दानवीर व रंगबाजों का शहर- दम्माणी चौक बीकानेर

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बीकानेर शहर यात्रा (2)

दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है दम्माणी चौक। छतरी वाला पाटा और चौक को फ़िल्म यादगार में दिखाया गया फ़िल्म का गाना इसी चौक में फिल्माया गया। शहर के सबसे चहल-पहल वाले चौकों में दम्माणी चौक छतरी के पाटे तथा घर की छत पर छतरी हेतु प्रसिद्ध है। शहर के पुराने चौको में से दम्माणी चौक भी है जो कि 300-400 वर्षों का इतिहास अपने में समेटे हुए है।

दम्माणी चौक में ज्यादातर दम्माणी (माहेश्वरी) जाति के लोग तथा पुष्करणा ब्राह्मण जाति के लोग रहते है। दामोदर दास राठी को बोलचाल की भाषा में दम्मजी या दमणजी कहा जाता था। इन्हीं दम्मणजी के वंशज दम्माणी कहलाए। दामोदरजी के पांच पुत्र थे। लक्ष्मीचंद, विजयराम, हरदेव राम, मुरलीधर व मूलचंद। इन्ही से दम्माणियों की वंशवृद्धि हुई तथा लाल पत्थर की कलात्मक कारीगरी व भित्ती चित्रों से युक्त दामोदरजी के वंशजो के अनेक मकान आज भी चौक में देखे जा सकते है। दम्माणियों का व्यवसाय मुम्बई, कोलकाता तथा चैन्नई व नागपुर में होने के कारण उनके कई घर खाली पड़े है।
इस चौक के निवासियों ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति अर्जित की है। केन्द्रीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व कोषाध्यक्ष सोलापुर (महाराष्ट्र) के सांसद स्व. सूरज रतन दम्माणी, अमरीका में ब्रोकर राधाकिशन दम्माणी, प्रमुख व्यवसाई भैरव रतन दम्माणी तथा प्रसिद्ध ख्याल लेखक बच्छराज व्यास इसी चौक के है।

रम्मतों के प्रसिद्ध ख्याल बनाने वाले 95 वर्षीय बच्छराज व्यास ने चौक की स्थापना के बारे में बताया कि पहले यह चौक पुष्करणा समाज के व्यासों का था जो कालान्तर में दम्माणियों के अधिक संख्या में बसने के कारण व व्यासों का चौक अलग से स्थापित होने के कारण दम्माणियों का चौक कहलाने लगा। व्यासों का चौक कालान्तर में होने की प्रमाणिकता पर उन्होंने बताया कि आज भी चौक में होली व्यास जलाते है। व्यासों की गैवर दम्माणी चौक में बैठकर पारम्परिक गीत गाती है।
प्राचीन बीकानेर नगर का दम्माणी चौक सांस्कृतिक सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में अहम रखता है। अल सुबह शुरू होते चौक की हलचल देर रात तक बरकरार रहती है। दम्माणी चौक अपने अतीत में दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है। पहले चौक के हर घर के आगे पाटा (तख्त) लगा रहता था। पाटे पर सेठ-साहूकार बैठते थे। चौक में प्रतिदिन पानी का छिडकाव होता थ। सेठ के पास इत्र व गुलावजल चांदी के प्यालों में भरा रहता था। सेठों के चाकर गुलाबजल से मलमल का कपड़ा भरकर सेठों के लगाते थे। वहीं आगन्तुकों का इत्र लगाकर व काजू, किशमिश तथा बादाम आदि सूखे मेवों से स्वागत किया जाता थ। पूरा चौक शाम को महक उठता था।
सेठ रईसाई के साथ हर गरीब व असहाय की मरण-परण में मदद किया करते थे। तख्त पर बैठकर ही मौहल्ले की समस्याओं व लोगों के आपसी विवाद को सुलझा दिया जाता था। दम्माणी चौक में प्रतिवर्ष सावन की तीज व चौथ में लगने वाले मेले को शुरू करवाने वाले तथा ऐतिहासिक छतरी का पाटा निर्माण करवाने वाले सेठ चम्पालाल व छगनलाल दम्माणी की तत्कालीन रियासत में भी अच्छी पैठ थी। कहा जाता है कि महाराजा गंगासिंह को राजगद्दी दिलाने में भी सेठ छगनलाल दम्माणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पानी की झरी व एक छाता वाले नौकर को हर वक्त साथ रखते थे। सेठजी को पूछते थे कि हर वक्त झारी और छाता साथ क्यां रखते है तो वह कहते थे कि ‘मेह (वर्षा) व मोत रो क्या भरोसो कद आ जाए’।
इन्होंने ही तत्कालीन वायसराय की पत्नी के जरिए गंगासिंह जी को गद्दी दिलवाने का आग्रह किया था। मेयो कॉलेज में गंगासिंहजी के शिक्षण के समय चौथे व हर छठे माह बेशकिमती पौशाक बनवाकर भेजने आदि का खर्चा इन्होने ही उठाया था। इसलिए गंगासिंहजी सेठजी को चाचा का सम्मान देते थे। सेठजी के घर मिलने आने पर केवल चार रूपए की नजर ले लेते थे जबकि अन्य सेठों के यहां जाने पर वे चांदी के रूपयों की गद्दी पर बैठते थे।

