पुष्करणा सावा रीति रीवाज के पीछे गहरी सोच और तर्क

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विवाह के रीति रीवाज के पीछे गहरी सोच और तर्क

सगाई-

पुष्करण समाज के विवाह संस्कार में जो परंपराएं, रीति रीवाज बने है उसके पीछे एक गहरी सोच है, एक तर्क है, मनोविज्ञान है, आध्यात्मिकता है व सामुहिकता की सोच है। जब सगाई होती है तो लडकी वाले वर पक्ष के बडे बुजुर्ग को बोलते है `म्हारी बाई थोरे गोबर थापणने दी` विनम्रता का भाव देखने को मिलता है वहीं लडके के परिवार वाले ये कहते है आपने हमारे वंश को बढाने के लिए कन्या दी है इसलिए हम ऋणि है। देखिये दोनों परिवार के भाव में शब्दों में कितनी विनम्रता सगाई से ही शुरू हो जाती है।

खिरोडा-
खिरोडा में जब गोत्राचार की रस्म होती है तो दोनों परिवार के ननाणे दादाणे के बडे बुजुर्ग बैठ के सुनते है दरअसल इस रस्म में वर व वधु पक्ष के ननाणे दादाणे का पूरा परिचय जाति, गोत्र, इष्ट देव, देवी, कौनसी शाखा कौनसा वेद को मानने वाले है किसका पड दोहिता पड दोहिति किसका पडपौता किसकी पडपौति पूरे खानदान की जानकारी बोली जाती है। उस समय कन्या की माता वर को भगवान विष्णु मानकर उनके चरण कमल धोती है व माला पहनाती है प0 छोटूलालजी ओझा गौत्राचार व पापड बांचने के लिए सुविख्यात थे वे बींद बींदणी व सगे सगी के भी पापड बांचते थे पापड पापड हद बणियो मोय मोकली साजी इये रिश्ते सू श्रीमान सगाजी……….. और सगीजी………घणा घणा है राजी ।

दूध पाना आटी तानना-
वधु पक्ष की औरते औमतौर से भुआ या बडी सालियां आदि शादी से पहले खिरोडा कि रस्म से भी पहले दूध पिलाने व आटी तानने की रस्म निभाती है। आटी कच्चे सात रंग के सूत से बनी होती है जो वर को खडा करके सूत को पांव के अंगूठे से कान तक नाच नाप कर माला बनाई जाती है। इसके पीछे की सोच संभवत यह है कि गृहस्थ जीवन कच्चे सूत की तरह है जरा सी असावधानी से टूट सकता है, दूसरी सोच मनोविज्ञान भी है कि इस बहाने ससुराल की औरते व वर पक्ष के भाई बहन दोस्तों से हंसी मजाक व उनकी शहनसीलता की थाह लेना है।

पोखणा की रस्म-
पोखणा की रस्म में दरअसल बींद की परीक्षा होती है कि वह वास्तव में कितना स्वस्थ है छाती को पायल, बैल्ट से मापना यानि कितना सीने वाला है, सासुजी द्धारा नाक पकड कर अंदर ले जाना यानि वो कितनी देर तक श्वांष रोक सकता है उतना ही अधिक स्वस्थ है।

छींकी वर व वधु का स्वागत-
जब छींकी वधु की आती है तो वर पक्ष देवी लक्ष्मी या पार्वती मानकर कमला आई कमला आई गीत गाकर व वर पक्ष के स्वागत में वधु पक्ष की महिलाएं भगवान विष्णु या महादेव मानकर हर आयो हर आयो काशी रो वाशी आयो… गीत गाकर एक दूसरे को उच्चा स्थान सम्मान देती है।

बांसीजवारी-
विवाह के बाद वर वधु को निकटतम लोगों के यहां ले जाया जाता है। जहां उन्हें नारियल दिया जाता है इसके पीछे सोच संभवत यह है कि नवविवाहित एक दूसरे के परिवार व उनके निकटतम लोगों से परिचय हो जाये एक दूसरे को अच्छे से पहचान जाये ।

सगे सगे री जड, लगावणनै कूं कूं बजावण नै पूं पूं .. पुष्करणा समाज की ये परंपरा रीति रीवाज के पीछे इतनी गहरी सोच है और आज के संदर्भ में भी उसके मायने है सगे सगे री जड, लगावणनै कूं कूं बजावण नै पूं पूं जैसी सोच रखने वाले हमारे समाज की परंपरा और रीति रीवाज पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन समयाभाव के कारण आगे कभी लिख पाउगां आज जो भी लिखा है बडे बुजुर्गा से जानकारी व अपने विवेक से ही लिखा है कुछ रह गया हो तो मै प्रहलाद ओझा भैरूं रमक झमक में आगे सुधार करने का प्रयास करूंगा।

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