ज्योतिष / वास्तु

शिव पुराण के अनुसार जानिए महाशिवरात्रि कथा और महत्व

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महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है इस दिन क्या हुआ था इसके बारे अलग अलग मत माने जाते है । कई जगह भगवान शिव के विवाह और कई जगह शिव भगवान के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।
चेन नाथ जी धुणा शिव मंदिर के योगी विलासनाथ जी ( शिव सत्यनाथ जी महाराज के शिष्य ) ने बताया कि भगवान शिव के मुख्य पुराण ‘ शिव पुराण ‘ में कहीं भी इस दिन भगवान शिव के विवाह का उल्लेख नहीं है, शिव जी के विवाह का पुराण में अलग दिनों में उल्लेख किया गया है।
शिव पुराण में महाशिवरात्रि के बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि इस दिन भगवान शिव लिंगाकार से प्रकट हुए थे इस लिंग के आकार का ना कोई आदी था ना कोई अंत । इस बारे में ब्रह्मा विष्णु भी इसका पता नहीं लगा सके थे। इसके बारे में विस्तारित रूप से इस वीडियो में बताया गया है आप वीडियो में जान सकते है महाशिवरात्रि की पूरी कहानी ..

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षट्तिला एकादशी व्रत कथा

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भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा को समर्पित षटतिला एकादशी 20 जनवरी 2020 दिन सोमवार को है। इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने और भगवान की पूजा करने से धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति तो होती है, व्यक्ति को नर्क से मुक्ति के साथ मोक्ष भी मिलता है। उस व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात वैकुण्ठ की प्राप्ति भी होती है। षटतिला एकादशी के पूजा, स्नान आदि के समय काले तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। षटतिला एकादशी के दिन व्रत रखने वाले व्यक्तियों को षटतिला एकादशी कथा जरूर सुननी चाहिए। 

षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha):

षटतिला एकादशी की व्रत कथा इस प्रकार है, पुलस्‍त्‍य ऋषि ने यह कथा दालभ्य ऋषि से कही थी जो इस प्रकार है, एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से लोक कल्‍याण के लिए प्रश्‍न किया जिसके उत्‍तर में श्री भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि- हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसकी काया अत्‍यंत क्षीण व दुर्बल हो गई। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए अन्न या धन का दान नहीं किया था।

इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।

घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।

उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जय श्री कृष्ण

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सूर्यग्रहण क्यों होता है पौराणिक कथा जानिए, सम्पूर्ण जानकारी

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ग्रहण का पौराणिक महत्‍व, सूर्यग्रहण सूतक काल, क्या करें क्या नहीं, क्या होता है सूर्यग्रहण

ग्रहण का पौराणिक महत्‍व

पौराणिक कथानुसार समुद्र मंथन के दौरान जब देवों और दानवों के साथ अमृत पान के लिए विवाद हुआ तो इसको सुलझाने के लिए मोहनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। जब भगवान विष्णु ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग बिठा दिया। लेकिन असुर छल से देवताओं की लाइन में आकर बैठ गए और अमृत पान कर लिया। देवों की लाइन में बैठे चंद्रमा और सूर्य ने राहू को ऐसा करते हुए देख लिया। इस बात की जानकारी उन्होंने भगवान विष्णु को दी, जिसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहू का सर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन राहू ने अमृत पान किया हुआ था, जिसके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई और उसके सर वाला भाग राहू और धड़ वाला भाग केतू के नाम से जाना गया। इसी कारण राहू और केतु सूर्य और चंद्रमा को अपना शत्रु मानते हैं।

सूर्य ग्रहण का सूतक काल

सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले 25 दिसंबर को शाम 5 बजकर 32 मिनट से लगेगा और ग्रहण खत्म होने पर समाप्त होगा। सूतक काल को किसी शुभ कार्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।  बताया जा रहा है कि आंशिक सूर्य ग्रहण सुबह 8.04 मिनट से शुरू होगा। सूर्य ग्रहण सुबह  9.24 से चंद्रमा सूर्य के किनारे को ढकना शुरू कर देगा। इसके बाद सुबह 9.26  तक पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। 11.05 तक यह सूर्य ग्रहण समाप्त हो जाएगा। कुल मिलाकर 3.12 मिनट का यह सूर्य ग्रहण होगा।

क्या होता है सूर्य ग्रहण?

