तर में होने की प्रमाणिकता पर उन्होंने बताया कि आज भी चौक में होली व्यास जलाते है। व्यासों की गैवर दम्माणी चौक में बैठकर पारम्परिक गीत गाती है।
प्राचीन बीकानेर नगर का दम्माणी चौक सांस्कृतिक सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में अहम रखता है। अल सुबह शुरू होते चौक की हलचल देर रात तक बरकरार रहती है। दम्माणी चौक अपने अतीत में दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है। पहले चौक के हर घर के आगे पाटा (तख्त) लगा रहता था। पाटे पर सेठ-साहूकार बैठते थे। चौक में प्रतिदिन पानी का छिडकाव होता थ। सेठ के पास इत्र व गुलावजल चांदी के प्यालों में भरा रहता था। सेठों के चाकर गुलाबजल से मलमल का कपड़ा भरकर सेठों के लगाते थे। वहीं आगन्तुकों का इत्र लगाकर व काजू, किशमिश तथा बादाम आदि सूखे मेवों से स्वागत किया जाता थ। पूरा चौक शाम को महक उठता था।
सेठ रईसाई के साथ हर गरीब व असहाय की मरण-परण में मदद किया करते थे। तख्त पर बैठकर ही मौहल्ले की समस्याओं व लोगों के आपसी विवाद को सुलझा दिया जाता था। दम्माणी चौक में प्रतिवर्ष सावन की तीज व चौथ में लगने वाले मेले को शुरू करवाने वाले तथा ऐतिहासिक छतरी का पाटा निर्माण करवाने वाले सेठ चम्पालाल व छगनलाल दम्माणी की तत्कालीन रियासत में भी अच्छी पैठ थी। कहा जाता है कि महाराजा गंगासिंह को राजगद्दी दिलाने में भी सेठ छगनलाल दम्माणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पानी की झरी व एक छाता वाले नौकर को हर वक्त साथ रखते थे। सेठजी को पूछते थे कि हर वक्त झारी और छाता साथ क्यां रखते है तो वह कहते थे कि ‘मेह (वर्षा) व मोत रो क्या भरोसो कद आ जाए’।
इन्होंने ही तत्कालीन वायसराय की पत्नी के जरिए गंगासिंह जी को गद्दी दिलवाने का आग्रह किया था। मेयो कॉलेज में गंगासिंहजी के शिक्षण के समय चौथे व हर छठे माह बेशकिमती पौशाक बनवाकर भेजने आदि का खर्चा इन्होने ही उठाया था। इसलिए गंगासिंहजी सेठजी को चाचा का सम्मान देते थे। सेठजी के घर मिलने आने पर केवल चार रूपए की नजर ले लेते थे जबकि अन्य सेठों के यहां जाने पर वे चांदी के रूपयों की गद्दी पर बैठते थे।

