ज्योतिष / वास्तु

विषम स्थितियों में कैसे करे माता की पूजा

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कैसे करें की माता प्रसन्न भी हो

पूरा विश्व कोराना की महामारी से त्रस्त है और भारत भी इस संकट के दौर से गुजर रहा है । चारों और लॉकडाउन है घरों में लोग सिमिट रहे है,बाज़ार जाना सम्भव नहीं या दुकानों माता की पूजन उपलब्ध नहीं ऐसे में सनातनी लोग नवरात्रा में देवी की पूजा कैसे करें यह सबके मन में चल रहा होगा। इसके लिये आप चिंता न करें शास्त्रों में स्पस्ट भी उल्लेख है देश,काल,समय और परिस्थिति के अनुरुप ही हमें हर कार्य करना चाहिये।
आप के घर माता की चुनरी नहीं है तो लाल ब्लाउज पीस या लाल केशरिया वस्त्र ओढ़ा सकते है अगर ये नहीं तो मोली ही काफी है अगर ये भी नहीं हो तो लाल रेशमी केशरिया कोई भी धागा हो तो वो भी चढ़ा सकते है।
प्रशाद मिठाई अभी नहीं मिल सकती और मिले तो भी अभी बाहर से लाना उचित भी नहीं तो क्यों न माता के गुड़ की लापसी , हलवा, खीर, गुलकंद या सिंघाड़े का सीरा खुद घर में बनाकर चढ़ाए तो इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता अगर इनमें से कोई नहीं है तो मिश्री और मिश्री नही तो गुड़ अथवा चीनी भी चढ़ा सकते है। फल उपलब्ध न हो तो लोंग/इलायची/सुपारी इन तीनों में जो उपलब्ध हो वो चढ़ा दे।

माता के पास पालसिये में ज्वारे बोए जाते है इन परिस्थितियों में पालसिये भी नहीं ला सकें होंगे तो वो भी चिंता न करे भूमि पर या किसी भी धातु के पात्र में मिट्टी डालकर बुआई करलें।
इस प्रकार 9 दिन भोग में दूध, चीनी, घर में बनाकर शक्कर का चूरमा आदि भोग चढ़ा देवे। वैसे भी पहले बाजारों की मिठाइयां नहीं बल्कि घर में बनाई ही मिठाई चढ़ाई जाती थी । फल भी आटे व हल्दी जो घर मे उपलब्ध रहते है उसके बना सकते है ये फल शादी विवाह में भी आज भी यूज किया जाता है ।

कोई चीज जो भी लगे चढ़ानी जरूरी है और आपका मन है या जहाँ भी आप है वहाँ ऊपर बताया वो भी सम्भव नहीं है तो आप सबसे पहले स्वयं गंगा का स्मरण कर अपने आपको पवित्र कर और माता की पूजा मानसिक रूप से करें आवाह्न स्नान भोग सब मानसिक रूप से निवेदन करें, वैसे भी पूजन में सामग्री की बजाय भाव महत्वपूर्ण है।

इस संकट की घड़ी में भी सकारात्मक सोच रखे कि माता ने आपको कुछ दिन घर में रहकर ध्यान स्मरण जाप व प्रार्थना करने का अवसर दिया है। आप नियमित माता का दुर्गाशप्तष्टि का पाठ करें, किताब उपलब्ध न हो तो इंटरनेट पर है या फिर सुने या माता का नवाहण मन्त्र की 11, 21, 108 जितनी सम्भव हो करें और पूजा माला के अंत में शांति मन्त्र अथवा ‘नमः शिवाय’ की एक माला जरूर करें और अपने व देश की रक्षा करने के लिये प्राथर्ना करें।
जिनको पाठ आता है वो रोग भय शांत के लिये कल्याण के लिये ‘रोगा न शेषा…’ मन्त्र सम्पुट लगाए अथवा दुर्गाशप्ती के पीछे अथवा नेंट में ‘सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमस्तुते व ‘रोगा न…’ की एक माला प्रतिदिन जाप करें। इससे आत्मबल बढ़ेगा, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा।

अपने अपने घर में रहकर प्रशासन के नियम की पालना के साथ उक्त विधि अपनाएँ पूजन आदि सामग्री के लिये बाहर निकलने की कोई आवश्यकता नही है, देवी माँ की कृपा जरूर होगी । अगर पहले दिन पूजा नहीं कर पाए तो भी कोई नहीं ये 9 दिन में कभी भी करलें । विश्व कल्याण और इस महामारी से मुक्ति के लिए माता से प्राथना जरूर करें..