हम इस बारे में अक्सर बात करते हैं कि अला दिन सूर्य ग्रहण होगा या फला दिन होगा। लेकिन क्या आप जानते है कि सूर्य ग्रहण किसे कहते हैं? असल में सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा के आ जाने की खगोलिया स्थिति से जब सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाता है, तो इस स्थिति को ही सूर्य ग्रहण कहा जाता है।

क्या करें क्या नहीं

ग्रहण काल में खान-पान, शोर, शुभ कार्य, पूजा-पाठ आदि करना निषेध होता है. गुरु मंत्र  का जाप, किसी मंत्र की सिद्धी, रामायण, सूंदर कांड का पाठ, तंत्र सिद्धि ग्रहण काल में कर सकते हैं. ग्रहण के बाद पवित्र नदियों में स्नान, शुद्धिकरण करके दान देना चाहिए. इस समय में गर्भवती स्त्रियों को घर से बाहर नही निकलना चाहिए. ग्रहण काल में सूर्य से पराबैंगनी किरणे निकलती हैं, जो गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक होती हैं।

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आज घर के बाहर दीप जलाए, चरण धुली से तिलक करें, गोपाष्टमी विशेष

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क्या होती है गोपाष्टमी:-
कार्तिक शुक्ल अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ कहते हैं | यह गौ-पूजन का विशेष पर्व हैं |इस दिन भगवान कृष्ण ने गौ को चराने का कार्य शुरू किया था।

क्या करना चाहिये:-
इस दिन प्रात:काल गायों को स्नान कराके गंध-पुष्पादि से उनका पूजन किया जाता है | इस दिन गायों को गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करें और थोड़ी दूर तक उनके साथ जायें तो सब प्रकार की अभीष्ट सिद्धि होती है | सायंकाल (गौधूलि वेला) में जब गायें चरकर वापस आयें, उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पूजन करके उन्हें हरी घास, भोजन आदि खिलाएं और उनकी चरणरज (खुर के नीचे की रज यानि धूल) ललाट पर लगायें उसका तिलक करें | इससे सौभाग्य की वृद्धी होती है |


कुछ खाश जो करने से लाभ होगा:-

(1) जहाँ समूह में गायें निर्भीक रूप से रह कर समूह में विचरण करें और बैठकर श्वास ले वो जगह बहुत पवित्र और आनन्द देने वाली हो जाती है । समर्थ व्यक्ति गायों के ऐसी व्यवस्था करें अथवा जहाँ ऐसा हो उनका सहयोग करे। उस जगह की चरण रज अपने घर के मुख्य द्वार पर लाल कपड़े में बांधकर लटकाए व गौ मूत्र घर में छिड़के तो घर का वास्तु दोष दूर हो जाता है व देव कृपा आने लगती है ।
(2) रोजाना खाशकर इधर उधर गली में बीमार, कमजोर या अपंग गाय व बछड़ों को गुड़ चारा देवे अत्यधिक सर्दी में गायों को रात में गुड़ अवश्य देवें।
(3)तुम्बड़ी वाले बाबा छोटुजी कहते थे कि गोपाष्टमी को गौधूलि वेलां में घर के बाहर सुरक्षित स्थान पर दीप जलाना चाहिये,भाव ये है कि संध्या के समय घर लौटती गायों को दूर से उजाला दिखाई दे और दूसरा अर्थ दीप से गाय की पूजा है तीसरा अर्थ सबको गाय का महत्व पता चले सब घरों के बाहर दीप जले। इसके पीछे भाव ये भी है कि गौ माता हमारे जीवन उजाला करें।

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कन्याएं क्यों रखती है 3 दिन तुलसी माता का कड़ा व्रत व तारीख तिथि व जानिए इसकी पूरी विधि

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समस्त पापो को नष्ट करके विष्णुलोक की प्राप्ति कराने वाला तुलसी त्रिरात्री व्रत का उल्लेख हमारे शास्त्रों में पाया गया है। जिस प्रकार अग्नि समस्त ईंधन को दग्ध कर देती है वैसे ही इस व्रत के प्रभाव से सर्वपाप नष्ट होकर मनुष्य आवागमन से मुक्त हो जाता है। राजा युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि सत्ययुग में मुनि वशिष्ठ के निर्देशानुसार सर्वप्रथम इस व्रत को अरूंधत्ति ने किया था। इसी प्रकार देवलोक में ब्रह्मा जी के कहने पर सावित्री ओर इंद्राणी ने इस व्रत को किया था।

