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गणगौर में सुबह गाए जाने वाले गीत देखें

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गणगौर सुबह के गीत –

उठी – उठी-

उठी – उठी गवर निन्दाड़ो खोल निन्दाड़ो खोल , सूरज तपे रे लिलाड़ एक पुजारी ऐ बाई म्हारी गवरजा , गवरजा , ज्यों रे घर रे टूठे म्होरी माय अन्न दे तो धन दे , बाई थरि सासरिये , पीवरिये , अन्न धन भया रे भण्डार ! डब्बा तो भरिया ए बाई थारे गैनों सु गोंठो सु, माणक मोती तपे रे लिलाड़, उठी – उठी गवर निन्दाड़ो खोल निन्दाड़ो खोल..

खोल कीवाडी-

गवर गवरादे माता खोल किवाड़ी , ऐ बाहर उभी थोने पूजन वाळी , ऐ पूजो ऐ पुजारियों बायों , आसण – कासण मोंगो , ऐ मोंगो ए म्हे , अन्न धन लाज लिछमी , ऐ कान कँवरसो बीरो मोंगों , राई सी भौजाई , ऐ राते घुड़ले बेनड़ मोंगो , सोंवळियों बेन्दोई , ऐ हाथ दे हथाली दे , ननोणे फिर आयो , ऐ जूती रे मचालके , चोवटे फिर आयो , ऐ ढोल रे ढमाके , बीरो लाडी लेबे घर आयो , ऐ जठे बाई गवरजा , देवे हे आसीस्यों , ऐ बीरा म्हारा वधजो , बैल जोताईजो , ऐ भावज म्हारी जणजो , पूत सपूता , ऐ सातों ने सुपारी देसों , आठों ने पतासा , ऐ साल केरी सुई अम्मा , डालके रा बागा , ऐ झटपट सीऊ म्हारे भाई – भीतजो रा बागा , ऐ आवो रे भतीजों , थोरी भुवा लाई बागा , ऐ भुवा रे भरोसे , भतीजा रेयग्या नागा , ऐ नागा – नागा क्या करो , म्हे और सिवासों भागा ।

गणगौर के गीत

गणगौर उत्सव में गाए जाने वाले गीत


चुंदड़ी-

इये चून्दडली रो म्हारी गवरजा बाई ने कोड , ले दोनी ओ ब्रम्हादत्तजी रा छावा चून्दड़ी , म्हेतो फिरि आया घिरी आया , राजा – राणी देस – परदेस कंटोड़े ने लाधी सवागण चून्दड़ी आ तो लाधी रे लाधी हेमाचलजी री प्रोळ ( हाट ) , ओढोनी ओ भरमलजी री बेनड़ , चून्दड़ी । इये चून्दडली . . . . .

(महिलाएं इसमें ब्रह्मा दत्त जी के नाम पर अपने ससुर जी का नाम और हिमाचल जी की जगह अपने पिताजी का नाम लेती है।)

दोपहर में गाए जाने वाले गीत और धींगा गवर माता की कहानी के लिए वेबसाइट देखें.. अधिक जानकारी के लिए रमक झमक के फेसबुक पेज से जुड़े

गुड़ला क्यों घुमाया जाता है इसके पीछे क्या कहानी है वह दातनिया देना क्या होता है जानिए नीचे दिए गए वीडियो में-

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शीतला अष्टमी ‘बास्योड़ा’ पूजन की पौराणिक कथा व पूरी जानकारी

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शीतलाष्टमी का त्योहार होली के बाद मनाया जाता है। कई जगह इसे बासौड़ा भी कहते हैं। ये हमें ऋतु परिवर्तन का संकेत भी देते है। इस त्योहार में शीतला माता की पूजा की जाती है और माता को बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसके लिए एक दिन पहले है घरों में भोजन बना लिया जाता है और अष्टमी के दिन माता के भोग लगाया जाता है।