– 25 मार्च घट स्थापना मुहूर्त

सुबह – 6:27 से 9:30 बजे तक व 11 से 12:30 तक

।।जय माता दी ।।

प्रहलाद ओझा ‘भैरु’

शैलपुत्री माता की कथा वीडियो

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शीतला अष्टमी ‘बास्योड़ा’ पूजन की पौराणिक कथा व पूरी जानकारी

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शीतलाष्टमी का त्योहार होली के बाद मनाया जाता है। कई जगह इसे बासौड़ा भी कहते हैं। ये हमें ऋतु परिवर्तन का संकेत भी देते है। इस त्योहार में शीतला माता की पूजा की जाती है और माता को बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसके लिए एक दिन पहले है घरों में भोजन बना लिया जाता है और अष्टमी के दिन माता के भोग लगाया जाता है।

शीतला माता वाले दिन गर्म खाना पीना निषेध है। इस दिन माता के मटके में पानी भरा ठंडा जल चढ़ाने व ठंडा भोजन चढ़ाने की परम्परा है, राजस्थान में बाजरे,गेहूं की रोटी, घाट, मीठी राबड़ी, खट्टी राबड़ी, दही, सांगरी सब्जी, ठंडा हलवा व पूड़ी चढ़ाने का रिवाज है।

इसे ठंडा खाना, बास्योड़ा, शीतला माता आदि के नाम से जाना जाता है। कई लोग होली से पूर्व भी एक दिन ठंडा करते है किसी भी ठंडे वार यानि सोम या गुरु को भी पूजन कर ठंडा खा लेते है । मान्यता है कि माता के ठंडा भोग चढ़ाने व ठंडा भोजन प्रशाद लेने से उनकी कृपा बनी रहती है, उनको उनके बच्चों को चेचक, आंकड़ा काकड़ा, माता नामक बीमारी नही होती। इस दिन माता की सवारी गधे की भी पूजा की जाती है।

16 मार्च को है शीतलाष्टमी

इस बार शीतला सप्तमी 15 मार्च को शुरू होगी। वहीं शीतला अष्टमी 16 मार्च को है। शीतला अष्टमी पर पूजा का मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक है।

शीतला अष्टमी 2020 सोमवार 16 मार्च 2020
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक
शीतला सप्तमी रविवार 15 मार्च 2020

Shitla mata

शीतला सप्तमी/अष्टमी का महत्व

मां शीतला हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं तथा गर्दभ की सवारी किए यह अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घंटकर्ण, त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु नाशक, रोगाणु नाशक, शीतल स्वास्थ्यवर्धक जल होता है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना स्तोत्र को शीतलाष्टक के नाम से व्यक्त किया गया है।

‘वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्। 
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

अर्थात् मैं गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूं। इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में झाड़ू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश में सभी तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है, अत: इसके स्थापन-पूजन से घर परिवार में समृद्धि आती है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र ‘शीतलाष्टक’ के रूप में प्राप्त होता है, इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने जनकल्याण के लिए की थी।

