बेंत (डंडा) मार मेला, बेंत पड़ी तो ब्याव पक्का

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भारत परम्पराओं व मान्यताओं को मानने वाला देश है । कई तरह की मान्यताएं यहाँ प्रचलित हैं। यूं कहे कि दुनिया में सबसे ज्यादा मान्यताएं हमारे देश में ही हैं तो ये गलत नहीं होगा। आज हम आपको राजस्थान के मारवाड़ प्रांत खासकर सूर्य नगरी जोधपुर में मनाएं जाने वाले एक खास मेले के बारे में बताने जा रहे हैं।

जोधपुर अपनी मान्यताओं, परम्पराओं व सास्कृतिक विरासत के लिये प्रशिद्ध है । मेले मगरियो का शहर जोधपुर में एक ऐसा मेला लगता है जिसमें लड़कियां पूरी रात गली मोहल्लों में घूम घूम कर लड़को पर बेंत( लाठी )मारती है और इस बेंत की मार खाने वाले सिर्फ जोधपुर के ही नहीं होते बल्कि राजस्थान व अन्य प्रांतों से भी होते है और वो हजारों की संख्या में । लड़कियों/ तीजणियों से बेंत की मार खाने के पीछे एक मान्यता है। कहते है वैशाख कृष्णा तीज को धींगा भोलावनी पूजा के दिन अगर गवर (गणगौर)पूजने वाली लड़कियां/महिलाएं जिन्हें तीजणियां कहते है उनके हाथ से बेंत की मार जिस कुंवारे लड़के पर पड़ती है उसकी शादी एक साल यानी अगले मेले से पहले जरूर हो जाती है । इसलिये समस्त कुंवारे रात को मार खाने निकल पड़ते है। धींगा गवर का यह मेला ‘बेंत मार मेला’ के नाम से जाना जाता है। जोधपुर के लोग अपने भाई,भतीजे सगे सम्बन्धी जिसकी शादी नहीं हो रही हो,कुँवारा हो उसे वो उस दिन ‘बेंत मार’ मेले में बुलवा लेते है।
धींगा गवर की पूजा करने वाली सुहागिनें अपने हाथ में बेंत या डंडा ले कर देर रात निकलती हैं। वे पूरे रास्ते गीत गाती हुई और बेंत लेकर उसे फटकारती हुई चलती रहती हैं। शहर में धींगा गवर पूजने वाली महिलाएं पुलिस, डाकू, देवी, देवता,सन्त, हीरो, हीरोइन, भगवान, वकील व साधु आदि का स्वाँग धरकर पूरे शहर में जहाँ जहाँ गवरजा विराजमान है या स्टेज लगा है वहाँ वहाँ अपना प्रदर्शन करती है गीत गाती है। पूरे शहर में जगह जगह तीजणियों का स्वागत सत्कार होता है ।पूरा शहर रात को रोशनी से नहाया हुवा सा लगता है।गली-गली गीतों की स्वर लहरियों से माहौल देखते ही बनता है।

लड़कियों के बेंत की फटकार किसी को भी पड़ सकती है,चाहे वो नेता हो या प्रशासन का अधिकारी लेकिन खाश बात है कोई बुरा नहीं मानते। जितनी पिटाई उतनी शादी जल्दी होगी,ये सोच कर कुँवारे जान बूझकर उनके आगे से कई बार निकलते है। जिस कुंवारे की शादी हो जाती है वो अगले साल जोधपुर शहर में अपनी पत्नी के साथ धींगा गवरजा को धोक जरूर लगाता है ।

धींगा गवर की पूजा

विशेष रूप से मारवाड़ क्षेत्र में ही की जाती है। जोधपुर, नागौर और बीकानेर में धींगा गवर का उत्सव मनाया जाता है। अनुसार ईसर एवं गवर शिव और पार्वती के प्रतीक हैं, जबकि धींगा गवर को ईसर की दूसरी पत्नी या नाते आई हुई बताते है ।किवदंती के अनुसार धींगा गवर मौलिक रूप से एक भीलणी थी, जिसके पति का निधन उसकी यौवनावस्था में ही हो गया था और वो ईसर के नाते आ गई थी। इसलिए धींगा गवर चूंकि विधवा हो गई और उसे ईश्वर की कृपा से पुनः ईसर जैसे पति मिल गए, इसी तथ्य के मद्देनजर विधवाओं को भी इस त्योहार पर पूजन करने की छूट मिल गई।

बेंत मार मेला तर्क:
कहते है कि इस गवर भोलावनी को लड़कों को नहीं देखना चाहिये, इससे कुछ बुरा हो सकता है। कुछ कहते है कि कुँवारा देखता है तो शादी में समस्या आती है, शायद इसलिये तीजणियां गीत गाती, बेंत फटकारती हुई चलती थी जिससे युवा सावधान हो जाए और रास्ते से हट जाए,फिरभी कोई आ गया तो महिलाएं उन्हें बेंत फटकार कर भगाती थी, शायद यहीं आगे चलकर बेंत मारने की परम्परा के रूप में मेला परणित हो गया होगा ।

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