शीतला माता वाले दिन गर्म खाना पीना निषेध है। इस दिन माता के मटके में पानी भरा ठंडा जल चढ़ाने व ठंडा भोजन चढ़ाने की परम्परा है, राजस्थान में बाजरे,गेहूं की रोटी, घाट, मीठी राबड़ी, खट्टी राबड़ी, दही, सांगरी सब्जी, ठंडा हलवा व पूड़ी चढ़ाने का रिवाज है।

इसे ठंडा खाना, बास्योड़ा, शीतला माता आदि के नाम से जाना जाता है। कई लोग होली से पूर्व भी एक दिन ठंडा करते है किसी भी ठंडे वार यानि सोम या गुरु को भी पूजन कर ठंडा खा लेते है । मान्यता है कि माता के ठंडा भोग चढ़ाने व ठंडा भोजन प्रशाद लेने से उनकी कृपा बनी रहती है, उनको उनके बच्चों को चेचक, आंकड़ा काकड़ा, माता नामक बीमारी नही होती। इस दिन माता की सवारी गधे की भी पूजा की जाती है।

16 मार्च को है शीतलाष्टमी

इस बार शीतला सप्तमी 15 मार्च को शुरू होगी। वहीं शीतला अष्टमी 16 मार्च को है। शीतला अष्टमी पर पूजा का मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक है।

शीतला अष्टमी 2020 सोमवार 16 मार्च 2020
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक
शीतला सप्तमी रविवार 15 मार्च 2020

Shitla mata

शीतला सप्तमी/अष्टमी का महत्व

मां शीतला हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं तथा गर्दभ की सवारी किए यह अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घंटकर्ण, त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु नाशक, रोगाणु नाशक, शीतल स्वास्थ्यवर्धक जल होता है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना स्तोत्र को शीतलाष्टक के नाम से व्यक्त किया गया है।

‘वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्। 
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

अर्थात् मैं गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूं। इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में झाड़ू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश में सभी तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है, अत: इसके स्थापन-पूजन से घर परिवार में समृद्धि आती है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र ‘शीतलाष्टक’ के रूप में प्राप्त होता है, इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने जनकल्याण के लिए की थी।

शीतला माता की पौराणिक कथा

एक गांव में ब्राह्मण दंपती रहते थे। दंपति के दो बेटे और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं को लंबे समय के बाद बेटे हुए थे। इतने में शीतला माता का पर्व आया। घर में पर्व के अनुसार ठंडा भोजन तैयार किया। दोनों बहुओं के मन में विचार आया कि यदि हम ठंडा भोजन लेंगी तो बीमार होंगी, बेटे भी अभी छोटे हैं। इस कुविचार के कारण दोनों बहुओं ने तो पशुओं के दाने तैयार करने के बर्तन में गुप-चुप दो बाटी तैयार कर ली।
सास-बहू शीतला की पूजा करके आई, शीतला माता की कथा सुनी। बाद में सास तो शीतला माता के भजन करने के लिए बैठ गई। दोनों बहुएं बच्चे रोने का बहाना बनाकर घर आई। दाने के बरतन से गरम-गरम रोटले निकाले, चूरमा किया और पेटभर कर खा लिया। सास ने घर आने पर बहुओं से भोजन करने के लिए कहा। बहुएं ठंडा भोजन करने का दिखावा करके घर काम में लग गई। सास ने कहा,”बच्चे कब के सोए हुए हैं, उन्हे जगाकर भोजन करा लो’..

बहुएं जैसे ही अपने-अपने बेटों को जगाने गई तो उन्होंने उन्हें मृत पाया। ऐसा बहुओं की करतूतों के फलस्वरुप शीतला माता के प्रकोप से हुआ था। बहुएं विवश हो गई। सास ने घटना जानी तो बहुओं से झगडने लगी। सास बोली कि तुम दोनों ने अपने बेटों की बदौलत शीतला माता की अवहेलना की है इसलिए अपने घर से निकल जाओ और बेटों को जिन्दा-स्वस्थ लेकर ही घर में पैर रखना।