Chhota Gopal Ji Temple

Chhota Gopal Ji Mandir Dammani Chowk Bikaner


महाराजा ने सेठ चम्पालाल, छगनलाल व मदन गोपाल दम्माणी को मानद न्यायाधीश का सम्मान दे रखा था। ये सेठ किसी को भी छः माह तक कारावास की सजा दे सकते थे। अमुमन कैदी को अपने घर में ही छः माह की सजा देने वाले ये सेठ कैदी के परिवार का सारा खर्च सजा के दौरान उठाते थे। सेठ छगनलाल की खासियत थी कि सिर को मुंडाए उनके घर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वे 51 रूपए देते थे।
चौक की ऐतिहासिक घटना की विक्रम संवत 1935 में डूम (दमामी) को जागों मानने के राजा के आदेश पर सभी दम्माणी शहर छोड़कर रवाना हो गए थे। घटना के अनुसार सीधे-सादे धार्मिक प्रवृति के दम्माणियों के वंशावली रखने का कार्य राजदरबार के लोग करते थे। महाराजा ने डूम जाति के लोगों को वंशावली रखने के लिए मनोनीत कर दिया। इस पर दम्माणियों ने राजा से शिकायत की लेकिन राजा के नहीं मानने पर सभी ने बीकानेर नगर छोड़ने का फैसला कर दिया। निर्धारित तिथि पर दम्माणी बैलगाडि़यों व ऊंट गाडि़यों पर सामान रखकर रवाना हो गए।
दम्माणियों के पलायन पर राजमाता ने जूनागढ़ की छत से देखा और दरबारियों से पूछा कि आज कोई मेला तो नहीं फिर ये लोग कहा जा रहे है। पता करने पर उन्हे जब घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने तत्काल राजा को अपना आदेश वापस लेने व दम्माणियों के पलायन को रोकने के आदेश दिए। भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त लक्ष्मीचंद दम्माणी की सेवा (पूजा का कक्ष) उठने की सूचना पर राजमाता ने देशनोक तक राजा को भेजकर पलायन करते लोगों को वापस बुलाया। लक्ष्मीचंद दम्माणी के घर आज भी वह सेवा (पूजा का कक्ष) विद्यमान है। कहा जाता है कि दम्माणियों के चौक में सावन की तीज व चौथ को लगने वाले मेले की शुरूआत सेठ छगन लाल ने ही करवाई थी। वे मेले मे आने वाले हर बैल व अन्य गाड़ी वाले को एक रूपया, नित्य गायों का सुबह कुतर, कबूतरो को दाना तथा रात को गुड़ खिलाते थे। गायों को गुड़ तथा कुतर देने की परम्परा आज भी कायम है।
नगर में सबसे बड़े चौकों में एक होने के कारण यहां आचार्य तुलसी, स्वतंत्रता सेनानी अरूणा आसिफ अली, डॉ. करणी सिंह, स्वामी रामसुख दास जी, राम राज्य परिषद के प्रबल ब्रह्मचारी आदि अनेक प्रतिष्ठित लोगों की जनसभाएं बड़े पैमाने पर हो चुकी है। ब्रह्मचारी की सभा में चारों पीठ के शंकराचार्य आए थे। इसके अलावा चौक में सत्यनारायण, हरीओम तत्सत व कथा व रामलीलाएं भी वर्षों तक होती रही।
चौक में बड़ा गोपाल जी का मंदिर, मूंधड़ो, पुष्करणा समाज के कीकाणी व लालाणी व्यासों के कुलदेव के रूप में पूज्य है। मेजर किशन चंद व्यास के युद्ध में भाग लेकर लौटने पर मायलपुर नवाब के मेजर त्रिलोकचंद व्यास ने चांदी का सिंहासन मंदिर मे चढ़ाया था जो आज भी सुरक्षित है।
विक्रम संवत 1901 में शुरू हुआ लोहड़ी तीज का मेला पिछले एक-डेढ दशक से अपनी अस्मिता खो रहा है। दम्माणियों के चौक के साथ पास के चौक में मूंधड़ों व जस्सोलाई तलाई क्षेत्र तक पूर्व में मेला भरता था। खानपान खिलौने अिद की अनेक दुकाने लगती थी।
Bikaner Inside City

