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गणगौर माता की आरती

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गवरजा माता की आरती
( तर्ज – सांवरसा गिरधारी
)

आंगणियों हरखाओ , बधावो रामा , आंगणियों हरखायो , माँ गवरजा पधारी , माता गिरिजा पधारी . देखो शैलजा पधारी , हरख मनावो ढम – ढम ढोल नगाड़ा बाजे , आभो गरजे बिजळी नाचे , ओ कुण शंख बजावे , बधावो रामा , ओकण शंख बजावे । माँ गवरजा । । 1 । ।

रुण – झुण , रुण – झुण पायल बाजे , सात सुरों में मनड़ो गावे , सुण – सुण मन हरसायो , बधावो रामा , सुण – सूण मन हरसायो । माँगवरजा । । 2 । ।

गळी – गळी में घुड़लो घूमे , लोग लुगायां टाबर झूमे । सुरंगो सुख छायो , बधावो रामा , सुरंगो सुख छायो । माँ गवरजा । । 3 । ।

तीज चौथ सुहावणी आई , सागे प्यार मोकळो लाई इमरत ही ढळकायो , बधावो रामा , इमरत ही ढळकायो । माँ गवरजा । । 4 । ।

कवारी तो संदर वर पावे , परणी रो स्वाग अमर हो जावे . ज्यों पूजे फळ पावे , बधावो रामा , ज्यों पूजे फळ पावे । माँ गवरजा । । 5 । ।

माँ गवरजा ने शीश नवावो , जी भर कर आशीष थे पावो दिन पजण रो आयो . बधावो रामा , दिन पूजण रो आयो । माँ गवरजा । । 6 । ।

आंगणियों हरखायो , हे आनन्द छायो , हे दर्शन पायो , हे सुख बरसायो , हे मन हरसायो , हे वंदन गाऽऽयो । माँ गवरजा । । 7 । ।

गणगौर की आरती (2)

थे म्हारा ईशरदस जी गवरा बाई ने भेजो मै करों गवरजा री आरती
इये आरती में लिलोड़ा नारियल मै रुपया घाला देड सौ..
(इस आरती में सभी अपने अपने पति का नाम लेकर आगे गावे)

Gangaur mata aarti

Gangaur mata aarti

धीना गवर माता की आरती

पहली आरती पहली आरती करुं कसार करुं कसार धीना गवरल लेकर
पूज सब परिवार मांगै ए म्हारी रलियों तू चारो चम्पा कलियों
सिंगासर गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

दूजी आरती दूजी आरती चाढूं पापड़ बड़ी चाढूं पाप बड़ी राज करूं
महलों में खड़ी मांगौ ए म्हारी रलियों तू चारो चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

तीजी आरती तीजी आरती चादूं पूड़ा चादं पूड़ा धीना गवरल लेकर
पूजू भर भर बायां चूड़ो मांगौ ए म्हारी रलियों तू चारों चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

चौथी आरती चौथी आरती चादूं धूप चादूं धूप धीना गवरल लेकर
पूजू रूप पूजू रूप मांगो ए म्हारी रलियों तू चारों चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

पाचवी आरती पाचवी आरती चादूं सूत चादूं सूत धीना गवरल लेकर
पूजू पूत पूजू पूत मांगौ ए म्हारी रलियों तू चारों चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

छटी आरती छटी आरती चांदू मेंहदी मोली चांदू मेंहदी मोली भाई
भतीजों री अबछल जोड़ी मांगौ ए म्हारी रलियों तू चारों चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथो ।

सातवीं आरती सातवीं आरती चांदू फूल चांदू फूल धीना गवरल कर दो संकट दूर
गवरा माता कर दो संकट दूर मांगौ ए म्हारी रलियों तू चारों चम्पा कलियों
सिंगासन गवरल साझे तू दे गवरल रे हाथे ।

Dhinga gavar mata panthwadi mata

Dhinga gangaur ki kahani panthwadi mata ki puja

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धींगा गवर और पंथवाडी माता की कथा व कहानियां

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धींगा गवरजा की कहानी
( मोम की गुडीया )

कैलाश पर्वत पर शिव – पार्वती बैठा था चैत्र माह शुरु होते ही ” गवरजा ” रा ” बालीकाओं कन्याओं ” द्वारा पूजण शुरु हो गया । पार्वती शिवजी सू बोली कि मैं भी म्हारे पिहर जावणो चाहू , आप हुकम करो तो ।
महादेव जी बोल्या , म्हारी भांग घोटण री व्यवस्था कूण करसी जने पार्वती व्यवस्था रे रूप में एक मोम री गुडिया बनाई और आपरी शक्ति सू उसमें जीव डाल दिया , बा चेतन हो गई पार्वती बे गुडिया ने बतायो कि मैं म्हारे पीहर सू वापिस नहीं आऊ जने तक पन्द्रह दिन , शिवजी ने भांग घोट र देनी है । आ बात शिवजी भी मान र पार्वती ने पीहर जाने री आज्ञा दे दी ।

पार्वती री बनाई मोम री गुडिया , सदैव शिवजी री भांग घोट – घोट समय पर देने लाग गई साथ – साथ में भोलो शंकर सू प्रेम – स्नेह राखण लाग गई । जद पार्वती पन्द्रह दिन बाद पीहर सूं वापिस आई तब बे गुडिया रो शंकर सू स्नेह देख गुस्से हुयगी और बेने उठार घर सू बाहर कचरे में फेंक दी । जद शिवजी समाधि सूं उठीया तो पार्वती सू पूछीयो कि बा गुडिया कठे गई तो पार्वती बोली कि म्हारी अनुपस्थति में थोने भांग घोट र देते देते बा थोसू प्रेम – स्नेह राखण लाग गी तो मैं बेने कचरे में फेक दी । शिवजी बोलीया मैं बेरी सेवा सू प्रसन्न हूँ , बेने कचरे में नहीं फेकनों थो जने पार्वती वापिस गुडिया ने लेणे गई । तब बा गुडिया आई नहीं बोली म्हारा अपमान हो गयो । तब शिव – पार्वती दोनू बोलिया कि थोने थारे मान सम्मान रो स्थान देसो के थां पार्वती री अनुपस्थति में भांग घोटी है , पन्द्रह दिन बाद थोरो ही पूजन गवरजा रे रूप में धीगोणे ही जबरदस्ती ( गवरजा रा पूजन ) हूंसी थोरी स्थापना भी उपर थापन होसी और पूजन री मान्यता , “गवर पूजन” रूप में होसी । उस दिन से पूजन धींगा गवर रूप में हुवन लागयो।

Dhinga gavar mata panthwadi mata

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धींगा गवर कथा
कोकड़ – मोकड़ ( चतुर्थी से दशम् तक )