शीतला माता की पौराणिक कथा

एक गांव में ब्राह्मण दंपती रहते थे। दंपति के दो बेटे और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं को लंबे समय के बाद बेटे हुए थे। इतने में शीतला माता का पर्व आया। घर में पर्व के अनुसार ठंडा भोजन तैयार किया। दोनों बहुओं के मन में विचार आया कि यदि हम ठंडा भोजन लेंगी तो बीमार होंगी, बेटे भी अभी छोटे हैं। इस कुविचार के कारण दोनों बहुओं ने तो पशुओं के दाने तैयार करने के बर्तन में गुप-चुप दो बाटी तैयार कर ली।
सास-बहू शीतला की पूजा करके आई, शीतला माता की कथा सुनी। बाद में सास तो शीतला माता के भजन करने के लिए बैठ गई। दोनों बहुएं बच्चे रोने का बहाना बनाकर घर आई। दाने के बरतन से गरम-गरम रोटले निकाले, चूरमा किया और पेटभर कर खा लिया। सास ने घर आने पर बहुओं से भोजन करने के लिए कहा। बहुएं ठंडा भोजन करने का दिखावा करके घर काम में लग गई। सास ने कहा,”बच्चे कब के सोए हुए हैं, उन्हे जगाकर भोजन करा लो’..

बहुएं जैसे ही अपने-अपने बेटों को जगाने गई तो उन्होंने उन्हें मृत पाया। ऐसा बहुओं की करतूतों के फलस्वरुप शीतला माता के प्रकोप से हुआ था। बहुएं विवश हो गई। सास ने घटना जानी तो बहुओं से झगडने लगी। सास बोली कि तुम दोनों ने अपने बेटों की बदौलत शीतला माता की अवहेलना की है इसलिए अपने घर से निकल जाओ और बेटों को जिन्दा-स्वस्थ लेकर ही घर में पैर रखना।

अपने मृत बेटों को टोकरे में सुलाकर दोनों बहुएं घर से निकल पड़ी। जाते-जाते रास्ते में एक जीर्ण वृक्ष आया। यह खेजडी का वृक्ष था। इसके नीचे ओरी शीतला दोनों बहनें बैठी थीं। दोनों के बालों में विपुल प्रमाण में जूं थीं। बहुओं ने थकान का अनुभव भी किया था। दोनों बहुएं ओरी और शीतला के पास आकर बैठ गई। उन दोनों ने शीतला-ओरी के बालों से खूब सारी जूं निकाली। जूँओं का नाश होने से ओरी और शीतला ने अपने मस्तक में शीतलता का अनुभव किया। कहा, तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है,वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।

दोनों बहुएं एक साथ बोली कि पेट का दिया हुआ ही लेकर हम मारी-मारी भटकती हैं, परंतु शीतला माता के दर्शन हुए नहीं हैं। शीतला माता ने कहा कि तुम दोनों पापिनी हो, दुष्ट हो, दुराचारिणी हो, तुम्हारा तो मुंह देखने भी योग्य नहीं है। शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था।
यह सुनते ही बहुओं ने शीतला माताजी को पहचान लिया। देवरानी-जेठानी ने दोनों माताओं का वंदन किया। गिड़गिड़ाते हुए कहा कि हम तो भोली-भाली हैं। अनजाने में गरम खा लिया था। आपके प्रभाव को हम जानती नहीं थीं। आप हम दोनों को क्षमा करें। पुनः ऐसा दुष्कृत्य हम कभी नहीं करेंगी।

उनके पश्चाताप भरे वचनों को सुनकर दोनों माताएं प्रसन्न हुईं। शीतला माता ने मृत बालकों को जीवित कर दिया। बहुएं तब बच्चों के साथ लेकर आनंद से पुनः गांव लौट आई। गांव के लोगों ने जाना कि दोनों बहुओं को शीतला माता के साक्षात दर्शन हुए थे। दोनों का धूम-धाम से स्वागत करके गांव प्रवेश करवाया। बहुओं ने कहा,’हम गाँव में शीतला माता के मंदिर का निर्माण करवाएंगी।

चैत्र महीने में शीतला अष्टमी के दिन मात्र ठंडा खाना ही खाएंगी| शीतला माता ने बहुओं पर जैसी अपनी दृष्टि की वैसी कृपा सब पर करें। श्री शीतला मां सदा हमें शांति, शीतलता तथा आरोग्य दें।