Famous Chhota Gopal ji Temple in Dammani Chowk Bikaner


दम्माणियों के चौक की होली भी प्रसिद्ध है। पुष्करणा ब्राह्मणों के कीकाणी व्यास, माहेश्वरी डागा, पुष्करणा समाज के रंगा व बिस्सा जाति के लोगों की उपस्थिति में होली जलाई जाती है। मिडोजी दम्माणी, बच्छाराज व्यास आदि के घरों में घूलंड़ी के दिन आज भी कुंआरा युवक दुल्हा बनकर गाजे-बाजे व बारातियों के साथ तोरण पर आता है। धूलंड़ी के दिन शाम को प्रायः सभी होली के मतवाले गीतों को रचने वाली टोलियों, बारह गुवाड़ व अन्य समाज की गेवरों के आने से पूरा चौक भर जाता है।
होली की प्रथम रम्मत ‘रजिया बाबा की रम्मत’ दम्माणियों के चौक में वर्षों से होती रही है, पिछले कुछ वर्षों मे रम्मत के नाम पर केवल अखाड़ा मात्र लगता है। पहले चौक में दम्माणी स्वांग मेरी की रम्मत करवाते थे। रम्मत के लिए ही छतरी के पाटे का निर्माण करवाया गया। उस वक्त की रम्मत की नजाकत ही अलग थी। पूरा चौक रम्मत के दिन दुल्हन की तरह सजाया जाता था। ख्याल, चौमासा व लावणी के साथ लोकनृत्यों की जमघट रातभर रहती थी। पहलवान रजिया उस्ताद ने रम्मत परम्परा को संबल दिया। इसी कारण पिछले 60-70 वर्षों से चौक में होने वाली रम्मत को रजिया उस्ताद की रम्मत कहा जाने लगा।
धार्मिक दृष्टि से अग्रणी इस चौक में वर्षों से महंतो में एक की गद्दी रहा है। महंत की गद्दी रहने के कारण अनेक साधू-सन्यासी दम्माणियों के चौक में कार्तिक पूर्णिमा के दिनों में कोलायत आने पर व अन्य दिनों में धुनी रमाते थे। मंदिर के एक परिसर में कई वर्षों तक वेद विद्यालय चला वहीं मंदिर के एक हिस्से में सार्वजनिक वाचनालय का संचालन कीकाणी व्यासों के चौक के युवकों द्वारा किया गया।
दम्माणी चौके में जन्मे स्व. रतन दम्माणी ने विक्रम संवत 1902 में प्रसूतिगृह, 1965 में फतेहचंद बालिका विद्यालय, सूरत दम्माणी के भाई व प्रमुख व्यवसायी भैरव दम्माणी ने यात्रीगृह व गोपीनाथ भवन परिसर में निःशुल्क होमियो चिकित्सालय का संचालन कर समाज सेवा में अनुकरणीय कार्य किया है।
दम्माणी चौक –
शहर के सबसे चहल-पहल वाले चौकों में दम्माणी चौक छतरी के पाटे तथा घर की छत पर छतरी हेतु प्रसिद्ध है। शहर के पुराने चौको में से दम्माणी चौक भी है जो कि 300-400 वर्षों का इतिहास अपने में समेटे हुए है।
दम्माणी चौक में ज्यादातर दम्माणी (माहेश्वरी) जाति के लोग तथा पुष्करणा ब्राह्मण जाति के लोग रहते है। दामोदर दास राठी को बोलचाल की भाषा में दम्मजी या दमणजी कहा जाता था। इन्हीं दम्मणजी के वंशज दम्माणी कहलाए। दामोदरजी के पांच पुत्र थे। लक्ष्मीचंद, विजयराम, हरदेव राम, मुरलीधर व मूलचंद। इन्ही से दम्माणियों की वंशवृद्धि हुई तथा लाल पत्थर की कलात्मक कारीगरी व भित्ती चित्रों से युक्त दामोदरजी के वंशजो के अनेक मकान आज भी चौक में देखे जा सकते है। दम्माणियों का व्यवसाय मुम्बई, कोलकाता तथा चैन्नई व नागपुर में होने के कारण उनके कई घर खाली पड़े है।
इस चौक के निवासियों ने राष्ट्रीय ही नहीं अर्न्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति अर्जित की है। केन्द्रीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व कोषाध्यक्ष सोलापुर (महाराष्ट्र) के सांसद स्व. सूरज रतन दम्माणी, अमरीका में ब्रोकर राधाकिशन दम्माणी, प्रमुख व्यवसाई भैरव रतन दम्माणी तथा प्रसिद्ध ख्याल लेखक बच्छराज व्यास इसी चौक के है।
रम्मतों के प्रसिद्ध ख्याल बनाने वाले 95 वर्षीय बच्छराज व्यास ने चौक की स्थापना के बारे में बताया कि पहले यह चौक पुष्करणा समाज के व्यासों का था जो कालान्तर में दम्माणियों के अधिक संख्या में बसने के कारण व व्यासों का चौक अलग से स्थापित होने के कारण दम्माणियों का चौक कहलाने लगा। व्यासों का चौक कालान्तर में होने की प्रमाणिकता पर उन्होंने बताया कि आज भी चौक में होली व्यास जलाते है। व्यासों की गैवर दम्माणी चौक में बैठकर पारम्परिक गीत गाती है।
Dammani Chowk Bikaner