अपने मृत बेटों को टोकरे में सुलाकर दोनों बहुएं घर से निकल पड़ी। जाते-जाते रास्ते में एक जीर्ण वृक्ष आया। यह खेजडी का वृक्ष था। इसके नीचे ओरी शीतला दोनों बहनें बैठी थीं। दोनों के बालों में विपुल प्रमाण में जूं थीं। बहुओं ने थकान का अनुभव भी किया था। दोनों बहुएं ओरी और शीतला के पास आकर बैठ गई। उन दोनों ने शीतला-ओरी के बालों से खूब सारी जूं निकाली। जूँओं का नाश होने से ओरी और शीतला ने अपने मस्तक में शीतलता का अनुभव किया। कहा, तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है,वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।

दोनों बहुएं एक साथ बोली कि पेट का दिया हुआ ही लेकर हम मारी-मारी भटकती हैं, परंतु शीतला माता के दर्शन हुए नहीं हैं। शीतला माता ने कहा कि तुम दोनों पापिनी हो, दुष्ट हो, दुराचारिणी हो, तुम्हारा तो मुंह देखने भी योग्य नहीं है। शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था।
यह सुनते ही बहुओं ने शीतला माताजी को पहचान लिया। देवरानी-जेठानी ने दोनों माताओं का वंदन किया। गिड़गिड़ाते हुए कहा कि हम तो भोली-भाली हैं। अनजाने में गरम खा लिया था। आपके प्रभाव को हम जानती नहीं थीं। आप हम दोनों को क्षमा करें। पुनः ऐसा दुष्कृत्य हम कभी नहीं करेंगी।

उनके पश्चाताप भरे वचनों को सुनकर दोनों माताएं प्रसन्न हुईं। शीतला माता ने मृत बालकों को जीवित कर दिया। बहुएं तब बच्चों के साथ लेकर आनंद से पुनः गांव लौट आई। गांव के लोगों ने जाना कि दोनों बहुओं को शीतला माता के साक्षात दर्शन हुए थे। दोनों का धूम-धाम से स्वागत करके गांव प्रवेश करवाया। बहुओं ने कहा,’हम गाँव में शीतला माता के मंदिर का निर्माण करवाएंगी।

चैत्र महीने में शीतला अष्टमी के दिन मात्र ठंडा खाना ही खाएंगी| शीतला माता ने बहुओं पर जैसी अपनी दृष्टि की वैसी कृपा सब पर करें। श्री शीतला मां सदा हमें शांति, शीतलता तथा आरोग्य दें।

शीतले त्वं जगन्माता

शीतले त्वं जगत् पिता।

शीतले त्वं जगद्धात्री

शीतलायै नमो नमः।।

|| बोलो श्री शीतला मात की जय ||

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सखी सखी में सूरज दिख्यो ? ज्योहीं टुठ्यो, सूरज रोटा कथा व्रत विधि

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होली दहन के बाद प्रथम रविवार को सूरज रोटे का व्रत होता है। भगवान सूर्य के लिये गेहूं के आटा से करीब 1 इंच मोटाई की रोटी हाथ से थप थपा कर बनाई जाती है जिसके सेंटर में एक छेद रख दिया जाकर पकाई/सेकी जाती है।
महिलाएं ये रोटा लेकर घर की छत या आंगन में जहां सूर्य अच्छे से दिखाई पड़ता है वहाँ से समूह के रूप में एकत्रित होकर अपना अपना रोटा लेकर उसमें से भगवान सूर्य के दर्शन करती है और अर्घ्य देती है। जब रोटे के बीच छेद से सूर्य के दर्शन करती है तो पास खड़ी औरत
पूछती है सखी सखी में सूरज दिख्यो ? जवाब में बोलती है दिख्यो ज्योहीं टुठ्यो, इस प्रकार सास ससुर रिश्तेदारों व गहनों आदि का नाम लिया जाता है।