Chhota Gopal Ji Temple

Chhota Gopal Ji Mandir Dammani Chowk Bikaner


महाराजा ने सेठ चम्पालाल, छगनलाल व मदन गोपाल दम्माणी को मानद न्यायाधीश का सम्मान दे रखा था। ये सेठ किसी को भी छः माह तक कारावास की सजा दे सकते थे। अमुमन कैदी को अपने घर में ही छः माह की सजा देने वाले ये सेठ कैदी के परिवार का सारा खर्च सजा के दौरान उठाते थे। सेठ छगनलाल की खासियत थी कि सिर को मुंडाए उनके घर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वे 51 रूपए देते थे।
चौक की ऐतिहासिक घटना की विक्रम संवत 1935 में डूम (दमामी) को जागों मानने के राजा के आदेश पर सभी दम्माणी शहर छोड़कर रवाना हो गए थे। घटना के अनुसार सीधे-सादे धार्मिक प्रवृति के दम्माणियों के वंशावली रखने का कार्य राजदरबार के लोग करते थे। महाराजा ने डूम जाति के लोगों को वंशावली रखने के लिए मनोनीत कर दिया। इस पर दम्माणियों ने राजा से शिकायत की लेकिन राजा के नहीं मानने पर सभी ने बीकानेर नगर छोड़ने का फैसला कर दिया। निर्धारित तिथि पर दम्माणी बैलगाडि़यों व ऊंट गाडि़यों पर सामान रखकर रवाना हो गए।
दम्माणियों के पलायन पर राजमाता ने जूनागढ़ की छत से देखा और दरबारियों से पूछा कि आज कोई मेला तो नहीं फिर ये लोग कहा जा रहे है। पता करने पर उन्हे जब घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने तत्काल राजा को अपना आदेश वापस लेने व दम्माणियों के पलायन को रोकने के आदेश दिए। भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त लक्ष्मीचंद दम्माणी की सेवा (पूजा का कक्ष) उठने की सूचना पर राजमाता ने देशनोक तक राजा को भेजकर पलायन करते लोगों को वापस बुलाया। लक्ष्मीचंद दम्माणी के घर आज भी वह सेवा (पूजा का कक्ष) विद्यमान है। कहा जाता है कि दम्माणियों के चौक में सावन की तीज व चौथ को लगने वाले मेले की शुरूआत सेठ छगन लाल ने ही करवाई थी। वे मेले मे आने वाले हर बैल व अन्य गाड़ी वाले को एक रूपया, नित्य गायों का सुबह कुतर, कबूतरो को दाना तथा रात को गुड़ खिलाते थे। गायों को गुड़ तथा कुतर देने की परम्परा आज भी कायम है।
नगर में सबसे बड़े चौकों में एक होने के कारण यहां आचार्य तुलसी, स्वतंत्रता सेनानी अरूणा आसिफ अली, डॉ. करणी सिंह, स्वामी रामसुख दास जी, राम राज्य परिषद के प्रबल ब्रह्मचारी आदि अनेक प्रतिष्ठित लोगों की जनसभाएं बड़े पैमाने पर हो चुकी है। ब्रह्मचारी की सभा में चारों पीठ के शंकराचार्य आए थे। इसके अलावा चौक में सत्यनारायण, हरीओम तत्सत व कथा व रामलीलाएं भी वर्षों तक होती रही।
चौक में बड़ा गोपाल जी का मंदिर, मूंधड़ो, पुष्करणा समाज के कीकाणी व लालाणी व्यासों के कुलदेव के रूप में पूज्य है। मेजर किशन चंद व्यास के युद्ध में भाग लेकर लौटने पर मायलपुर नवाब के मेजर त्रिलोकचंद व्यास ने चांदी का सिंहासन मंदिर मे चढ़ाया था जो आज भी सुरक्षित है।
विक्रम संवत 1901 में शुरू हुआ लोहड़ी तीज का मेला पिछले एक-डेढ दशक से अपनी अस्मिता खो रहा है। दम्माणियों के चौक के साथ पास के चौक में मूंधड़ों व जस्सोलाई तलाई क्षेत्र तक पूर्व में मेला भरता था। खानपान खिलौने अिद की अनेक दुकाने लगती थी।
Bikaner Inside City