शीतले त्वं जगन्माता

शीतले त्वं जगत् पिता।

शीतले त्वं जगद्धात्री

शीतलायै नमो नमः।।

|| बोलो श्री शीतला मात की जय ||

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होली के बाद जाम बीज को पापड़ उवारना भी जरूरी

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होली खेलने के बाद राम राम वाले दिन या उसके अगले दिन द्वितीया को जिसे जाम बीज या जमला बीज भी कहते है, इस दिन बहन भुआ या स्वास्नी अपने भाई भतीजे आदि को उनके ऊपर से एक उतारा करने की परम्परा है। पानी का लौटा, तला पापड़, कैर, काचरी व फली तली हुई लेकर उपर से उवारती है यानी क्लॉक वाइज घुमाती हैं फिर घर से बाहर जाकर पापड़ आदि सामग्री सड़क पर रख उसके चारों ओर एक वृत्ताकार घेरा यानि चक्रिया बनाती है । सामग्री को सड़क पर ही छोड़ दी जाती है जिसे परिवार या पड़ोसी उठा लेते है और खाते है ।

आमतौर से उतारा उवारां या किसी के सिर के ऊपर से घुमाई चीज कोई नहीं खाता जानवर खाते है, लेकिन यहाँ सिर्फ इस दिन ऐसा नहीं होता, माना जाता कि किसी दूसरे का उवारां खाने से ‘बाला’ नहीं बहता इसका सामान्य अर्थ है उसे एक विशेष प्रकार का रोग नहीं होता। एक मान्यता है कि उवारने से नजर उतर जाती है और जो खाता है उसकी भी !! लेकिन खुद का नहीं खा सकते।
बुजुर्ग कहते है होली खेलने के बाद इसे करना बहुत जरूरी है, ये उवारां पापड़ घर परिवार सबको खाना चाहिये ।
(रमक झमक- बीकानेर)

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होलिका दहन और माला घोलाई मुहूर्त

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वर्ष 2020 मार्च 9,फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा सोमवार । माला घोलाई मुहूर्त लगभग 1:11 दोपहर बाद।
होलिका दहन मुहूर्त शाम 6:28 से 8:55 तथा सिंह लग्न भी । (जानकारी सोर्स पत्रिका)
माला घोलाई भरभोलिये यानि गोबर की माला से करना उत्तम, पूरी जानकारी के लिए देखें वीडियो –

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गोबर की माला (भरभोलिए) से करें माला घाेलाई की रस्म

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होली वाले दिन भाई के माला घोलाई की परम्परा है। आजकल होली के दिन माला घोलाई रस्म भाई को पुष्प माला पहनाकर की जा रही है, जो गलत है। इन्ही पुष्प माला को होली में डाला जा रहा है जो पूर्णतया निषेद्ध है । तो आइये जानते क्या करना चाहिये जिससे भाई की रक्षा दैहिक रक्षा हो और पर्यावरण शुद्ध हो तथा स्वयं बहन के लिये भी मंगल हो ।

क्या होते है भरभोलिये:-
(रमक झमक)
देशी गाय के गोबर को हाथ से जमीन पर रखकर थेपडीनुमा गोल लगभग 3 इंच गोलाकार ऑपले जमीन पर बनाकर उसमें अंगुली आए उतना साइज का छेद कर इन्हें धूप में सुखाया जाता है। इन्हें होली के दिन माला बनाकर भाई के ऊपर से घुमाया जाता है।