Dammani Chowk Bikaner


प्राचीन बीकानेर नगर का दम्माणी चौक सांस्कृतिक सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में अहम रखता है। अल सुबह शुरू होते चौक की हलचल देर रात तक बरकरार रहती है। दम्माणी चौक अपने अतीत में दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है। पहले चौक के हर घर के आगे पाटा (तख्त) लगा रहता था। पाटे पर सेठ-साहूकार बैठते थे। चौक में प्रतिदिन पानी का छिडकाव होता थ। सेठ के पास इत्र व गुलावजल चांदी के प्यालों में भरा रहता था। सेठों के चाकर गुलाबजल से मलमल का कपड़ा भरकर सेठों के लगाते थे। वहीं आगन्तुकों का इत्र लगाकर व काजू, किशमिश तथा बादाम आदि सूखे मेवों से स्वागत किया जाता थ। पूरा चौक शाम को महक उठता था।
सेठ रईसाई के साथ हर गरीब व असहाय की मरण-परण में मदद किया करते थे। तख्त पर बैठकर ही मौहल्ले की समस्याओं व लोगों के आपसी विवाद को सुलझा दिया जाता था। दम्माणी चौक में प्रतिवर्ष सावन की तीज व चौथ में लगने वाले मेले को श्ुरू करवाने वाले तथा ऐतिहासिक छतरी का पाटा निर्माण करवाने वाले सेठ चम्पालाल व छगनलाल दम्माणी की तत्कालीन रियासत में भी अच्छी पैठ थी। कहा जाता है कि महाराजा गंगासिंह को राजगद्दी दिलाने में भी सेठ छगनलाल दम्माणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पानी की झरी व एक छाता वाले नौकर को हर वक्त साथ रखते थे। सेठजी को पूछते थे कि हर वक्त झारी और छाता साथ क्यां रखते है तो वह कहते थे कि ‘मेह (वर्षा) व मोत रो क्या भरोसो कद आ जाए’।
इन्होंने ही तत्कालीन वायसराय की पत्नी के जरिए गंगासिंह जी को गद्दी दिलवाने का आग्रह किया था। मेयो कॉलेज में गंगासिंहजी के शिक्षण के समय चौथे व हर छठे माह बेशकिमती पौशाक बनवाकर भेजने आदि का खर्चा इन्होने ही उठाया था। इसलिए गंगासिंहजी सेठजी को चाचा का सम्मान देते थे। सेठजी के घर मिलने आने पर केवल चार रूपए की नजर ले लेते थे जबकि अन्य सेठों के यहां जाने पर वे चांदी के रूपयों की गद्दी पर बैठते थे।
महाराजा ने सेठ चम्पालाल, छगनलाल व मदन गोपाल दम्माणी को मानद न्यायाधीश का सम्मान दे रखा था। ये सेठ किसी को भी छः माह तक कारावास की सजा दे सकते थे। अमुमन कैदी को अपने घर में ही छः माह की सजा देने वाले ये सेठ कैदी के परिवार का सारा खर्च सजा के दौरान उठाते थे। सेठ छगनलाल की खासियत थी कि सिर को मुंडाए उनके घर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वे 51 रूपए देते थे।
चौक की ऐतिहासिक घटना की विक्रम संवत 1935 में डूम (दमामी) को जागों मानने के राजा के आदेश पर सभी दम्माणी शहर छोड़कर रवाना हो गए थे। घटना के अनुसार सीधे-सादे धार्मिक प्रवृति के दम्माणियों के वंशावली रखने का कार्य राजदरबार के लोग करते थे। महाराजा ने डूम जाति के लोगों को वंशावली रखने के लिए मनोनीत कर दिया। इस पर दम्माणियों ने राजा से शिकायत की लेकिन राजा के नहीं मानने पर सभी ने बीकानेर नगर छोड़ने का फैसला कर दिया। निर्धारित तिथि पर दम्माणी बैलगाडि़यों व ऊंट गाडि़यों पर सामान रखकर रवाना हो गए।
दम्माणियों के पलायन पर राजमाता ने जूनागढ़ की छत से देखा और दरबारियों से पूछा कि आज कोई मेला तो नहीं फिर ये लोग कहा जा रहे है। पता करने पर उन्हे जब घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने तत्काल राजा को अपना आदेश वापस लेने व दम्माणियों के पलायन को रोकने के आदेश दिए। भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त लक्ष्मीचंद दम्माणी की सेवा (पूजा का कक्ष) उठने की सूचना पर राजमाता ने देशनोक तक राजा को भेजकर पलायन करते लोगों को वापस बुलाया। लक्ष्मीचंद दम्माणी के घर आज भी वह सेवा (पूजा का कक्ष) विद्यमान है। कहा जाता है कि दम्माणियों के चौक में सावन की तीज व चौथ को लगने वाले मेले की शुरूआत सेठ छगन लाल ने ही करवाई थी। वे मेले मे आने वाले हर बैल व अन्य गाड़ी वाले को एक रूपया, नित्य गायों का सुबह कुतर, कबूतरो को दाना तथा रात को गुड़ खिलाते थे। गायों को गुड़ तथा कुतर देने की परम्परा आज भी कायम है।
नगर में सबसे बड़े चौकों में एक होने के कारण यहां आचार्य तुलसी, स्वतंत्रता सेनानी अरूणा आसिफ अली, डॉ. करणी सिंह, स्वामी रामसुख दास जी, राम राज्य परिषद के प्रबल ब्रह्मचारी आदि अनेक प्रतिष्ठित लोगों की जनसभाएं बड़े पैमाने पर हो चुकी है। ब्रह्मचारी की सभा में चारों पीठ के शंकराचार्य आए थे। इसके अलावा चौक में सत्यनारायण, हरीओम तत्सत व कथा व रामलीलाएं भी वर्षों तक होती रही।
Bikaner Dammani Chowk