एक दिन कुम्हार की खाई में आग लग गई । कुम्हार की दोनों बेटियां जलकर मर गई और फिर दोनों ने राजा के घर जन्म लिया । जिस प्रकार तिल और जौ बढ़ता है , उसी प्रकार वे दोनों बहिनें भी बड़ी हो गई तथा राजा ने एक बेटी को देश राजा के यहां शादी की तथा दूसरी बेटी का भाट राजा के यहां ब्याही । देश राजा वाली बेटी के बचे होते और मर जाते और भाट राजा वाली के बच्चे जीवित रहते । इसी प्रकार कई दिन गुजरते गये तब देश राजा वाली रानी ने कहा कि देखो मेरे बच्चे तो मर जाते है , लेकिन मेरी बहिन के बच्चे जीवित रहते हैं । वह जलने लगी तथा उसने अपनी बहन में घात डालने की सोची और तब उसने अपने नौकरों को पहले गूंदगीरि के लड्डू बनाकर उसमें कीड़े – मकोड़े , बिच्छू इत्यादि डालकर उनसे कहा कि जाओ नौकरों इसे मेरी बहिन के यहां दे आओ तथा कहना कि तुम्हारी बहिन ने सम्भाल भेजी है । तब नौकर उसे भाट राजा के यहां दे आये तथा कहा कि इसे आपकी बहिन ने भेजी है तो उसने कहा कि अभी तो मैं अपनी धींगा गवर माता की पूजा कर रही हूँ आप इसे रख दो । नौकर उसे रखकर चले गये । तभी बाहर से बच्चे खेलते – खेलते आये और बोले कि मां – मां भूख लगी है तो उनकी मां ने कहा कि भूख – भूख क्या करते हो । मौसी ने सम्भाल भेजी है जाकर खा लो। बच्चे जाकर गूंदगीरी के लड्डू तोड़ते है तो उसमें से हीरे – पन्ने माणक मोती दड़ा – दडी आदि बन जाते हैं तो बच्चे कहते हैं कि मां – मां देखो यह क्या है तो उनकी मां कहती है धन वाली मौसी है मिसा – मिसा कर धन भेजा है ।

दूसरे दिन देश राजा वाली रानी नौकरों से कहती है कि जाओ और देख के आओ मेरी बहिन के बच्चे जिये की मरे तब नौकर बच्चों को देखकर रानी से कहते है कि आपके भानजा भानजी या तो इतने कंगले और मैले – कुचले तथा बदसूरत दिखते हैं या आज इतने सुन्दर दिखाई दे रहे है । अगले दिन रानी ने एक घड़े में कलन्दर नाग को मारकर उसमें दूध भरकर नौकरों को दिया औ कहा कि जाओ नौकरों इसे मेरी बहिन के यहां दे आओ । तब नौकर उस दूध के घड़े को लेकर भाट राजा के यहां गये तथा कहा कि रानीजी ने यह आपके लिए भेजा है तब भाट राजा की रानी कहा कि इसे अभी तो रख दो मैं अपनी धींगा गवर माता की पूजा कर रही हूँ । तभी बाहर से बच्चे आये और कहा कि मां – मां भूख लगी है तो मां ने कहा कि भूख – भूख क्या कर रहे हो , मौसी ने दूध भेजा है , जाकर पीलो । तब बच्चो ने घड़े को खोला तो देखते है कि उसमें नौ सौ का हार रखा है । तब बच्चे मां को कहते है कि मां – मां यह क्या है तो मां बोली धन वाली मौसी है । थोड़ा – थोड़ा करके धन भेजी है , कहकर उसने उस हार को कच्चे दूध से धोकर धींगा गवर माता के अर्पण करके पहन लिया । दूसरे दिन देश राजा वाली ने अपने नौकरों से कहा कि जाओ और देख के आओ कि मेरी बहिन के बचे जिये या मरें तब नौकर भाट राजा के यहां जाते हैं और देखते है कि बच्चे तो पहले से भी ज्यादा सुन्दर दिखाई दे रहे है तथा जो हार भाट राजा वाली रानी ने पहन रखा है वो तो रानीजी गले में सोवे तभी वे दौड़ते – दौड़ते महल में जाते हैं और कहते हैं कि रानीजी – रानीजी आपकी बहिन के गले ऐसा हार पहन रखा है जो आपके गले में सोवे । ऐसा सुनकर रानी तिलमिला उठती है और कोप भवन में जाकर सो जाती है तभी राजा आते हैं और कहते हैं कि रानीजी बात क्या है ? आपने आज थाल क्यों नहीं अरोगा तथा इस तरह कोप भवन में आप क्या कर रही है , तब रानी बोलती है , मैं तभी थाल अरोगूगी जब आप भी मेरी बहिन के जैसा हार बनवा कर देंगे । तब राजा कहते हैं कि आपकी बहिन ने तो उसे दिन में गड़ाया होगा लेकिन मैं आपके लिये देश – देश के सुनार बुलाकर गड़वाऊंगा । ऐसा कहकर राजा देश – देश के सुनार कर उस हार जैसा गढ़ने को कहते हैं । जैसे – जैसे सुनार उस हार का नाका जोड़ते है , वैसे वैसे वह खुलता जाता है तब सुनार कहते हैं कि राजाजी यह तो किसी मानवीयों के हाथ का नहीं है यह तो देवताओं के हाथ का गड़ा हुआ हार है ऐसा कहकर वे वहां से चले जाते हैं । जब हार वाली बात रानी जी के बहिन को पता चलती है तो वह महल में दौड़ी – दौड़ी आती है और कहती है कि बहिन तू जीजाजी को क्यों परेशान कर रही है , यह तो तेरा ही भेजा हुआ है । ले इसे तू वापस पहन ले , ऐसा कहकर जैसे ही वह हार रानी के गले में जाता है । वह फट से कलन्दर नाग बन जाती है । तभी रानीजी अपनी बहिन से कहती है कि ऐ ठाली भुली पहले तो मेरे बच्चों को खाया और अब मुझे खाने आयी है । मैं तेरा बच्चा – बच्चा घाणी में मिला दूंगी ।