Famous Chhota Gopal ji Temple in Dammani Chowk Bikaner


दम्माणियों के चौक की होली भी प्रसिद्ध है। पुष्करणा ब्राह्मणों के कीकाणी व्यास, माहेश्वरी डागा, पुष्करणा समाज के रंगा व बिस्सा जाति के लोगों की उपस्थिति में होली जलाई जाती है। मिडोजी दम्माणी, बच्छाराज व्यास आदि के घरों में घूलंड़ी के दिन आज भी कुंआरा युवक दुल्हा बनकर गाजे-बाजे व बारातियों के साथ तोरण पर आता है। धूलंड़ी के दिन शाम को प्रायः सभी होली के मतवाले गीतों को रचने वाली टोलियों, बारह गुवाड़ व अन्य समाज की गेवरों के आने से पूरा चौक भर जाता है।
होली की प्रथम रम्मत ‘रजिया बाबा की रम्मत’ दम्माणियों के चौक में वर्षों से होती रही है, पिछले कुछ वर्षों मे रम्मत के नाम पर केवल अखाड़ा मात्र लगता है। पहले चौक में दम्माणी स्वांग मेरी की रम्मत करवाते थे। रम्मत के लिए ही छतरी के पाटे का निर्माण करवाया गया। उस वक्त की रम्मत की नजाकत ही अलग थी। पूरा चौक रम्मत के दिन दुल्हन की तरह सजाया जाता था। ख्याल, चौमासा व लावणी के साथ लोकनृत्यों की जमघट रातभर रहती थी। पहलवान रजिया उस्ताद ने रम्मत परम्परा को संबल दिया। इसी कारण पिछले 60-70 वर्षों से चौक में होने वाली रम्मत को रजिया उस्ताद की रम्मत कहा जाने लगा।
धार्मिक दृष्टि से अग्रणी इस चौक में वर्षों से महंतो में एक की गद्दी रहा है। महंत की गद्दी रहने के कारण अनेक साधू-सन्यासी दम्माणियों के चौक में कार्तिक पूर्णिमा के दिनों में कोलायत आने पर व अन्य दिनों में धुनी रमाते थे। मंदिर के एक परिसर में कई वर्षों तक वेद विद्यालय चला वहीं मंदिर के एक हिस्से में सार्वजनिक वाचनालय का संचालन कीकाणी व्यासों के चौक के युवकों द्वारा किया गया।
दम्माणी चौके में जन्मे स्व. रतन दम्माणी ने विक्रम संवत 1902 में प्रसूतिगृह, 1965 में फतेहचंद बालिका विद्यालय, सूरत दम्माणी के भाई व प्रमुख व्यवसायी भैरव दम्माणी ने यात्रीगृह व गोपीनाथ भवन परिसर में निःशुल्क होमियो चिकित्सालय का संचालन कर समाज सेवा में अनुकरणीय कार्य किया है।
दम्माणी चौक –
शहर के सबसे चहल-पहल वाले चौकों में दम्माणी चौक छतरी के पाटे तथा घर की छत पर छतरी हेतु प्रसिद्ध है। शहर के पुराने चौको में से दम्माणी चौक भी है जो कि 300-400 वर्षों का इतिहास अपने में समेटे हुए है।
दम्माणी चौक में ज्यादातर दम्माणी (माहेश्वरी) जाति के लोग तथा पुष्करणा ब्राह्मण जाति के लोग रहते है। दामोदर दास राठी को बोलचाल की भाषा में दम्मजी या दमणजी कहा जाता था। इन्हीं दम्मणजी के वंशज दम्माणी कहलाए। दामोदरजी के पांच पुत्र थे। लक्ष्मीचंद, विजयराम, हरदेव राम, मुरलीधर व मूलचंद। इन्ही से दम्माणियों की वंशवृद्धि हुई तथा लाल पत्थर की कलात्मक कारीगरी व भित्ती चित्रों से युक्त दामोदरजी के वंशजो के अनेक मकान आज भी चौक में देखे जा सकते है। दम्माणियों का व्यवसाय मुम्बई, कोलकाता तथा चैन्नई व नागपुर में होने के कारण उनके कई घर खाली पड़े है।
इस चौक के निवासियों ने राष्ट्रीय ही नहीं अर्न्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति अर्जित की है। केन्द्रीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व कोषाध्यक्ष सोलापुर (महाराष्ट्र) के सांसद स्व. सूरज रतन दम्माणी, अमरीका में ब्रोकर राधाकिशन दम्माणी, प्रमुख व्यवसाई भैरव रतन दम्माणी तथा प्रसिद्ध ख्याल लेखक बच्छराज व्यास इसी चौक के है।
रम्मतों के प्रसिद्ध ख्याल बनाने वाले 95 वर्षीय बच्छराज व्यास ने चौक की स्थापना के बारे में बताया कि पहले यह चौक पुष्करणा समाज के व्यासों का था जो कालान्तर में दम्माणियों के अधिक संख्या में बसने के कारण व व्यासों का चौक अलग से स्थापित होने के कारण दम्माणियों का चौक कहलाने लगा। व्यासों का चौक कालान्तर में होने की प्रमाणिकता पर उन्होंने बताया कि आज भी चौक में होली व्यास जलाते है। व्यासों की गैवर दम्माणी चौक में बैठकर पारम्परिक गीत गाती है।
Dammani Chowk Bikaner