Famous Paata Dammani Chowk


चौक में बड़ा गोपाल जी का मंदिर, मूंधड़ो, पुष्करणा समाज के कीकाणी व लालाणी व्यासों के कुलदेव के रूप में पूज्य है। मेजर किशन चंद व्यास के युद्ध में भाग लेकर लौटने पर मायलपुर नवाब के मेजर त्रिलोकचंद व्यास ने चांदी का सिंहासन मंदिर मे चढ़ाया था जो आज भी सुरक्षित है।
विक्रम संवत 1901 में शुरू हुआ लोहड़ी तीज का मेला पिछले एक-डेढ दशक से अपनी अस्मिता खो रहा है। दम्माणियों के चौक के साथ पास के चौक में मूंधड़ों व जस्सोलाई तलाई क्षेत्र तक पूर्व में मेला भरता था। खानपान खिलौने अिद की अनेक दुकाने लगती थी।
दम्माणियों के चौक की होली भी प्रसिद्ध है। पुष्करणा ब्राह्मणों के कीकाणी व्यास, माहेश्वरी डागा, पुष्करणा समाज के रंगा व बिस्सा जाति के लोगों की उपस्थिति में होली जलाई जाती है। मिडोजी दम्माणी, बच्छाराज व्यास आदि के घरों में घूलंड़ी के दिन आज भी कुंआरा युवक दुल्हा बनकर गाजे-बाजे व बारातियों के साथ तोरण पर आता है। धूलंड़ी के दिन शाम को प्रायः सभी होली के मतवाले गीतों को रचने वाली टोलियों, बारह गुवाड़ व अन्य समाज की गेवरों के आने से पूरा चौक भर जाता है।
होली की प्रथम रम्मत ‘रजिया बाबा की रम्मत’ दम्माणियों के चौक में वर्षों से होती रही है, पिछले कुछ वर्षों मे रम्मत के नाम पर केवल अखाड़ा मात्र लगता है। पहले चौक में दम्माणी स्वांग मेरी की रम्मत करवाते थे। रम्मत के लिए ही छतरी के पाटे का निर्माण करवाया गया। उस वक्त की रम्मत की नजाकत ही अलग थी। पूरा चौक रम्मत के दिन दुल्हन की तरह सजाया जाता था। ख्याल, चौमासा व लावणी के साथ लोकनृत्यों की जमघट रातभर रहती थी। पहलवान रजिया उस्ताद ने रम्मत परम्परा को संबल दिया। इसी कारण पिछले 60-70 वर्षों से चौक में होने वाली रम्मत को रजिया उस्ताद की रम्मत कहा जाने लगा।
धार्मिक दृष्टि से अग्रणी इस चौक में वर्षों से महंतो में एक की गद्दी रहा है। महंत की गद्दी रहने के कारण अनेक साधू-सन्यासी दम्माणियों के चौक में कार्तिक पूर्णिमा के दिनों में कोलायत आने पर व अन्य दिनों में धुनी रमाते थे। मंदिर के एक परिसर में कई वर्षों तक वेद विद्यालय चला वहीं मंदिर के एक हिस्से में सार्वजनिक वाचनालय का संचालन कीकाणी व्यासों के चौक के युवकों द्वारा किया गया।
दम्माणी चौके में जन्मे स्व. रतन दम्माणी ने विक्रम संवत 1902 में प्रसूतिगृह, 1965 में फतेहचंद बालिका विद्यालय, सूरत दम्माणी के भाई व प्रमुख व्यवसायी भैरव दम्माणी ने यात्रीगृह व गोपीनाथ भवन परिसर में निःशुल्क होमियो चिकित्सालय का संचालन कर समाज सेवा में अनुकरणीय कार्य किया है।