कितने भरभोलिये और क्यों:-
(रमक झमक)
पांच भर भरभोलिये को मूँझ में पिरोकर गांठ लगाई जाती है यानि गोबर भरभोलिए की 5 मनकों की माला।
ये भौतिक शरीर पांच तत्वों से बना है:अग्नि,जल,पृथ्वी,जल और आकाश । ये पांच भरभोलिये पांच तत्वों का प्रतीक है।
क्या है फायदा:-
(रमक झमक)
गोबर से बने भरभोलियों को एक छोटी लकड़ी की डंडी में डालकर होली के दिन बहन द्वारा भाई के शरीर अंगूठे से सिर तक 7 बार घुमाकर शाम को होलिका की अग्नि में डाला जाता है,ऐसी मान्यता है कि भाई के शरीर के किसी भी पांचों तत्व में कोई प्रॉब्लम आ गई है तो वे इन भरभोलिये में आ जाती है जो होलिका के साथ ही जल जाती है ये भाव है।पांच तत्वों से शरीर की सुरक्षा हो जाती है। गोबर के ये ऑपले जलने से पर्यवरण शुद्ध होता है और इसकी अग्नि के चारों ओर परिक्रमा देने शरीर आरोग्य होता है इसलिये शहर में जलती होली की परिक्रमा औरत पुरुष सब करते है।
देखें वीडियो –

माला घोलाई में पुष्प क्यों नहीं:-
(रमक झमक)
जो पुष्प माला घुमाकर होलिका की अग्नि में डालते है निषेध है,पुष्प अग्नि में डालना वर्जित है,इससे दरिद्रता आती है।अगर जो लोग इसे नहीं जलाकर घर में ही रख लेते है वो घर में नेगेटिव एनर्जी देता है। कुछ घुमाकर भाई को पहना देते है वो विपरीत काम करता है। इसलिये ऐसा बिल्कुल न करें।

अपनी मौलिक परम्परा सस्कृति के पीछे बुजुर्गों की गहरी सोच रही है इसके फायदों व वैज्ञानिक आधार को हम समझे ,देखा देखी होड़ व दिखावे में न पड़े।
**प्रहलाद ओझा ‘भैरु’
(रमक झमक,बीकानेर)
9460502573

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शिव पुराण के अनुसार जानिए महाशिवरात्रि कथा और महत्व

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महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है इस दिन क्या हुआ था इसके बारे अलग अलग मत माने जाते है । कई जगह भगवान शिव के विवाह और कई जगह शिव भगवान के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।
चेन नाथ जी धुणा शिव मंदिर के योगी विलासनाथ जी ( शिव सत्यनाथ जी महाराज के शिष्य ) ने बताया कि भगवान शिव के मुख्य पुराण ‘ शिव पुराण ‘ में कहीं भी इस दिन भगवान शिव के विवाह का उल्लेख नहीं है, शिव जी के विवाह का पुराण में अलग दिनों में उल्लेख किया गया है।
शिव पुराण में महाशिवरात्रि के बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि इस दिन भगवान शिव लिंगाकार से प्रकट हुए थे इस लिंग के आकार का ना कोई आदी था ना कोई अंत । इस बारे में ब्रह्मा विष्णु भी इसका पता नहीं लगा सके थे। इसके बारे में विस्तारित रूप से इस वीडियो में बताया गया है आप वीडियो में जान सकते है महाशिवरात्रि की पूरी कहानी ..

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षट्तिला एकादशी व्रत कथा

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भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा को समर्पित षटतिला एकादशी 20 जनवरी 2020 दिन सोमवार को है। इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने और भगवान की पूजा करने से धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति तो होती है, व्यक्ति को नर्क से मुक्ति के साथ मोक्ष भी मिलता है। उस व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात वैकुण्ठ की प्राप्ति भी होती है। षटतिला एकादशी के पूजा, स्नान आदि के समय काले तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। षटतिला एकादशी के दिन व्रत रखने वाले व्यक्तियों को षटतिला एकादशी कथा जरूर सुननी चाहिए। 

षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha):

षटतिला एकादशी की व्रत कथा इस प्रकार है, पुलस्‍त्‍य ऋषि ने यह कथा दालभ्य ऋषि से कही थी जो इस प्रकार है, एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से लोक कल्‍याण के लिए प्रश्‍न किया जिसके उत्‍तर में श्री भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि- हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसकी काया अत्‍यंत क्षीण व दुर्बल हो गई। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए अन्न या धन का दान नहीं किया था।

इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।

घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।

उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जय श्री कृष्ण

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