षट्तिला एकादशी व्रत कथा

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भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा को समर्पित षटतिला एकादशी 20 जनवरी 2020 दिन सोमवार को है। इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने और भगवान की पूजा करने से धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति तो होती है, व्यक्ति को नर्क से मुक्ति के साथ मोक्ष भी मिलता है। उस व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात वैकुण्ठ की प्राप्ति भी होती है। षटतिला एकादशी के पूजा, स्नान आदि के समय काले तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। षटतिला एकादशी के दिन व्रत रखने वाले व्यक्तियों को षटतिला एकादशी कथा जरूर सुननी चाहिए। 

षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha):

षटतिला एकादशी की व्रत कथा इस प्रकार है, पुलस्‍त्‍य ऋषि ने यह कथा दालभ्य ऋषि से कही थी जो इस प्रकार है, एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से लोक कल्‍याण के लिए प्रश्‍न किया जिसके उत्‍तर में श्री भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि- हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसकी काया अत्‍यंत क्षीण व दुर्बल हो गई। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए अन्न या धन का दान नहीं किया था।

इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।

घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।

उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जय श्री कृष्ण

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