सूरज रोटे की कहानी :-

दो माँ बेटी थी, दोनुं जण्या सूरज भगवान को व्रत करती, एक दिन माँ बोली कि में बारे जांउ तुं दो रोटा पो लिये बेटी दो रोटा पो लिया, एक जोगी भिक्षा मांग न आयो बा भिक्षा देवण लागी तो ली कोनी के मे तो रोटो लेवुं, बिरो रोटो सिक्यो कोनी, सो बा माँ के रोटे में से कोर तोड के दे दी माँ आई रोटे की कोर टुटयोडी देकर केवण लागी घी रोटे घी रोटे री कोर ला म्हारे सागी रोटे री कोर केवती-केवती गांव में फिरण लागगी बेटी डर के मारे पीपल के झाड पर चढर बेठगी चार-पाँच दिन हुं, गया सुरज भगवान ने दया आयी सुरज भगवान पाणी रो लोटो चुरमेरी बाटकी उण ने भेज दी, एक दिन राजा रो कंवर शिकार करण ने आयो और पीपल री ठण्डी छाया है, कोई ठण्डो पाणी पिवण ने देवे तो चोखो हुवे जणा बा छोरी उपरसू पाणी नाख्यो जणा पाछो राजा रो कंवर बोल्यो म्हने तो घणी भूख लागी है कोई खावण ने दे देवे तो चोखो हुवे, जणा बा छोरी उपरस्युं लाडु नाख्यो। राजा रे कंवर री भूख मिट गई कंवर खुद चढकर पते पते में देखण लाग्यो तो बिने दिखी बो बोल्यो कि तु कुण है भूत है कि प्रेत है, देवता है कि मानव है, जणा छोरी बोली म्हे मानव हूँ राजा रो कवंर छोरी ने पूछण लाग्यो कि तुं म्हारे सागे ब्याव करे कांई छोरी बोली राजाजी थे नगरी रा राजा म्हे एक अनाथ छोरी म्हारो तो कोई कोनी राजाजी मान्यो कोनी पडितान बुलाकर पिपल रे पेड रे नीचे फेरा फिरा कर ब्याव करके घरां गयो सुख से रेवण लागगा एक दिन बिकी माँ घी रोटी घी रोटी री कोर ला म्हारे सागी रोटे री कोर, करती करती जावे ही बेटी रुपर स्यूं देखली सिपाइया ने भेजर माँ न पकडकर एक कमरे मे बदं कर दी एक दिन राजाजी सगला कमरा री चाबी मांगी, या छ कमरा री चाबी तो दे दी सातवा कमरा री चाबी दी कोनी राजाजी हट करके सातवा कमरा री चाबी दी कोनी
राजाजी हट करके सातवा कमरा री चोबी ले ली कमरो खोल कर देखे तो आगे सोना री शिला पडी है राजाजी राणी ने पुछयो राणीजी ओ कांई राणी बोली म्हारे दुबला पोहर री भेंट है राजाजी बोल्या मने थारो पीयर देखणो है। राणी बोली राजाजी म्हारे कठे पीयर हे थे तो म्हाने पीपल के झाड के नीचे सुं लाया राजा जी हट करके बैठ गया जणा राणी सुरज भगवान सुं विनंती करी ओर सवा दिन को पीयर माग्यों। सूरज भगवान सपना में आपने राणी ने सवा पोर को पीयर बासो पीपल के झाड के नीचे दिया। राजा राणी, राणी रे पीयर गया सगला घणो ही लाड कोड करिया राजाजी ने धणो ही आनन्द हुयो राणी तो घरा चालण रो केवण लागी जणा राजा कियो कि इतो चोखो सांसरो है म्हे तो अठे रस्युं राणी हट करण लागगी, राजा राणी सीख भेर निकल्या, राजाजी आपरी पगारी मोचडी और घोडी रो ताजनो बठे ही भूल गया थोडा आगे गया जद ब्याने याद आयी, राजाजी पाछा फिरया जार देखे तो झाड रे नीचे मोचडी ओर घोडी रो ताजनो पडयो हो बाकी कुछ भी कोनी जणे राजाजी कियो राणी ओ कोई, जणा राणीजी बोली म्हारे पीर कोनी थो, सो में सुरज भगवान कने सवा पोर को पीर वासो मांग्यो म्हारी माँ रोटो खांडो हुयो जिके सुं गेली हुयगी वा नगरी में आयी ही, जणा म्हे उणाने कमरे में बंद कर दी उरी सोनारी शिला हुयगी, या सुण के राजा नगरी मेें ढिढोरो पिटवा दिया कि सगला कोई सुरज रोटे रो व्रत करियो, हे सुरज भगवान जिसो बिने पीर बासो दिया बिसो सबने दिया, कहत सुणत हुंकारा भरत आपणे सारे परिवार ने दिया म्हाने भी दिया।
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होली के बाद जाम बीज को पापड़ उवारना भी जरूरी