लेखक:- संजय श्रीमाली, उस्ताबारी, बीकानेर । फोटो:- विनोद पुरोहित ‘चिंटू’ व ए.के.चुरा

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नोट चिपका कर पतंग उड़ाने वाला दस्साणियों का चौक बीकानेर

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नोट चिपका कर पतंग उड़ाने वाला दस्साणियों का चौक :-
अनोखे शहर के अनूठे चौक(1)

रंगीले, मस्ताने व अनूठे शहर बीकानेर के स्थापना दिवस पर हम आज से प्रमुख चौक व मोहल्लों से आपको परिचय करवा रहे है। इस शहर का करीब करीब हर चौक अपने आपमें कुछ खाश है । इन चौक व गुवाड़ की खाशियतें ही है जो हर किसी को अपनी ओर खींच रही है।
आज ले चलते है एक अनूठे चौक:-

Dassaniyon ka chowk bikaner Pata

दस्साणियों का चौक :-
इस चौक के शक्तिदान दस्साणी पतंगबाजी के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। वे पतंगों पर नोट चिपकाकर उड़ाते थे। कई बार उनकी पतंग के मुकाबले पर बीकानेर के सौदेबाज हजारों रूपये का सट्टा कर लेते थे।

दस्साणियों के चौक में पहले ढढ्ढा जाति के लोग ज्यादा रहते थे इस कारण यह ढढ्ढा चौक के अन्तर्गत ही आता था। लेकिन कालान्तर में जैन समाज के दस्साणी, तातेड़, सोनावत, पटवा, लालाणी, पारख, डागा, सुखानी, बांठिया, लोढा, खटोल, बैद के साथ अग्रवाल, माली, भादाणी आदि जातियों का निवास होता गया। इनमें से दस्साणी ज्यादा होने के कारण यह दस्साणियों का चौक कहलाया। जैन समाज की सताइस गुवाड़ों में से एक दस्साणियों के चौक में है।

दस्साणियों का चौक बीकानेर

9 पागों का पाटा चौक

इस चौक कि विशेषता है कि इसमें नो पागों का प्राचीन पाटा है। इस चौक के अलावा नगर में कहीं पर भी नौ पागों का पाटा नहीं है, जो अपने आपमें अनूठा है, लोग इसे दूर दूर से देखने आते है ।
दस्सोजी के दस पुत्र में एक के वंशज दस्साणी कहलाने लगे। अन्य नौ पुत्रों से बच्छावत, बोथरा, मुकिम बोथरा आदि जातियां बनी। पहले दस्साणी परिवार ही क्या उनके दोहिते आदि भी दस्सोजी के वंशज परिवारों में विवाह आदि नहीं करते थे। वर्तमान में कुछेक परिवारों ने भाईचारे की परम्परा को रिश्तेदारी में बदला है।

बीकाजी के साथ आए

चौक का ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में श्री बच्छाराज जी मंडोवर के राव राठौड़ के मंत्री थे वह जोधेजी के पुत्र बीकोजी के साथ बीकानेर आए। यहां बच्छराज जी ने अपने नाम से बच्छासर गांव बसाया। बच्छराज जी के तीन पुत्र हुए करमदेव, देवराज और नरसिंह। बच्छराज जी के साथ भादोजी भी बीकानेर आए। वर्तमान में भादाजो के वंशज बीकानेर में भुजिया बाजार व दस्साणी चौक आदि क्षेत्रों में रह रहे है। दस्साणियों के चौक में रहने वाले भादाणी परिवार स्वर्गीय किशनराम के वंशज है। यह यहां चार पीढी से रह रहे भादाणी परिवारों को ओसवाल समाज व उनसे जुड़ी विभिन्न जातियों के गुरू का दर्जा प्राप्त है।