तुलसी शालिग्राम विवाह

कब किया जाता है तुलसी माता व्रत व इसकी तिथि

कार्तिक शुक्ल नवमीं से एकादशी तक तीन दिवस तक निराहार रहकर द्वादशी को पारणा करना चाहिए। व्रत प्रारम्भ करते समय तिथियों की ह्रास वृद्धि न हो एवं सुवा-सूतक और गुरूशुक्राष्त न हो। यह तीन दिवसीय निराहार व्रत स्त्रियां अपने सुख सौभाग्य के लिये करती है। व्रतकर्त्ता स्त्री रजस्वला न हो ऐसे समय व्रत शुरू करना श्रेष्ठ होता है। इस व्रत को तीन साल तक या तीन वार करने का विधान है। कुँवारी लड़कियां अच्छे पति व सौभाग्य के लिये इस व्रत को प्रारम्भ कर सकती है परंतु उद्यापन विवाह उपरांत ही करना चाहिए।
इस बार तुलसी व्रत 6 से 8 नवंबर तथा पारणा 9 नवंबर को प्रातः होगा। (2019)

इस व्रत में निराहार रहते हुवे तीन दिनों तक तुलसी का पूजन भगवान दामोदर (शालिग्राम) के साथ करना चाहिए। नियमतंत्र के अनुसार इस व्रत के करने से भगवान की प्रसन्नता के साथ सुख व संतान की सिद्धि एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

तीन बाट का तुलसी माता अखंड दीप

लोकाचार के अनुसार नवमीं और दशमी का दिन ठीक से व्यतीत हो जाये तो दशमी के दिन सायंकाल को व्रतबंधन करके अखण्डदीप स्थापित करना चाहिए। घी और तेल के 2 पृथक-पृथक दीपक मौली और सुत मिलाकर तीन तार की बत्ती ( बाट ) बनाकर प्रज्वलित करना चाहिए। तीन तार की बत्ती ( बाट ) में एक तार स्वयं का दूसरा पति के निमित और तीसरी भगवान के लिए होती है। नीम की डंडी में बत्ती ( बाट ) लपेटी जाती है, नीम की डंडी पर लपेटने से निरोग्यता के साथ व्रत का सामर्थ्य बना रहता है। आजकल दीप में लोहे की मोटी कील डाली जाती है, कील डालने का रहस्य यह है कि कील के गर्म रहने से घी भी गर्म रहता है।

तुलसी चरणामृत से व्रत खोलना

प्रत्येक दिन तुलसी पूजन के साथ कथा श्रवण करना चाहिये। उपाहन ( जूता-चपल ) त्याग करना और रात्रि में भूमि पर कम्बल बिछाकर शयन करना। द्वादशी के दिन सर्वप्रथम अपने गुरु अथवा ब्राह्मण को प्रातःकाल घर बुलाकर पैर धोकर तथा भोजन कराकर वस्त्र दक्षिणा आदि से संतुष्ट करना। फिर तुलसी सहित भगवान के चरणामृत से व्रत खोलना चाहिए। अतः तीन दिनों तक व्रत के रहते जल पीते समय तुलसी भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए इससे व्रत खण्डित होता है।

विवाह के पश्चात उद्यापन

व्रती के परिवार जन दशमी के दिन दीपदर्शन करके व्रती को दश्यों के रुपये देते है। दशमी के दिन ही गुड़ , गेहूँ और घी का दान संकल्प करके इन वस्तुओं को अखण्ड दीपक के पास रख देना चाहिए तथा व्रत पूर्ण होने पर दक्षिणा सहित दान करना चाहिए। विवाह उपरांत उद्यापन के समय तुलसी विवाह पूर्वक इस व्रत का विधि विधान से उद्यापन करना चाहिए।

पं अशोक कुमार ओझा(राजा)
ज्योतिषाचार्य एवं पंचागकर्ता

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धनतेरस के दिन झाड़ू क्यों खरीदतें है क्या है महत्व