इस प्रकार एक बार फिर देश राजा वाली रानी के मरा हुआ लड़का होता है । तब वह नौकरों से कहती हैं जाओ रे नौकरों मेरी बहिन को बधाई दे आओ कि आपके जिवणा – जागणा भानजा हुआ है । नौकर भाट राजा के यहां बधाई देने जाते हैं तब रानी कहती है कि अभी तो मैं अपनी धींगा गवर माता की पूजा कर रही हूँ बाद में आऊंगी । धींगा गवर की पूजा करके रानी दौड़ी – दौड़ी देश राजा के यहां जाती है तभी जंगल में बहनोई मिलता है वह उसे बधाई देती है तो वह राजा कहता है कि मरे हुए बेटे की काहे की बधाई लेकिन वह तो बात को सुनी – अनसुनी करके दौड़ती – दौड़ती महल में बहिन को बधाई देती है तो बहिन – बहिन से कहती है आ बहिन पीढ़े माथे पैठ , जैस ही बहिन उस पीढ़े पर बैठती है और उसके घाघरे का स्पर्श छूते ही बच्चा रोने लगता है तब बहिन – बहिन के पैर छूती है और कहती है कि ऐ बहिन तू ऐसा क्या जादू टोना जानती है कि तेरे छूते ही मेरा मरा हुआ बच्चा जी उठा तय भाट राजा वाली रानी कहती है कि मैं कोई जादू टोना नहीं जानती । मेरे तो एक ही ईष्ट है धींगा गवर माता का आज उसी के कारण तेरा बच्चा जीवित हो उठा तथा मेरे मान की भी उसने रक्षा की तब देश राजा बाली रानी कहती है कि ये कब और कैसे पूजी जाती है तो भाट राजा वाली रानी कहती है कि चैत उतरती तीज को बाली गवर उठती है और धींगा गवर पूजनी शुरू होती है तो वह बहिन को कहती है कि इस बार जब धींगा गवर माता को पूजे तो मैं भी तेरे साथ पूंजूगी । बारह महीनों के बाद जब बाली गवर उठती है तथा धींगा गवर शुरू होती है तब देश राजा वाली रानी गवर माता अपनी बहिन के यहां पूजने जाती है । इस तरह 15 दिन गवर पूजन के बाद भाट राजा वाली बहिन को कहती है कि कल हमारी गवर माता पूरी होगी । इसलिए तू कल सिर धो लेना तथा जीजाजी और भानजे सहित यहां आकर पूजा करना । यही भोजन कर लेना ऐसा सुनकर बहिन अपने महल आती है और सारी बात राजा को कहती है तब राजा कहता है कि कल अकेला मैं नहीं मेरी पूरी नगरी गाजे – बाजे के साथ आपकी बहन के यहां गवर पूजने जायेगी । तब अगले दिन सारी नगरी सहित जब भाट राजा के यहां जाने के लिये रवाना होता है , तभी रानी के मन में विचार आता है कि मैं देश की तो धणीयाणी हूं , सेर सोने भार मरू , काले डोरे लाज मरू आज देश राजा रे अठै ब्याही ( शादी ) हुई हूं । भाट राजा रे अठे गवर पूजने जाऊं ऐसा विचार आते ही कुंवर त्रास खाकर गिर जाता है और बेहोश हो जाता है तब राजा रानी से कहता है कि आपने ऐसा क्या सोचा कि मेरा कुंवर बेहोश हो गया तब रानी ने कहा कि मैंने और तो कुछ नहीं विचार किया लेकिन मेरे मन में यह जरूर विचार आया कि देश की धणीयाणी सेर सोने भार मरू , काले डोरे लाज मरू देश राजा रे व्याही भाट राजा रे अठे गवर पूजने जाऊं । तब राजा रानी से कहता है कि रानीजी मुसीबत में तो हिन्दू से मुस्लमान बन जाते हैं तथा मुस्लमान से हिन्दू फिर आप तो अपनी बहिन के यहां पजने ही तो जा रही हो । आप गुनहगारी का प्रसाद बोलो जैसे ही रानी ने गुनहगारी का प्रसाद बोला कुंवर उठ खड़ा हुआ तथा फिर धुमधाम से गवर माता की पूजा की और उजमन किया तथा सारी नगरी ने प्रसाद लिया ।
इस तरह धींगा गवर माता ने अपनी भक्त के विश्वास और मान की रक्षा की ।
बोलो धींगा गवर माता की जय । ।

 

कथा गणगौर
( ग्यारस से पूर्णाहुति तक )

एक साहूकार था । उसके चार बेटे और एक बेटी थी । उसके यहां एक साधु रोज भिक्षा मांगने आता । जब साहकार के बेटे की बहू भिक्षा डालती तो वह साधु कहता “ रातों चुड़लो , राती टीकी , रातो भेष लेकिन जब उसकी बेटी भिक्षा डालती तो वह उसे धोळी टीकी , धोळो चुड़लो , धोळो भेष ” कहता यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा तो एक दिन साहूकार की बेटी ने अपनी मां से साधु के आशीर्वाद देने वाली बात कही , तब साहूकार की पत्नी ने कहा कि कल बात उस साधू की अगले दिन जब उसकी बहु ने साधु को भिक्षा डाली तब उसने बहुत को आशीर्वाद के रूप में उसे रातो चुड़लो , राती टीकी और रातों भेष कहा और जब उसकी बेटी ने भिक्षा डाली तब उसने बेटी को आशीर्वाद के रूप में धोळी टीकी , धोळो चुड़लो और धोळो भेष कहा यह सब साहूकार की पत्नी ने देखा और साधु से कहा कि आप इस तरह से मेरी बेटी और बहु को अलग – अलग आशीर्वाद क्यों देते हो तो साधु ने कहा कि हम साधु महात्मा फकड़ आदमी है । ऐसे ही बोल दिया तो साहूकार की पत्नी ने कहा कि नहीं जो भी बात है , मुझे बताइये । बहुत कहने पर साधु ने उसे कहा कि तुम्हारें बेटी के चौथा फेरा होता ही विधवा होना लिखा है । तब साहूकार की पत्नी ने कहा कि इसका क्या उपाय है ? तब साधु ने कहा कि जो भी खुलते दरवाजे तुम्हें मिले उसे तुम पहले अपनी बेटी से फेरे दिलवा देना उसके बाद जो वर तुम्हारे खोजा गया है , उससे उसकी शादी करवा देना । साहूकार की पत्नी ने अगले दिन नौकरों से कहा कि जो भी तुम्हें खुलते दरवाजे मिले उसे ले आना । अगले दिन नौकर खुलते दरवाजे जाते है तो उन्हें फदक – फुदक करती सिला आती हुई दिखाई देती है तो नौकर कहते हैं कि नहीं बेचारी साहूकार की बेटी को सिला नीचे तो नहीं मारेंगे । वो ऐसा सोचकर वापस आ जाते हैं और कहते हैं कि उन्हें तो कुछ नहीं मिला । अब अगले दिन भी सिला आता है तो वह फिर वापस आ जाते हैं । इस तरह तीन – चार दिन तक यह क्रम चलता जाता है तो साहूकार की पत्नी कहती है , तुम्हें जो भी पत्थर कंकड़ मिल चाहे जो कुछ भी हो ले आना । बाई ने एकबार फेरा दिलवा कर वापिस उसे खोजे गये व फेरा दिलवाना है तो अगले दिन नौकर फिर जाते हैं तो वही फुदक – फुदक करती सिला आती है तो वे सोचते हैं कि साहूकार की बेटी की यही लिखा हुआ है तो हम क्या करें ? चौथे लोक . . . . . यह कहकर वे सिला को घर ले आते हैं तथा बाई का उस सिला से फेरे दिलवा देते हैं जैसे ही तीन फेरे पूरे होने के बाद चौथा फेरा खाते हैं तो उस सिला के दो टुकड़े हो जाते हैं तब साहूकार की पत्नी नौकरों से कहती है । इस सिला के टुकड़ों को फेंक दो । जैसे ही वह उस सिला को उठाते हैं तो साहूकार की बेटी हठ करके बैठ जाती है कि वह अब दूसरी शादी नहीं करेगी और जिससे उसने फेरे खाये है । वह उसी के साथ जंगल में झोंपड़ी बनाकर रहेगी । उसके मां – बाप उसे बहुत समझाते हैं लेकिन वह नहीं मानती । अन्त में वे हारकर जंगल में झोपड़ी बनाकर उसे रहने देते हैं । रोज उसकी भोजाई दोनों समय खाना पहुंचा देती है । इस तरह कई महीने बीतते गये एक दिन उसे जंगल में कुछ आवाज सुनने को मिलती है । वह बाहर आकर देखती है तो कुछ परियां वहां आयी हुई है तो वह उनके पास जाकर पूछती है कि तुम कौन हों ? और यहां क्या कर रही हो ? तब उन्होंने कहा कि हम इन्द्रलोक की परियां है । इन्द्रलोक में गवर पूजकर मृत्युलोक में पंथीवाड़ी माता को पूजने आये है तो वह पूछती है कि इससे क्या होता है तो परियां कहती हैं कि इससे अन्न , धन , लाज , लक्ष्मी इत्यादि आती मिलती है । तब वह कहती है कि मुझे और तो कुछ नहीं चाहिये लेकिन मेरे पति मुझे मिल जाए तो मैं भी गवर पूज लूं तब परियां उससे कहती है कि तुम्हारे साथ कैसे पूजेगी , तभी उनमें से एक परी बोली कि ऐसा करो कि तुम रोज अपने झोपड़ी में एक बिन्दी लगा लेना जब हम पीवाड़ी पूजने आयेंगे तब तुझे आवाज लगा देंगे । अगले दिन से साहूकार की बेटी ने अपने झोपड़ी में एक टीकी लगाकर पूजा की तभी बाहर से आवाज आई साहूकार की बेटी आ जा पंथीवाड़ी माता री पूजा कर ले । यही क्रम 45 दिनों तक चलता रहा 15वें दिन उन परियों ने उससे कहा कि कल तुम सिर धो लेना व्रत रखना , रोटा बनाना , फोगले का रायता यह कहकर वह वहां से चली गयी । रात को जब उसकी भोजाई रोटी लेकर आयी तो उसने कहा कि भाभीजी कल मेरे लिये रोटा बनाकर लाना , मेरे धीना गवर माता की पूजा और व्रत है ।