Bikaji

कला प्रेमी व गौ भक्त

दस्साणियों का चौक ढढ्ढों के चौक के पीछे स्थित है। यह रांगड़ी चौक, मथेरण चौक, बागडि़यों का मोहल्ला, ढढढों के चौक आदि से परस्पर जुड़ा हुआ है। दस्साणियों के चौक में तथा आस-पास बहुत ही सुन्दर एवं कलात्मक हवेलिया बनी हुई है। इससे हम पता लगा सकते है कि यहां निवास करने वाले लोग आर्थिक रूप से संपन्न तथा कला के प्रति रूझान रखने वाले है। चौक में घास चरते पशु, मौहल्ले के लोगों की धर्म के प्रति आस्था व सहृदयता को उजागर करते है। वहीं बतियाते, ताश खेलते लोग आपसी भाईचारे व सद्भाव का संदेश देते हैं।

नोट चिपकाकर उड़ाते पतंग

दस्साणी चौक के श्री लूणकरण दस्साणी को रियासत काल में हाकम का दर्जा मिला हुआ था। इसी चौक के श्री शक्तिदान दस्साणी पतंगबाजी के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। वे पतंगों पर नोट चिपकाकर उड़ाते थे। कई बार उनकी पतंग के मुकाबले पर बीकानेर के सौदेबाज हजारों रूपये का सट्टा कर लेते थे। स्व. शक्तिदान दस्साणी के साथ वर्षों तक पतंगबाजी के दौरान दस्साणियों के चौक में प्रारम्भ से ही लोग पतंगों के शौकीन रहे है। स्व. नथमल दस्साणी के गोधे को आज भी चौक के लोग याद करते है। कहा जाता है कि दस्साणी के सांड की खासियत थी कि वह अनेक पेडि़यां पार कर घर में चढ जाता था।

11 पाटों का चौक

दस्साणियों के चौक में पहले ग्यारह पाटे थे। इन पाटों पर सेठों की जाजम लगती थी। चौक में लाल पत्थर की कई हवेलियां बारीक खुदाई व कलात्मक जाली झरोखों के कारण प्राचीनता के बावजूद पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

रिगतमल भैरव (बिना धड़ के लड़ते रहे जुझार)

Rigatmal Bhairav Bikaner


Binja Baba


दस्साणियों की कुलदेवी का मंदिर नागणेची जी मंदिर व घड़सीसर के बीच स्थित है। देवी के मंदिर में बच्चों के मुंडन संस्कार व सामूहिक पूजा अर्चना का आयोजन होता है। रिगतगतमल भैरव जुझार जो जुझार हुवे (गर्दन धड़ से अलग होने के बावजूद बिना धड़ के लड़ते रहना, युद्ध करते रहने वाले कहलाते है जुझार) जहाँ आमतौर पर तेल पताशा चढ़ता है साथ मे बींजा बाबा का मंदिर भी इस क्षेत्र में है। दस्साणी पंचायती का भवन चौके के एक कौने में बना है। भवन की देखरेख के लिए पंचायत का भी गठन किया हुआ है।

-लेखक
संजय श्रीमाली, उस्ताबारी, बीकानेर।

-फोटो-
बलदेव भादाणी व नानू भोजक
बीकानेर स्थापना दिवस पर हर चौक की जानकारी की खास सीरीज वेबसाइट पर लगातार

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पिता के व्यंग बाण से बीकाजी ने बसा दिया बीकानेर शहर

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बीकानेर शहर की स्थापना कैसे हुई कैसे अपने पिता से मिले एक ताने यानी व्यंग के कारण राव बिका ने एक पूरा राज्य बसा दिया और इस शहर की विशेषताएं क्या क्या है? यहाँ की पाटा संस्कृति, मेले, त्यौहार और मंदिर भी पुरे विश्व में विख्यात है।

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बेंत (डंडा) मार मेला, बेंत पड़ी तो ब्याव पक्का

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भारत परम्पराओं व मान्यताओं को मानने वाला देश है । कई तरह की मान्यताएं यहाँ प्रचलित हैं। यूं कहे कि दुनिया में सबसे ज्यादा मान्यताएं हमारे देश में ही हैं तो ये गलत नहीं होगा। आज हम आपको राजस्थान के मारवाड़ प्रांत खासकर सूर्य नगरी जोधपुर में मनाएं जाने वाले एक खास मेले के बारे में बताने जा रहे हैं।

