हनुमान जी के चरित्र से सीखे सफल भविष्य और हर समस्या का समाधान

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हनुमानजी से सीखे सफल कैरियर के गुण
(हनुमान जयन्ति विशेष)
(रमक झमक)
हनुमान जी का किरदार लोगों को बहुत कुछ सीखाता है, हर रूप में लोगों के लिए प्रेरणादायक है। हनुमान जी के बारे में तुलसीदास लिखते हैं, ‘संकट कटे मिटे सब पीरा,जो सुमिरै हनुमत बल बीरा’। यानी हनुमान जी में हर तरह के कष्ट (समस्या)को दूर करने की क्षमता है। आज हम आपको बता रहे हैं हनुमान जी के कुछ खास गुण, इन्हें अपनाकर अपनी परेशानियां दूर कर सकते हैं। आपके प्रोफेशनल जीवन में भी ये गुण काफी काम आएंगे:-

संवाद कौशलता

सीता जी से हनुमान पहली बार रावण की ‘अशोक वाटिका’ में मिले, इस कारण सीता उन्हें नहीं पहचानती थीं। एक वानर से श्रीराम का समाचार सुन वह आशंकित भी हुईं, परन्तु हनुमान जी ने अपने ‘संवाद कौशलता’ से उन्हें यह भरोसा दिला दिया की वह राम के ही दूत हैं। सुंदरकांड में इस प्रसंग को इस तरह व्यक्त किया गया हैः
‘कपि के वचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिंधु कर दास।।

समझ व चतुराई से हराना

हनुमान जी ने समुद्र पार करते समय सुरसा से लड़ने में समय नहीं गंवाया। सुरसा हनुमान जी को खाना चाहती थी। उस समय हनुमान जी ने अपनी समझ व चतुराई से पहले अपने शरीर का आकार बढ़ाया और अचानक छोटा रूप कर लिया। छोटा रूप करने के बाद हनुमान जी सुरसा के मुंह में प्रवेश करके वापस बाहर आ गए। हनुमान जी की इस चतुराई से सुरसा प्रसन्न हो गई और रास्ता छोड़ दिया। चतुराई की यह कला हम हनुमान जी से सीख सकते है ।

आदर्शों से कोई समझौता नहीं

लंका में रावण में हनुमान जी और मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध में मेघनाथ ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते, तो वह इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह ब्रह्मास्त्र का महत्व कम नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का तीव्र आघात सह लिया। हालांकि, यह प्राणघातक भी हो सकता था। तुलसीदास जी ने इस पर हनुमानजी की मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण किया हैः-

ब्रह्मा अस्त्र तेंहि साधा, कपि मन कीन्ह विचार।
जौ न ब्रहासर मानऊं, महिमा मिटाई अपार।।

अनावश्यक शक्ति व ज्ञान का बखान न करना ।
हम अक्सर अपनी शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन करते रहते हैं, कई बार तो वहां भी जहां उसकी आवश्यकता भी नहीं होती। हनुमान चालीसा में लिखा है-

सूक्ष्म रूप धरी सियंहि दिखावा,
विकट रूप धरी लंक जरावा।’

सीता के सामने उन्होंने खुद को लघु रूप में रखा, क्योंकि यहां वह पुत्र की भूमिका में थे, परन्तु संहारक के रूप में वह राक्षसों के लिए काल बन गए। एक ही स्थान पर अपनी शक्ति का दो अलग-अलग तरीके से प्रयोग करना हनुमान जी से सीखा जा सकता है ।

समस्या नहीं समाधान कैसे हो ये सोचे

जिस समय लक्ष्मण रण भूमि में मूर्छित हो गए, उनके प्राणों की रक्षा के लिए हनुमान जी पूरा पहाड़ उठा लाए, क्योंकि वह संजीवनी बूटी नहीं पहचानते थे। हनुमान जी यहां हमें सिखाते हैं कि मनुष्य को शंका स्वरूप नहीं, वरन समाधान स्वरूप होना चाहिए।उन्होंने सिर्फ इतना सोचा कि इस पहाड़ में संजीवनी है बस,इससे समाधान हो जाएगा समस्या का चाहे पहाड़ जैसी हो समाधान उसमें ढूढने से मिल जाता है ।


बड़ो को श्रेय देना, अपनी बड़ाई खुद न करना ।

सीता जी का समाचार लेकर सकुशल वापस पहुंचे श्री हनुमान की हर तरफ प्रशंसा हुई, लेकिन उन्होंने अपने पराक्रम का कोई किस्सा प्रभु राम को नहीं सुनाया। यह हनुमान जी का बड़प्पन था,जिसमे वह अपने बल का सारा श्रेय प्रभु राम के आशीर्वाद को दे रहे थे। प्रभु श्रीराम के लंका यात्रा वृत्तांत पूछने पर हनुमान जी जो कहा उससे भगवान राम भी हनुमान जी के आत्ममुग्धताविहीन व्यक्तित्व के कायल हो गए।


नेतृत्व क्षमता

समुद्र में पुल बनाते वक़्त अपेक्षित कमजोर और उच्चश्रृंखल वानर सेना से भी कार्य निकलवाना उनकी विशिष्ठ संगठनात्मक योग्यता का परिचायक है। राम-रावण युद्ध के समय उन्होंने पूरी वानरसेना का नेतृत्व संचालन प्रखरता से किया।

संयमित जीवन

हनुमान जी एक आदर्श ब्रह्मचारी थे। उनके ब्रह्मचर्य के समक्ष कामदेव भी नतमस्तक थे। श्री हनुमान के व्यक्तित्व का यह आयाम हमें ज्ञान के प्रति संयमित जीवन व समर्पण’ की शिक्षा देता है। इसी के आधार पर हनुमान जी ने अष्ट सिद्धियों और सभी नौ निधियों की प्राप्ति की।

ईश्वर आदर्श में विश्वास

हनुमानजी ने पूरे रामचरितमानस मानस एक संदेश दिया अपने आदर्श के प्रति हर स्थिति में वफादार बने, भगवान राम के प्रति हर स्थिति में उनका समर्पण व वफादारी देखने को मिली है।
(रमक झमक)

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