तब भोजाई ने कहा कि अब जंगल में बैठी ने रोटी जगह रोटा चाहिये । मैं कल रसोई बनाकर ही नहीं लाऊंगी मुंह बिचकाकर वह वहां से चली जाती है । अगले दिन वह हाथ – पैर मोड़ती है । वह बाहर जाती है तो वह देखती है कि वहां गेर गंभीर खेजड़े का पेड़ अपने आप उग गया है तो वहां से खेजड़े के पत्तों को तोड़कर पीसकर रोटे का आकार देकर उसके ऊपर कंकड़ पत्थर रखकर ढक देती है तभी आवाज आती है कि साहूकार की बेटी बाहर आकर पंथीवाड़ी पूज लो वह अन्दर टीकी लागकर बाहर पूजा करके वापिस अपने झोंपड़े में आ जाती है । वह जब ढक्कर हटाती है तो वह देखती है कि पत्तों का जो रोटा था वह परमल गेहूं का रोटा बन गया । उसके ऊपर फोगले का रायता और कंकड़ पत्थर बूरा – खाण्ड बन गयी तब उसने कहा कि धीना गवर माता ने इतना कुछ दिया है तो मुझे सुहाग भी देगी । तभी बाहर से तीन बार आवाज आती है कि साहूकार की बेटी बाहर दो नदियां बह रही है एक लाज – लोई की दूसरी केसर – कुंकु की । सिला के टुकड़ों को ले जाकर उसने उसे पहले लाज – लोई की नदी और फिर केसर कुंकु में नहलाया । तभी उसने देखा कि वह सिला के दो टुकड़े एक युवक के रूप में खड़ा है तो उसने उससे पूछा कि तुम कौन हो तो उसने कहा कि मैं तुम्हारा पति हूं तो वह उसे अपनी पति स्वीकार नहीं करती लेकिन जब वह उसे पत्थर की निशानी बताती है तो वह उसे स्वीकार कर लेती है । उधर झोपड़ी की जगह महल , नौकर – चाकर , खूब हीरा – मोती , माणक गवर माता की कृपा से आ जाते है । सुबह जब भाभी रोटी लेकर आती है तो झोपड़ी की जगह महल और किसी पर पुरुष के साथ अपनी ननद को देखती है तो दौड़ती – दौड़ती अपनी सास के पास जाती है और कहती है कि आप कहते हो कि मेरी बेटी सती है , लेकिन आपकी बेटी तो किसी अन्य पुरुष के साथ रह रही है तब मां – बाप , भाई – भाभी दौड़ते – दौड़ते आते हैं और कहते हैं कि यह तूने क्या किया ? तूने तो हमारे कूल को दाग लगा दिया तो साहूकार की बेटी ने कहा कि मैंने आपके कूल को दाग नहीं लगाया । मुझे तो यह सब धींगा गवर माता की कृपा से मिला है । वह मां कहती है कि पर पुरुष तो रातों रात ही आ जाता लेकिन यह झोपड़े की जगह महल , नौकर – चाकर यह सब तो नहीं आते । अगर आपको विश्वास नहीं है तो आप अपनी जंवाई के पत्थर की निशानी देख लीजिये । जब वे वह निशानी देखते हैं तो उन्हें विश्वास हो जाता है और वे फिर उन दोनों को खूब गाजे – बाजे से अपने घर ले जाते हैं ।
हे धींगा गवर माता जिस प्रकार साहूकार की बेटी पर तेरी कृपा बनी रही , उसी प्रकार हर इंसान पर तेरी कृपा बनी रहें ।
धींगा गवर माता की जय ।

पंथीवाड़ी माता की कहानी

एक साहूकार थो बिरे कोई भी नियम कोनी थो । बो खावतो – पिवतो और सो जातो । एक दिन साहूकार री पत्नी साहूकार सू बोली थे कुछ तो नियम करो और नहीं तो पंथीवाडी माता रे ही पाणी सींच आया करो और कह दिया करो कि देखीं – देखीं शहरी लोगो देखी ।

साहूकार रोज पाणी सींच आवतो और कह देतो कि देखीं – देखीं शहरी लोगों देखी ।

चार चोर चोरी कर आया और आप – आपरी हिस्सा पाँती कर रहया था बे समय साहूकार पंथीवाडी माता रे पाणी सींच आयो और चोरो ने देख बोल्यों देखीं – देखीं शहरी लोगो देखी । चोर बोल्या पांचवी पाँती थे लेलो । साहुकार चोरों की सुणी कोयनी और दौड़तो – दौड़तो घर आयग्यों साहूकार आपरी बहू ने केयो –
तू केयो कुछ तो नियम करो म्हारे लारे तो बाढ़ आई है । साहूकार री बहू केयो थे घर में बैठो मै बात करू इत्ते में चार चोर भी आयग्या ।साहूकारनी बोली क्या बात है चोर बोल्या मैं चोरी कर सामान लायो हो और साहूकार बोल्यो की ‘देखीं – देखीं शहरी लोगो देखी’ मै बोल्या पाँचवीं पाँती थोरी । साहूकारनी बोली पाँचवी पाँती लेवा कोयनी पूरी लेसां नहीं तो राज में चूगळी कर देस्यू। चोर बोल्या कोई बात कोनी पूरी लेलो । मैं तो फर चोरी कर लेसो। साहूकार केयो इत्ते धन रो क्या करसो । चोर बोल्या मैं कुंवारी कन्या ने परणासो, पंथीवाडी माता रो अजुणो करासो, धन री कमी वाळो ने धन देसो ।
हे पंथीवाडी माता ज्यों साहूकार ने दियो तूं सगळो ने ही दिये ।

गणगौर के गीत

गणगौर उत्सव में गाए जाने वाले गीत

Gangaur ke geet

Dophar me gaye jane wale gangaur ke geet

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विषम स्थितियों में कैसे करे माता की पूजा

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कैसे करें की माता प्रसन्न भी हो