जोधपुर अपनी मान्यताओं, परम्पराओं व सास्कृतिक विरासत के लिये प्रशिद्ध है । मेले मगरियो का शहर जोधपुर में एक ऐसा मेला लगता है जिसमें लड़कियां पूरी रात गली मोहल्लों में घूम घूम कर लड़को पर बेंत( लाठी )मारती है और इस बेंत की मार खाने वाले सिर्फ जोधपुर के ही नहीं होते बल्कि राजस्थान व अन्य प्रांतों से भी होते है और वो हजारों की संख्या में । लड़कियों/ तीजणियों से बेंत की मार खाने के पीछे एक मान्यता है। कहते है वैशाख कृष्णा तीज को धींगा भोलावनी पूजा के दिन अगर गवर (गणगौर)पूजने वाली लड़कियां/महिलाएं जिन्हें तीजणियां कहते है उनके हाथ से बेंत की मार जिस कुंवारे लड़के पर पड़ती है उसकी शादी एक साल यानी अगले मेले से पहले जरूर हो जाती है । इसलिये समस्त कुंवारे रात को मार खाने निकल पड़ते है। धींगा गवर का यह मेला ‘बेंत मार मेला’ के नाम से जाना जाता है। जोधपुर के लोग अपने भाई,भतीजे सगे सम्बन्धी जिसकी शादी नहीं हो रही हो,कुँवारा हो उसे वो उस दिन ‘बेंत मार’ मेले में बुलवा लेते है।
धींगा गवर की पूजा करने वाली सुहागिनें अपने हाथ में बेंत या डंडा ले कर देर रात निकलती हैं। वे पूरे रास्ते गीत गाती हुई और बेंत लेकर उसे फटकारती हुई चलती रहती हैं। शहर में धींगा गवर पूजने वाली महिलाएं पुलिस, डाकू, देवी, देवता,सन्त, हीरो, हीरोइन, भगवान, वकील व साधु आदि का स्वाँग धरकर पूरे शहर में जहाँ जहाँ गवरजा विराजमान है या स्टेज लगा है वहाँ वहाँ अपना प्रदर्शन करती है गीत गाती है। पूरे शहर में जगह जगह तीजणियों का स्वागत सत्कार होता है ।पूरा शहर रात को रोशनी से नहाया हुवा सा लगता है।गली-गली गीतों की स्वर लहरियों से माहौल देखते ही बनता है।

लड़कियों के बेंत की फटकार किसी को भी पड़ सकती है,चाहे वो नेता हो या प्रशासन का अधिकारी लेकिन खाश बात है कोई बुरा नहीं मानते। जितनी पिटाई उतनी शादी जल्दी होगी,ये सोच कर कुँवारे जान बूझकर उनके आगे से कई बार निकलते है। जिस कुंवारे की शादी हो जाती है वो अगले साल जोधपुर शहर में अपनी पत्नी के साथ धींगा गवरजा को धोक जरूर लगाता है ।

धींगा गवर की पूजा

विशेष रूप से मारवाड़ क्षेत्र में ही की जाती है। जोधपुर, नागौर और बीकानेर में धींगा गवर का उत्सव मनाया जाता है। अनुसार ईसर एवं गवर शिव और पार्वती के प्रतीक हैं, जबकि धींगा गवर को ईसर की दूसरी पत्नी या नाते आई हुई बताते है ।किवदंती के अनुसार धींगा गवर मौलिक रूप से एक भीलणी थी, जिसके पति का निधन उसकी यौवनावस्था में ही हो गया था और वो ईसर के नाते आ गई थी। इसलिए धींगा गवर चूंकि विधवा हो गई और उसे ईश्वर की कृपा से पुनः ईसर जैसे पति मिल गए, इसी तथ्य के मद्देनजर विधवाओं को भी इस त्योहार पर पूजन करने की छूट मिल गई।

बेंत मार मेला तर्क:
कहते है कि इस गवर भोलावनी को लड़कों को नहीं देखना चाहिये, इससे कुछ बुरा हो सकता है। कुछ कहते है कि कुँवारा देखता है तो शादी में समस्या आती है, शायद इसलिये तीजणियां गीत गाती, बेंत फटकारती हुई चलती थी जिससे युवा सावधान हो जाए और रास्ते से हट जाए,फिरभी कोई आ गया तो महिलाएं उन्हें बेंत फटकार कर भगाती थी, शायद यहीं आगे चलकर बेंत मारने की परम्परा के रूप में मेला परणित हो गया होगा ।

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