Dammani Chowk Bikaner


प्राचीन बीकानेर नगर का दम्माणी चौक सांस्कृतिक सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में अहम रखता है। अल सुबह शुरू होते चौक की हलचल देर रात तक बरकरार रहती है। दम्माणी चौक अपने अतीत में दानवीर व मनमौजी सेठों की रंगबाजियों के किस्सों के लिए प्रसिद्ध रहा है। पहले चौक के हर घर के आगे पाटा (तख्त) लगा रहता था। पाटे पर सेठ-साहूकार बैठते थे। चौक में प्रतिदिन पानी का छिडकाव होता थ। सेठ के पास इत्र व गुलावजल चांदी के प्यालों में भरा रहता था। सेठों के चाकर गुलाबजल से मलमल का कपड़ा भरकर सेठों के लगाते थे। वहीं आगन्तुकों का इत्र लगाकर व काजू, किशमिश तथा बादाम आदि सूखे मेवों से स्वागत किया जाता थ। पूरा चौक शाम को महक उठता था।
सेठ रईसाई के साथ हर गरीब व असहाय की मरण-परण में मदद किया करते थे। तख्त पर बैठकर ही मौहल्ले की समस्याओं व लोगों के आपसी विवाद को सुलझा दिया जाता था। दम्माणी चौक में प्रतिवर्ष सावन की तीज व चौथ में लगने वाले मेले को श्ुरू करवाने वाले तथा ऐतिहासिक छतरी का पाटा निर्माण करवाने वाले सेठ चम्पालाल व छगनलाल दम्माणी की तत्कालीन रियासत में भी अच्छी पैठ थी। कहा जाता है कि महाराजा गंगासिंह को राजगद्दी दिलाने में भी सेठ छगनलाल दम्माणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पानी की झरी व एक छाता वाले नौकर को हर वक्त साथ रखते थे। सेठजी को पूछते थे कि हर वक्त झारी और छाता साथ क्यां रखते है तो वह कहते थे कि ‘मेह (वर्षा) व मोत रो क्या भरोसो कद आ जाए’।
इन्होंने ही तत्कालीन वायसराय की पत्नी के जरिए गंगासिंह जी को गद्दी दिलवाने का आग्रह किया था। मेयो कॉलेज में गंगासिंहजी के शिक्षण के समय चौथे व हर छठे माह बेशकिमती पौशाक बनवाकर भेजने आदि का खर्चा इन्होने ही उठाया था। इसलिए गंगासिंहजी सेठजी को चाचा का सम्मान देते थे। सेठजी के घर मिलने आने पर केवल चार रूपए की नजर ले लेते थे जबकि अन्य सेठों के यहां जाने पर वे चांदी के रूपयों की गद्दी पर बैठते थे।
महाराजा ने सेठ चम्पालाल, छगनलाल व मदन गोपाल दम्माणी को मानद न्यायाधीश का सम्मान दे रखा था। ये सेठ किसी को भी छः माह तक कारावास की सजा दे सकते थे। अमुमन कैदी को अपने घर में ही छः माह की सजा देने वाले ये सेठ कैदी के परिवार का सारा खर्च सजा के दौरान उठाते थे। सेठ छगनलाल की खासियत थी कि सिर को मुंडाए उनके घर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वे 51 रूपए देते थे।