पूरा विश्व कोराना की महामारी से त्रस्त है और भारत भी इस संकट के दौर से गुजर रहा है । चारों और लॉकडाउन है घरों में लोग सिमिट रहे है,बाज़ार जाना सम्भव नहीं या दुकानों माता की पूजन उपलब्ध नहीं ऐसे में सनातनी लोग नवरात्रा में देवी की पूजा कैसे करें यह सबके मन में चल रहा होगा। इसके लिये आप चिंता न करें शास्त्रों में स्पस्ट भी उल्लेख है देश,काल,समय और परिस्थिति के अनुरुप ही हमें हर कार्य करना चाहिये।
आप के घर माता की चुनरी नहीं है तो लाल ब्लाउज पीस या लाल केशरिया वस्त्र ओढ़ा सकते है अगर ये नहीं तो मोली ही काफी है अगर ये भी नहीं हो तो लाल रेशमी केशरिया कोई भी धागा हो तो वो भी चढ़ा सकते है।
प्रशाद मिठाई अभी नहीं मिल सकती और मिले तो भी अभी बाहर से लाना उचित भी नहीं तो क्यों न माता के गुड़ की लापसी , हलवा, खीर, गुलकंद या सिंघाड़े का सीरा खुद घर में बनाकर चढ़ाए तो इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता अगर इनमें से कोई नहीं है तो मिश्री और मिश्री नही तो गुड़ अथवा चीनी भी चढ़ा सकते है। फल उपलब्ध न हो तो लोंग/इलायची/सुपारी इन तीनों में जो उपलब्ध हो वो चढ़ा दे।

माता के पास पालसिये में ज्वारे बोए जाते है इन परिस्थितियों में पालसिये भी नहीं ला सकें होंगे तो वो भी चिंता न करे भूमि पर या किसी भी धातु के पात्र में मिट्टी डालकर बुआई करलें।
इस प्रकार 9 दिन भोग में दूध, चीनी, घर में बनाकर शक्कर का चूरमा आदि भोग चढ़ा देवे। वैसे भी पहले बाजारों की मिठाइयां नहीं बल्कि घर में बनाई ही मिठाई चढ़ाई जाती थी । फल भी आटे व हल्दी जो घर मे उपलब्ध रहते है उसके बना सकते है ये फल शादी विवाह में भी आज भी यूज किया जाता है ।

कोई चीज जो भी लगे चढ़ानी जरूरी है और आपका मन है या जहाँ भी आप है वहाँ ऊपर बताया वो भी सम्भव नहीं है तो आप सबसे पहले स्वयं गंगा का स्मरण कर अपने आपको पवित्र कर और माता की पूजा मानसिक रूप से करें आवाह्न स्नान भोग सब मानसिक रूप से निवेदन करें, वैसे भी पूजन में सामग्री की बजाय भाव महत्वपूर्ण है।

इस संकट की घड़ी में भी सकारात्मक सोच रखे कि माता ने आपको कुछ दिन घर में रहकर ध्यान स्मरण जाप व प्रार्थना करने का अवसर दिया है। आप नियमित माता का दुर्गाशप्तष्टि का पाठ करें, किताब उपलब्ध न हो तो इंटरनेट पर है या फिर सुने या माता का नवाहण मन्त्र की 11, 21, 108 जितनी सम्भव हो करें और पूजा माला के अंत में शांति मन्त्र अथवा ‘नमः शिवाय’ की एक माला जरूर करें और अपने व देश की रक्षा करने के लिये प्राथर्ना करें।
जिनको पाठ आता है वो रोग भय शांत के लिये कल्याण के लिये ‘रोगा न शेषा…’ मन्त्र सम्पुट लगाए अथवा दुर्गाशप्ती के पीछे अथवा नेंट में ‘सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमस्तुते व ‘रोगा न…’ की एक माला प्रतिदिन जाप करें। इससे आत्मबल बढ़ेगा, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा।

अपने अपने घर में रहकर प्रशासन के नियम की पालना के साथ उक्त विधि अपनाएँ पूजन आदि सामग्री के लिये बाहर निकलने की कोई आवश्यकता नही है, देवी माँ की कृपा जरूर होगी । अगर पहले दिन पूजा नहीं कर पाए तो भी कोई नहीं ये 9 दिन में कभी भी करलें । विश्व कल्याण और इस महामारी से मुक्ति के लिए माता से प्राथना जरूर करें..

– 25 मार्च घट स्थापना मुहूर्त

सुबह – 6:27 से 9:30 बजे तक व 11 से 12:30 तक

।।जय माता दी ।।

प्रहलाद ओझा ‘भैरु’

शैलपुत्री माता की कथा वीडियो

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देखें वे गीत जो गणगौर में दोपहर के समय गाए जाते है

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गणगौर में दोपहर में गाए जाने वाले गीत –

नौरंगी गवर

म्हारी चाँद गवरजा , भलो ए नादान गवरजा रत्नों रा खम्भा दीखे दूर सू , बम्बई हालो , लाखों पर लेखण पूरब देश में , कलकते हालो , गवरयो री मोज्यों बीकानेर में गढ़न कोटां सूं उतरी सरे , हाथ कमल केरो फूल
शीश नारेळां सारियो सरे , बीणी बासक नाग रे |
| बम्बई . . . बम्बइ . . . . . (1)

चोतीणे रा चार चाकलिया , बड़ पीपल बड़ है भारी
बड़ पीपल बड़ है भारी , ईशरजी ने गवरा हद प्यारी
भंवारे भंवरो फिरे सरे , लिलवट ऑगळ चार आखड़ल्यों रतने जड्यो सरे , नाक सुआ केरी चोंच रे । ।
बम्बई . . . . . (2)

उड़ो हंस पर जाओ गिग्नार्या खबरया लाओ मेरे ईशर की
खबरयों लाओ म्हारे ईशर की , म्हारे गोठ्यो घुळ रही रेशम की
होठ परेवा रेखियो सरे , जीभ कमल केरो फूल मिसरायां चूने जड़ी सरे , दांत दाड़म केरो बीज रे । ।
बम्बई . . . . . (3) | |

चांदमल ढढे का लड़का , सूरजमल पंछी का लड़का
इये नयी हवेली में पोढ़े गवरजा , खसखस का पंखा ।
किण थोने घडी रे सिलावटेसरे , किण थाने लाल लोहार
केणे जी री डीकरी सरे , केणेजी रे घर नार रे । ।
बम्बई . . . (4)

गवरादे गोरी अलख सागर सूं भरला डोलची पातळिया ईशर पाणीड़े ने जांवती ने आवे लाजजी ।
जन्म दियो म्हारी मावड़ी सरे , रूप दियो किरतार
हेमाचली री डीकरी सरे , पातळिये ईशर घर नार रे । ।

बम्बई . . . . . (5)

नींबूतळा में दोय – दोय गवरियो अड़बी बाजा बाजसी
अड़बी बाजा बाजसी रे , सिंह ऊभा गाजसी सिंह उभा गाजसी , पंचायत ऊभी देखसी । महाराजा देसी दायजो सरे , सौ घोड़ा असवार घेर घुमाळो घाघरो सरे , ओढण दखणी रो चीर रे । ।
बम्बई . . . . . (6) । ।