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होली खेलने के बाद राम राम वाले दिन या उसके अगले दिन द्वितीया को जिसे जाम बीज या जमला बीज भी कहते है, इस दिन बहन भुआ या स्वास्नी अपने भाई भतीजे आदि को उनके ऊपर से एक उतारा करने की परम्परा है। पानी का लौटा, तला पापड़, कैर, काचरी व फली तली हुई लेकर उपर से उवारती है यानी क्लॉक वाइज घुमाती हैं फिर घर से बाहर जाकर पापड़ आदि सामग्री सड़क पर रख उसके चारों ओर एक वृत्ताकार घेरा यानि चक्रिया बनाती है । सामग्री को सड़क पर ही छोड़ दी जाती है जिसे परिवार या पड़ोसी उठा लेते है और खाते है ।

आमतौर से उतारा उवारां या किसी के सिर के ऊपर से घुमाई चीज कोई नहीं खाता जानवर खाते है, लेकिन यहाँ सिर्फ इस दिन ऐसा नहीं होता, माना जाता कि किसी दूसरे का उवारां खाने से ‘बाला’ नहीं बहता इसका सामान्य अर्थ है उसे एक विशेष प्रकार का रोग नहीं होता। एक मान्यता है कि उवारने से नजर उतर जाती है और जो खाता है उसकी भी !! लेकिन खुद का नहीं खा सकते।
बुजुर्ग कहते है होली खेलने के बाद इसे करना बहुत जरूरी है, ये उवारां पापड़ घर परिवार सबको खाना चाहिये ।
(रमक झमक- बीकानेर)

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होलिका दहन और माला घोलाई मुहूर्त

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वर्ष 2020 मार्च 9,फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा सोमवार । माला घोलाई मुहूर्त लगभग 1:11 दोपहर बाद।
होलिका दहन मुहूर्त शाम 6:28 से 8:55 तथा सिंह लग्न भी । (जानकारी सोर्स पत्रिका)
माला घोलाई भरभोलिये यानि गोबर की माला से करना उत्तम, पूरी जानकारी के लिए देखें वीडियो –

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गोबर की माला (भरभोलिए) से करें माला घाेलाई की रस्म

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होली वाले दिन भाई के माला घोलाई की परम्परा है। आजकल होली के दिन माला घोलाई रस्म भाई को पुष्प माला पहनाकर की जा रही है, जो गलत है। इन्ही पुष्प माला को होली में डाला जा रहा है जो पूर्णतया निषेद्ध है । तो आइये जानते क्या करना चाहिये जिससे भाई की रक्षा दैहिक रक्षा हो और पर्यावरण शुद्ध हो तथा स्वयं बहन के लिये भी मंगल हो ।

क्या होते है भरभोलिये:-
(रमक झमक)
देशी गाय के गोबर को हाथ से जमीन पर रखकर थेपडीनुमा गोल लगभग 3 इंच गोलाकार ऑपले जमीन पर बनाकर उसमें अंगुली आए उतना साइज का छेद कर इन्हें धूप में सुखाया जाता है। इन्हें होली के दिन माला बनाकर भाई के ऊपर से घुमाया जाता है।