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धनतेरस के दिन लोग सोने चांदी के गहने और बर्तन खरीदते हैं, लेकिन इस दिन झाड़ू खरीदने की परंपरा भी काफी लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता है कि इस दिन झाडू की खरीददारी करने से घर में सुख, शांति और संपन्नता बनी रहती है। मत्स्य पुराण में, झाडू को मां लक्ष्मी का ही रूप माना गया है। ये भी माना जाता है कि झाडू खरीदने से घर से गरीबी जाती है और ऋण से भी मुक्ति मिलती है।

धनतेरस के दिन झाडू खरीदने का क्या है महत्व

धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदा जाता है। मान्यता है कि इस दिन झाड़ू खरीदने से गरीबी दूर होती है साथ ही नई झाड़ू से नकारात्मक ऊर्जा दूर जाती है और घर में लक्ष्मी का वास होता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदकर अपने घर में लाना चाहिए। इससे पैसों की तंगी को दूर किया जा सकता है। शास्त्रों में इसे माता लक्ष्मी का प्रतिरूप माना जाता है। हालांकि धनतेरस पर झाड़ू खरीदने के कुछ नियमों का भी पालन करना चाहिए। इन नियमों के प्रति लापरवाही बरतने से देवी लक्ष्मी नाराज भी हो सकती है।

ताकि घर से न रूठें मां लक्ष्मी

धनतेरस पर अगर झाड़ू खरीदें तो झाड़ू को पकड़ने की जगह पर सफेद रंग का धागा बांध दें. ऐसा करने से देवी लक्ष्मी घर में स्थिर रहती हैं. साथ ही ध्यान रहे कि झाड़ू पर पैर न मारा जाए. कहा जाता है कि झाड़ू पर पैर मारने से देवी लक्ष्मी नाराज हो सकती है. वहीं झाडू मंगलवार, शनिवार और रविवार को खरीदने से बचना चाहिए. इन दिनों में झाड़ू खरीदने से घर में कलह का माहौल हो जाता है।

धनतेरस पर तीन झाड़ू खरीदें:

अगर हो सके तो धनतेरस पर तीन झाड़ू खरीदें. तीन झाड़ू साथ में खरीदना शुभ माना जाता है. दो या चार के जोड़े में झाड़ू की खरीद न करें. वहीं धनतेरस पर खरीदी गई झाड़ू को दिवाली के दिन सूर्योदय से पहले मंदिर में दान करने से घर में लक्ष्मी आती है। मंदिर में झाड़ू दान दिवाली के दिन मंदिर में झाड़ू दान करने से घर में लक्ष्मी का निवास होता है। ऐसा तभी होता है जब आप झाड़ू को मंदिर में सूर्योदय से पहले दान करते हैं। ध्यान रखें दान किया जाने वाला झाड़ू धनतेरस के दिन के पहले से खरीदना होगा।  

विज्ञान सम्मत और आज के जीवन में व्यावहारिक है हमारी धर्म संस्कृति मान्यताएं

ध्यान रहे कि हमारा धर्म संस्कृति विज्ञान सम्मत है साथ ही यह आज के जीवन में व्यावहारिक भी। इन दिनों साफ सफाई का विशेष महत्व है और झाड़ू से ही साफ सफाई की जाती है जिससे गंदगी को बाहर फेंका जाता है इससे घर की दरिद्रता नकारात्मकता माना गया है साफ सफाई के दौरान बीमारी फैलाने वाली गंदगी मच्छरों की भी सफाई हो जाती है इसलिए झाड़ू का सदुपयोग हमारे जीवन में विशेष महत्व रखता है और आम दिनों में भी यह उपयोगी रहता है साथ ही ऐसी चीज जो कि हमारे दैनिक जीवन में सहायक है उसका महत्व बढ़ जाता है इसलिए धनतेरस के दिन इसका महत्व बताया गया है।

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कैसे पड़ा कोडमदेसर भैरव नाम, जानिए भैरव के चमत्कार

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बीकानेर में स्थित कोडमदेसर भैरव के बारे में इस वीडियो में पूरी डिटेल में जानिए कि कोडमदेसर नाम कैसे पड़ा राव बीकाजी का इस गांव से क्या संबंध है इस मंदिर की स्थापना कैसे हुई और क्यों आज भी इस मंदिर पर छत का निर्माण नहीं किया जाता तथा मंदिर की स्थापना के बाद कौन-कौन से चमत्कार हुए हैं यह सभी जानकारी आपको इस वीडियो में पूरी डिटेल में मिलेगी।

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