चार चवन्नी चांदी की , जै बोलो महात्मा गांधी की
लाल रूमाल सिपाही का , घर घर में राज लुगाई का ।
कड़ाकंद केशर री भावे . रायतो दाख्यों रो भावे ईशर छोड़ चल्यो परदेश , गवरजा ने नींद नहीं आवे
गवरजा क्यों झुरे गैली रे . गवरजा क्यों झूरे गैली
थारो ईशर गयो परदेश , कमावण रुपियों री थैली – थैली । ।
बम्बई . . . . . (7)

पूजन दो गणगौर-

– खेलण दो गणगौर गढ़ा रा मारू , पूजण दो गणगौर।
होजी म्हाने गणगौरयों रो घणो चाव , गढ़ा रे मारू खेलन दो गणगौर।
होजी म्हारी गवरल रा दिन चार , गढ़ा रे मारु खेलन दो गणगौर ।
होजी म्हारी सहेल्या जोवे है बाट , गढ़ा रे मारू खेलन दो गणगौर।।

-भल खेलो गणगौर सुन्दरगौरी , भल पूजो गणगौर।
होजी थारी सहेल्यां रो सरब सुहाग
सुन्दर गोरी भल खेलो गणगोर ,
खेलण दो… , पूजण दो…।।

– होजी म्हारी सहेल्यां मांगे है गोठ , गढ़ा रे मारु खेलण दो गणगौर।
भल खेलो गणगोर सुंदरी गोरी , भल खेलो गणगौर।
होजी थारी सहेल्यां ने देसा , म्हे गोठ मुन्दर गोरी।
भल पूजो गणगौर , खेलण दो गणगौर गढ़ा रे मारू , पूजण दो..।।

– माथे रे मैंमद घडाव गढ़ा रे मारू , माथे रे मेंमद घडाय ।
होजी म्हारे रखड़ी री मौज लगाव , गढ़ा रे मारु खेलण दो गणगौर ।।

– हिवडे रे हार घडाय गढ़ा रे मारू , हिवडे रे हार घडाय ।
होजी म्हारे तनसुख रतन जड़ाय, गढ़ा रे मारु खेलण दो गणगौर।।

– बॉयों रे चुड़लो चिराव गढ़ा रे मारु, बॉयों रे चुड़लो चिराव।
होजी म्हारी गजरा री मौज लगाव , गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर।।

– अंग में चून्दड़ लाय गढ़ा रे मारू , जैपूर री चून्दड़ लाया।
होजी म्हारे तारो री मौज लगाय , पल्ला में सूरज छपाय गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर।।

– पगल्या में पायल घड़ाय गढ़ा रे मारू , पगयों रे पायल घड़ाय।
होजी म्हारी बिंछियाँ री मौज लगाय , गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर।।

– होजी थोने देवे लाड़णपूत , सुन्दर गोरी भल पूजा गणगौर।
होजी म्हारी सहेल्यां जोवे है बाट , गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर।।

Gangaur ke geet

Dophar me gaye jane wale gangaur ke geet

चूंदड़ी-

मिजाजी ढोला जैपुर जायजो जी , बठे सूं लायजो जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजण गोरी कुणजी लाया ओ , केणेजी ओढी जाळी री चूंदड़ी । ।

( ईशरजी ) ढोला जेठजी लाया ओ , जेठाणीजी ओढी रब्बड़ री चूंदड़ी । ।

( गवरादे ) गोरी भांत बतावो ओ , कैसी तो होवे जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजी ढोला हरा – हरा पल्ला ओ , कसुमल होवे रेशम री चूंदड़ी । ।

मिजाजण गोरी ओढ बतायो ओ , कैसी तो सोवे तारां री चूंदड़ी । ।

मिजाजी ढोला किस विध ओढूँ ओ , अठे तो म्ळारा सुसरोजी देखे । ।

मिजाजण गोरी पीहर पधारो आ , बठे तो ओढ़ो जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजी ढोला किस विध ओढूँ ओ , बठे तो म्हारा दादीजी बैठा । ।

मिजाजण गोरी महल पधारो ओ , अबे तो ओढ़ो जाली री चूंदड़ी । ।

मिजाजी ढोला महल अंधेरो ओ , कियां ओ ओढूँ जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजी ढोला गर्मी सतावे ओ , कैसे तो ओढूँ जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजण गोरी पंखा लगाय , ओ , अबे तो ओढो जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजण ढोला पैला कैयो थो ओ , नजर म्हाने थांरी जी लागी । ।

मिजाजी ढोला सांभर जायजो जी , आंवता तो लायजो राई री पूडी । ।

मिजाजी ढोला मिर्जापूर जायजो जी , बठे सूं लायजो मिर्ची री पूड़ी ।

मिजाजी ढोला निजर उतारो ओ , जदे तो ओढूँ जाळी री चूंदड़ी । ।

मिजाजण गोरी चंदा सी चमके ओ , तारों सी चमके जाळी री चूंदड़ी । ।
( मिजाजी – जंवाई , मिजाजण – बेटी का नाम गाये ) । नेग मंग )

गणगौर के सभी गीतों के लिए देखें वेबसाइट और अपडेट के लिए जुड़े रमक झमक के फेसबुक पेज से ..

गणगौर को क्यों दौड़ाकर ले जाया जाता है जाने नीचे दिए गए वीडियो में –

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गणगौर में सुबह गाए जाने वाले गीत देखें

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गणगौर सुबह के गीत –

उठी – उठी-

उठी – उठी गवर निन्दाड़ो खोल निन्दाड़ो खोल , सूरज तपे रे लिलाड़ एक पुजारी ऐ बाई म्हारी गवरजा , गवरजा , ज्यों रे घर रे टूठे म्होरी माय अन्न दे तो धन दे , बाई थरि सासरिये , पीवरिये , अन्न धन भया रे भण्डार ! डब्बा तो भरिया ए बाई थारे गैनों सु गोंठो सु, माणक मोती तपे रे लिलाड़, उठी – उठी गवर निन्दाड़ो खोल निन्दाड़ो खोल..

खोल कीवाडी-

गवर गवरादे माता खोल किवाड़ी , ऐ बाहर उभी थोने पूजन वाळी , ऐ पूजो ऐ पुजारियों बायों , आसण – कासण मोंगो , ऐ मोंगो ए म्हे , अन्न धन लाज लिछमी , ऐ कान कँवरसो बीरो मोंगों , राई सी भौजाई , ऐ राते घुड़ले बेनड़ मोंगो , सोंवळियों बेन्दोई , ऐ हाथ दे हथाली दे , ननोणे फिर आयो , ऐ जूती रे मचालके , चोवटे फिर आयो , ऐ ढोल रे ढमाके , बीरो लाडी लेबे घर आयो , ऐ जठे बाई गवरजा , देवे हे आसीस्यों , ऐ बीरा म्हारा वधजो , बैल जोताईजो , ऐ भावज म्हारी जणजो , पूत सपूता , ऐ सातों ने सुपारी देसों , आठों ने पतासा , ऐ साल केरी सुई अम्मा , डालके रा बागा , ऐ झटपट सीऊ म्हारे भाई – भीतजो रा बागा , ऐ आवो रे भतीजों , थोरी भुवा लाई बागा , ऐ भुवा रे भरोसे , भतीजा रेयग्या नागा , ऐ नागा – नागा क्या करो , म्हे और सिवासों भागा ।

गणगौर के गीत

गणगौर उत्सव में गाए जाने वाले गीत


चुंदड़ी-

इये चून्दडली रो म्हारी गवरजा बाई ने कोड , ले दोनी ओ ब्रम्हादत्तजी रा छावा चून्दड़ी , म्हेतो फिरि आया घिरी आया , राजा – राणी देस – परदेस कंटोड़े ने लाधी सवागण चून्दड़ी आ तो लाधी रे लाधी हेमाचलजी री प्रोळ ( हाट ) , ओढोनी ओ भरमलजी री बेनड़ , चून्दड़ी । इये चून्दडली . . . . .