कितने भरभोलिये और क्यों:-
(रमक झमक)
पांच भर भरभोलिये को मूँझ में पिरोकर गांठ लगाई जाती है यानि गोबर भरभोलिए की 5 मनकों की माला।
ये भौतिक शरीर पांच तत्वों से बना है:अग्नि,जल,पृथ्वी,जल और आकाश । ये पांच भरभोलिये पांच तत्वों का प्रतीक है।
क्या है फायदा:-
(रमक झमक)
गोबर से बने भरभोलियों को एक छोटी लकड़ी की डंडी में डालकर होली के दिन बहन द्वारा भाई के शरीर अंगूठे से सिर तक 7 बार घुमाकर शाम को होलिका की अग्नि में डाला जाता है,ऐसी मान्यता है कि भाई के शरीर के किसी भी पांचों तत्व में कोई प्रॉब्लम आ गई है तो वे इन भरभोलिये में आ जाती है जो होलिका के साथ ही जल जाती है ये भाव है।पांच तत्वों से शरीर की सुरक्षा हो जाती है। गोबर के ये ऑपले जलने से पर्यवरण शुद्ध होता है और इसकी अग्नि के चारों ओर परिक्रमा देने शरीर आरोग्य होता है इसलिये शहर में जलती होली की परिक्रमा औरत पुरुष सब करते है।
देखें वीडियो –

माला घोलाई में पुष्प क्यों नहीं:-
(रमक झमक)
जो पुष्प माला घुमाकर होलिका की अग्नि में डालते है निषेध है,पुष्प अग्नि में डालना वर्जित है,इससे दरिद्रता आती है।अगर जो लोग इसे नहीं जलाकर घर में ही रख लेते है वो घर में नेगेटिव एनर्जी देता है। कुछ घुमाकर भाई को पहना देते है वो विपरीत काम करता है। इसलिये ऐसा बिल्कुल न करें।

अपनी मौलिक परम्परा सस्कृति के पीछे बुजुर्गों की गहरी सोच रही है इसके फायदों व वैज्ञानिक आधार को हम समझे ,देखा देखी होड़ व दिखावे में न पड़े।
**प्रहलाद ओझा ‘भैरु’
(रमक झमक,बीकानेर)
9460502573

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वास्तव में क्या और कैसे होती है डोलची

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ये है वास्तविक ‘डोलची’
-यह चमड़े की बनी होती है।
-डोलची ऊंट की खाल से बनी होती है।
-इसके पीछे लकड़ी का हत्था इसे पकड़ने के लिये होता है।
-इसमें करीब 800 से 900 ml पानी भरा जाता है।
-इसका आगे का मुंह तिकोना टाइप होता है।
-यह दो प्रकार की होती है,लेफ्ट हेंडर के लिये अलग व राइट हेंडर के लिये अलग।
-इसकी लम्बाई 9 इंच होती है।
-इसका मुच् करीब साढ़े तीन से चार इंच तक बनावट के अनुरूप होता है।
-इसमें पानी भर कर एक दूसरे की पीठ पर पानी का वार किया जाता है।
-पानी का वार जितना ज्यादा होगा जबरदस्त होगा तो पानी बहुत तेज सटाक सटाक की आवाज करता है।
-यह डोलची पानी मार होली खेल मुख्य रूप से हर्ष व्यास जाती में होता है इसके अलावा ओझा छंगाणी के बीच भी कई वर्षों से हो रहा है,सिंगियो में भी होने लगा है।
-आज कल ये डोलची गिने चुने लोगों के पास ही है,अब लोहे की बनाई जा रही है लेकिन चमड़े की डोलची का मुकाबला नहीं ।
खेलने वाले सगे सम्बन्धी होते है।
यह पीठ पर भर कर मारी जाती है ।

-एक अच्छी डोलची की वॉर कोई सामान्य आदमी के पड़ जाए तो महीनों कमर दर्द रह सकता है।
-यह खेल पुरानी किसी रंजिश को प्रतीक बनाकर इसे प्रेम सौहार्द से खेलते है।
-बीकानेर की होली के -विभिन्न रंग है और अनूठी परम्पराए है जिसमें एक उदाहरण मात्र है,यहाँ ऐसी रस्मे बहुत है जो बीकानेरी होली को खाश बनाती है।
रमक झमक के लिये प्रहलाद ओझा ‘भैरु’

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