चौक की ऐतिहासिक घटना की विक्रम संवत 1935 में डूम (दमामी) को जागों मानने के राजा के आदेश पर सभी दम्माणी शहर छोड़कर रवाना हो गए थे। घटना के अनुसार सीधे-सादे धार्मिक प्रवृति के दम्माणियों के वंशावली रखने का कार्य राजदरबार के लोग करते थे। महाराजा ने डूम जाति के लोगों को वंशावली रखने के लिए मनोनीत कर दिया। इस पर दम्माणियों ने राजा से शिकायत की लेकिन राजा के नहीं मानने पर सभी ने बीकानेर नगर छोड़ने का फैसला कर दिया। निर्धारित तिथि पर दम्माणी बैलगाडि़यों व ऊंट गाडि़यों पर सामान रखकर रवाना हो गए।
दम्माणियों के पलायन पर राजमाता ने जूनागढ़ की छत से देखा और दरबारियों से पूछा कि आज कोई मेला तो नहीं फिर ये लोग कहा जा रहे है। पता करने पर उन्हे जब घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने तत्काल राजा को अपना आदेश वापस लेने व दम्माणियों के पलायन को रोकने के आदेश दिए। भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त लक्ष्मीचंद दम्माणी की सेवा (पूजा का कक्ष) उठने की सूचना पर राजमाता ने देशनोक तक राजा को भेजकर पलायन करते लोगों को वापस बुलाया। लक्ष्मीचंद दम्माणी के घर आज भी वह सेवा (पूजा का कक्ष) विद्यमान है। कहा जाता है कि दम्माणियों के चौक में सावन की तीज व चौथ को लगने वाले मेले की शुरूआत सेठ छगन लाल ने ही करवाई थी। वे मेले मे आने वाले हर बैल व अन्य गाड़ी वाले को एक रूपया, नित्य गायों का सुबह कुतर, कबूतरो को दाना तथा रात को गुड़ खिलाते थे। गायों को गुड़ तथा कुतर देने की परम्परा आज भी कायम है।
नगर में सबसे बड़े चौकों में एक होने के कारण यहां आचार्य तुलसी, स्वतंत्रता सेनानी अरूणा आसिफ अली, डॉ. करणी सिंह, स्वामी रामसुख दास जी, राम राज्य परिषद के प्रबल ब्रह्मचारी आदि अनेक प्रतिष्ठित लोगों की जनसभाएं बड़े पैमाने पर हो चुकी है। ब्रह्मचारी की सभा में चारों पीठ के शंकराचार्य आए थे। इसके अलावा चौक में सत्यनारायण, हरीओम तत्सत व कथा व रामलीलाएं भी वर्षों तक होती रही।
Bikaner Dammani Chowk