(महिलाएं इसमें ब्रह्मा दत्त जी के नाम पर अपने ससुर जी का नाम और हिमाचल जी की जगह अपने पिताजी का नाम लेती है।)

दोपहर में गाए जाने वाले गीत और धींगा गवर माता की कहानी के लिए वेबसाइट देखें.. अधिक जानकारी के लिए रमक झमक के फेसबुक पेज से जुड़े

गुड़ला क्यों घुमाया जाता है इसके पीछे क्या कहानी है वह दातनिया देना क्या होता है जानिए नीचे दिए गए वीडियो में-

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शीतला अष्टमी ‘बास्योड़ा’ पूजन की पौराणिक कथा व पूरी जानकारी

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शीतलाष्टमी का त्योहार होली के बाद मनाया जाता है। कई जगह इसे बासौड़ा भी कहते हैं। ये हमें ऋतु परिवर्तन का संकेत भी देते है। इस त्योहार में शीतला माता की पूजा की जाती है और माता को बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसके लिए एक दिन पहले है घरों में भोजन बना लिया जाता है और अष्टमी के दिन माता के भोग लगाया जाता है।

शीतला माता वाले दिन गर्म खाना पीना निषेध है। इस दिन माता के मटके में पानी भरा ठंडा जल चढ़ाने व ठंडा भोजन चढ़ाने की परम्परा है, राजस्थान में बाजरे,गेहूं की रोटी, घाट, मीठी राबड़ी, खट्टी राबड़ी, दही, सांगरी सब्जी, ठंडा हलवा व पूड़ी चढ़ाने का रिवाज है।

इसे ठंडा खाना, बास्योड़ा, शीतला माता आदि के नाम से जाना जाता है। कई लोग होली से पूर्व भी एक दिन ठंडा करते है किसी भी ठंडे वार यानि सोम या गुरु को भी पूजन कर ठंडा खा लेते है । मान्यता है कि माता के ठंडा भोग चढ़ाने व ठंडा भोजन प्रशाद लेने से उनकी कृपा बनी रहती है, उनको उनके बच्चों को चेचक, आंकड़ा काकड़ा, माता नामक बीमारी नही होती। इस दिन माता की सवारी गधे की भी पूजा की जाती है।

16 मार्च को है शीतलाष्टमी

इस बार शीतला सप्तमी 15 मार्च को शुरू होगी। वहीं शीतला अष्टमी 16 मार्च को है। शीतला अष्टमी पर पूजा का मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक है।

शीतला अष्टमी 2020 सोमवार 16 मार्च 2020
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त -सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक
शीतला सप्तमी रविवार 15 मार्च 2020

Shitla mata

शीतला सप्तमी/अष्टमी का महत्व

मां शीतला हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं तथा गर्दभ की सवारी किए यह अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घंटकर्ण, त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु नाशक, रोगाणु नाशक, शीतल स्वास्थ्यवर्धक जल होता है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना स्तोत्र को शीतलाष्टक के नाम से व्यक्त किया गया है।

‘वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्। 
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

अर्थात् मैं गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूं। इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में झाड़ू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश में सभी तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है, अत: इसके स्थापन-पूजन से घर परिवार में समृद्धि आती है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र ‘शीतलाष्टक’ के रूप में प्राप्त होता है, इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने जनकल्याण के लिए की थी।

शीतला माता की पौराणिक कथा

एक गांव में ब्राह्मण दंपती रहते थे। दंपति के दो बेटे और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं को लंबे समय के बाद बेटे हुए थे। इतने में शीतला माता का पर्व आया। घर में पर्व के अनुसार ठंडा भोजन तैयार किया। दोनों बहुओं के मन में विचार आया कि यदि हम ठंडा भोजन लेंगी तो बीमार होंगी, बेटे भी अभी छोटे हैं। इस कुविचार के कारण दोनों बहुओं ने तो पशुओं के दाने तैयार करने के बर्तन में गुप-चुप दो बाटी तैयार कर ली।
सास-बहू शीतला की पूजा करके आई, शीतला माता की कथा सुनी। बाद में सास तो शीतला माता के भजन करने के लिए बैठ गई। दोनों बहुएं बच्चे रोने का बहाना बनाकर घर आई। दाने के बरतन से गरम-गरम रोटले निकाले, चूरमा किया और पेटभर कर खा लिया। सास ने घर आने पर बहुओं से भोजन करने के लिए कहा। बहुएं ठंडा भोजन करने का दिखावा करके घर काम में लग गई। सास ने कहा,”बच्चे कब के सोए हुए हैं, उन्हे जगाकर भोजन करा लो’..

बहुएं जैसे ही अपने-अपने बेटों को जगाने गई तो उन्होंने उन्हें मृत पाया। ऐसा बहुओं की करतूतों के फलस्वरुप शीतला माता के प्रकोप से हुआ था। बहुएं विवश हो गई। सास ने घटना जानी तो बहुओं से झगडने लगी। सास बोली कि तुम दोनों ने अपने बेटों की बदौलत शीतला माता की अवहेलना की है इसलिए अपने घर से निकल जाओ और बेटों को जिन्दा-स्वस्थ लेकर ही घर में पैर रखना।

अपने मृत बेटों को टोकरे में सुलाकर दोनों बहुएं घर से निकल पड़ी। जाते-जाते रास्ते में एक जीर्ण वृक्ष आया। यह खेजडी का वृक्ष था। इसके नीचे ओरी शीतला दोनों बहनें बैठी थीं। दोनों के बालों में विपुल प्रमाण में जूं थीं। बहुओं ने थकान का अनुभव भी किया था। दोनों बहुएं ओरी और शीतला के पास आकर बैठ गई। उन दोनों ने शीतला-ओरी के बालों से खूब सारी जूं निकाली। जूँओं का नाश होने से ओरी और शीतला ने अपने मस्तक में शीतलता का अनुभव किया। कहा, तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है,वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।

दोनों बहुएं एक साथ बोली कि पेट का दिया हुआ ही लेकर हम मारी-मारी भटकती हैं, परंतु शीतला माता के दर्शन हुए नहीं हैं। शीतला माता ने कहा कि तुम दोनों पापिनी हो, दुष्ट हो, दुराचारिणी हो, तुम्हारा तो मुंह देखने भी योग्य नहीं है। शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था।
यह सुनते ही बहुओं ने शीतला माताजी को पहचान लिया। देवरानी-जेठानी ने दोनों माताओं का वंदन किया। गिड़गिड़ाते हुए कहा कि हम तो भोली-भाली हैं। अनजाने में गरम खा लिया था। आपके प्रभाव को हम जानती नहीं थीं। आप हम दोनों को क्षमा करें। पुनः ऐसा दुष्कृत्य हम कभी नहीं करेंगी।

