म्हारौ तेल बलै घी घाल, घुडलो घुमे छै जी घुमै छै

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गणगौर के दिनों में शीतला अष्टमी से शुरू होकर तीज तक गली गुवाड़ मे अविवाहित कन्याओं को घुड़ला लेकर घुमते हुए देखा जा सकता हैं । घुड़ला एक मिट्टी से बना बर्तन एक गले की तरह होता हैं जिसके अंदर मिट्टी बिछाई हुई रहती है और घी या तेल का दिपक जलाया जाता है । गणगौर के 7 दिन बाद से ही ऐसा नजारा देखा जा सकता हैं कि गवर पूजने वाली कन्याऐं शाम के वक्त घुड़ला लेकर निकलती हैं और आस-पास पड़ोस के घरों के आगे जाकर यह गीत गाती हैं –

म्हारौ तेल बलै घी घाल घुडलो घुमे छै जी घुमै छै ।
घुडलै रे बांध्यो सूत घुड़लो घूमे छै जी घूमे छै ।
सुुहागन बारै आय म्हारै घुड़ले मे आखा डाल । घुड़लो घूमे छै जी घूमे छै ।
ईषरदास जी रे जायो पूत, घुड़लो
म्हारो तेल बलै घी घाल, घुड़लो
सोने रो थाल बजाय, घुड़लो
मोत्यां रा आखा घाल, घुड़लो
साने टक्को घाल, घुड़लो
सुहागण बारै आय, घुड़लो
जाये रा लाडू लाय, घुड़लो
पीवर रो पीलो लाय, घुड़लो
म्हारो हाथ बलै घी घाल, घुड़लो
म्हारी रूई बलै रेषमदार, घुड़लो

सुहागिन औरतें घुड़ले मे उपहार के रूप में रूपये या अन्य चीज देती हैं जिसको गणगौर के बाद वाले दिन तालाब या पेड़ पर बधरा दिया जाता हैं और उपहार मे मिले रूपयो से गवर पूजने वाली कुंवारी कन्याऐं दावत करती हैं ।

आजकल बदलते समाज और सोच के चलते ऐसे नजारे दिखने सीमित हो गये हैं । जहां पहले आसपास रहने वाली गवर पूजने वाली कन्याऐं एक साथ मिलकर घुड़ला घुमाती थी वहीं अब यह सिर्फ अपने घर तक ही सीमित रह गया हैं ।

जानिये क्या है घुड़ले के पीछे की ऐतिहासिक घटना जल्द ही
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Radhey Krishan Ojha (8003379670)

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