Famous Paata Dammani Chowk


चौक में बड़ा गोपाल जी का मंदिर, मूंधड़ो, पुष्करणा समाज के कीकाणी व लालाणी व्यासों के कुलदेव के रूप में पूज्य है। मेजर किशन चंद व्यास के युद्ध में भाग लेकर लौटने पर मायलपुर नवाब के मेजर त्रिलोकचंद व्यास ने चांदी का सिंहासन मंदिर मे चढ़ाया था जो आज भी सुरक्षित है।
विक्रम संवत 1901 में शुरू हुआ लोहड़ी तीज का मेला पिछले एक-डेढ दशक से अपनी अस्मिता खो रहा है। दम्माणियों के चौक के साथ पास के चौक में मूंधड़ों व जस्सोलाई तलाई क्षेत्र तक पूर्व में मेला भरता था। खानपान खिलौने अिद की अनेक दुकाने लगती थी।
दम्माणियों के चौक की होली भी प्रसिद्ध है। पुष्करणा ब्राह्मणों के कीकाणी व्यास, माहेश्वरी डागा, पुष्करणा समाज के रंगा व बिस्सा जाति के लोगों की उपस्थिति में होली जलाई जाती है। मिडोजी दम्माणी, बच्छाराज व्यास आदि के घरों में घूलंड़ी के दिन आज भी कुंआरा युवक दुल्हा बनकर गाजे-बाजे व बारातियों के साथ तोरण पर आता है। धूलंड़ी के दिन शाम को प्रायः सभी होली के मतवाले गीतों को रचने वाली टोलियों, बारह गुवाड़ व अन्य समाज की गेवरों के आने से पूरा चौक भर जाता है।
होली की प्रथम रम्मत ‘रजिया बाबा की रम्मत’ दम्माणियों के चौक में वर्षों से होती रही है, पिछले कुछ वर्षों मे रम्मत के नाम पर केवल अखाड़ा मात्र लगता है। पहले चौक में दम्माणी स्वांग मेरी की रम्मत करवाते थे। रम्मत के लिए ही छतरी के पाटे का निर्माण करवाया गया। उस वक्त की रम्मत की नजाकत ही अलग थी। पूरा चौक रम्मत के दिन दुल्हन की तरह सजाया जाता था। ख्याल, चौमासा व लावणी के साथ लोकनृत्यों की जमघट रातभर रहती थी। पहलवान रजिया उस्ताद ने रम्मत परम्परा को संबल दिया। इसी कारण पिछले 60-70 वर्षों से चौक में होने वाली रम्मत को रजिया उस्ताद की रम्मत कहा जाने लगा।
धार्मिक दृष्टि से अग्रणी इस चौक में वर्षों से महंतो में एक की गद्दी रहा है। महंत की गद्दी रहने के कारण अनेक साधू-सन्यासी दम्माणियों के चौक में कार्तिक पूर्णिमा के दिनों में कोलायत आने पर व अन्य दिनों में धुनी रमाते थे। मंदिर के एक परिसर में कई वर्षों तक वेद विद्यालय चला वहीं मंदिर के एक हिस्से में सार्वजनिक वाचनालय का संचालन कीकाणी व्यासों के चौक के युवकों द्वारा किया गया।
दम्माणी चौके में जन्मे स्व. रतन दम्माणी ने विक्रम संवत 1902 में प्रसूतिगृह, 1965 में फतेहचंद बालिका विद्यालय, सूरत दम्माणी के भाई व प्रमुख व्यवसायी भैरव दम्माणी ने यात्रीगृह व गोपीनाथ भवन परिसर में निःशुल्क होमियो चिकित्सालय का संचालन कर समाज सेवा में अनुकरणीय कार्य किया है।

लेखक:- संजय श्रीमाली, उस्ताबारी, बीकानेर । फोटो:- विनोद पुरोहित ‘चिंटू’ व ए.के.चुरा

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