उनके पश्चाताप भरे वचनों को सुनकर दोनों माताएं प्रसन्न हुईं। शीतला माता ने मृत बालकों को जीवित कर दिया। बहुएं तब बच्चों के साथ लेकर आनंद से पुनः गांव लौट आई। गांव के लोगों ने जाना कि दोनों बहुओं को शीतला माता के साक्षात दर्शन हुए थे। दोनों का धूम-धाम से स्वागत करके गांव प्रवेश करवाया। बहुओं ने कहा,’हम गाँव में शीतला माता के मंदिर का निर्माण करवाएंगी।

चैत्र महीने में शीतला अष्टमी के दिन मात्र ठंडा खाना ही खाएंगी| शीतला माता ने बहुओं पर जैसी अपनी दृष्टि की वैसी कृपा सब पर करें। श्री शीतला मां सदा हमें शांति, शीतलता तथा आरोग्य दें।

शीतले त्वं जगन्माता

शीतले त्वं जगत् पिता।

शीतले त्वं जगद्धात्री

शीतलायै नमो नमः।।

|| बोलो श्री शीतला मात की जय ||

आप लगातार कथा, व्रत, मुहूर्त, सेवा, संस्कृति, धर्म से संबंधित जानकारी के लिए हमारे फेसबुक पेज रमक झमक को लाइक कर सकते हैं बहुत-बहुत धन्यवाद..

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सखी सखी में सूरज दिख्यो ? ज्योहीं टुठ्यो, सूरज रोटा कथा व्रत विधि

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होली दहन के बाद प्रथम रविवार को सूरज रोटे का व्रत होता है। भगवान सूर्य के लिये गेहूं के आटा से करीब 1 इंच मोटाई की रोटी हाथ से थप थपा कर बनाई जाती है जिसके सेंटर में एक छेद रख दिया जाकर पकाई/सेकी जाती है।
महिलाएं ये रोटा लेकर घर की छत या आंगन में जहां सूर्य अच्छे से दिखाई पड़ता है वहाँ से समूह के रूप में एकत्रित होकर अपना अपना रोटा लेकर उसमें से भगवान सूर्य के दर्शन करती है और अर्घ्य देती है। जब रोटे के बीच छेद से सूर्य के दर्शन करती है तो पास खड़ी औरत
पूछती है सखी सखी में सूरज दिख्यो ? जवाब में बोलती है दिख्यो ज्योहीं टुठ्यो, इस प्रकार सास ससुर रिश्तेदारों व गहनों आदि का नाम लिया जाता है।

सूरज रोटे की कहानी :-

दो माँ बेटी थी, दोनुं जण्या सूरज भगवान को व्रत करती, एक दिन माँ बोली कि में बारे जांउ तुं दो रोटा पो लिये बेटी दो रोटा पो लिया, एक जोगी भिक्षा मांग न आयो बा भिक्षा देवण लागी तो ली कोनी के मे तो रोटो लेवुं, बिरो रोटो सिक्यो कोनी, सो बा माँ के रोटे में से कोर तोड के दे दी माँ आई रोटे की कोर टुटयोडी देकर केवण लागी घी रोटे घी रोटे री कोर ला म्हारे सागी रोटे री कोर केवती-केवती गांव में फिरण लागगी बेटी डर के मारे पीपल के झाड पर चढर बेठगी चार-पाँच दिन हुं, गया सुरज भगवान ने दया आयी सुरज भगवान पाणी रो लोटो चुरमेरी बाटकी उण ने भेज दी, एक दिन राजा रो कंवर शिकार करण ने आयो और पीपल री ठण्डी छाया है, कोई ठण्डो पाणी पिवण ने देवे तो चोखो हुवे जणा बा छोरी उपरसू पाणी नाख्यो जणा पाछो राजा रो कंवर बोल्यो म्हने तो घणी भूख लागी है कोई खावण ने दे देवे तो चोखो हुवे, जणा बा छोरी उपरस्युं लाडु नाख्यो। राजा रे कंवर री भूख मिट गई कंवर खुद चढकर पते पते में देखण लाग्यो तो बिने दिखी बो बोल्यो कि तु कुण है भूत है कि प्रेत है, देवता है कि मानव है, जणा छोरी बोली म्हे मानव हूँ राजा रो कवंर छोरी ने पूछण लाग्यो कि तुं म्हारे सागे ब्याव करे कांई छोरी बोली राजाजी थे नगरी रा राजा म्हे एक अनाथ छोरी म्हारो तो कोई कोनी राजाजी मान्यो कोनी पडितान बुलाकर पिपल रे पेड रे नीचे फेरा फिरा कर ब्याव करके घरां गयो सुख से रेवण लागगा एक दिन बिकी माँ घी रोटी घी रोटी री कोर ला म्हारे सागी रोटे री कोर, करती करती जावे ही बेटी रुपर स्यूं देखली सिपाइया ने भेजर माँ न पकडकर एक कमरे मे बदं कर दी एक दिन राजाजी सगला कमरा री चाबी मांगी, या छ कमरा री चाबी तो दे दी सातवा कमरा री चाबी दी कोनी राजाजी हट करके सातवा कमरा री चाबी दी कोनी
राजाजी हट करके सातवा कमरा री चोबी ले ली कमरो खोल कर देखे तो आगे सोना री शिला पडी है राजाजी राणी ने पुछयो राणीजी ओ कांई राणी बोली म्हारे दुबला पोहर री भेंट है राजाजी बोल्या मने थारो पीयर देखणो है। राणी बोली राजाजी म्हारे कठे पीयर हे थे तो म्हाने पीपल के झाड के नीचे सुं लाया राजा जी हट करके बैठ गया जणा राणी सुरज भगवान सुं विनंती करी ओर सवा दिन को पीयर माग्यों। सूरज भगवान सपना में आपने राणी ने सवा पोर को पीयर बासो पीपल के झाड के नीचे दिया। राजा राणी, राणी रे पीयर गया सगला घणो ही लाड कोड करिया राजाजी ने धणो ही आनन्द हुयो राणी तो घरा चालण रो केवण लागी जणा राजा कियो कि इतो चोखो सांसरो है म्हे तो अठे रस्युं राणी हट करण लागगी, राजा राणी सीख भेर निकल्या, राजाजी आपरी पगारी मोचडी और घोडी रो ताजनो बठे ही भूल गया थोडा आगे गया जद ब्याने याद आयी, राजाजी पाछा फिरया जार देखे तो झाड रे नीचे मोचडी ओर घोडी रो ताजनो पडयो हो बाकी कुछ भी कोनी जणे राजाजी कियो राणी ओ कोई, जणा राणीजी बोली म्हारे पीर कोनी थो, सो में सुरज भगवान कने सवा पोर को पीर वासो मांग्यो म्हारी माँ रोटो खांडो हुयो जिके सुं गेली हुयगी वा नगरी में आयी ही, जणा म्हे उणाने कमरे में बंद कर दी उरी सोनारी शिला हुयगी, या सुण के राजा नगरी मेें ढिढोरो पिटवा दिया कि सगला कोई सुरज रोटे रो व्रत करियो, हे सुरज भगवान जिसो बिने पीर बासो दिया बिसो सबने दिया, कहत सुणत हुंकारा भरत आपणे सारे परिवार ने दिया म्हाने भी दिया।
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