पुष्करणा नाम कैसे पड़ा

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पुरात्व के आधार पुष्करणा समाज भारतवर्ष के अत्यंत प्राचीन समाजों में से एक है। एपीग्राकियां इंडिया और एक्सकवेसन पट राजघाट तथा विभिन्न शोध ग्रंथों के आधार पर इस समाज की प्राचीनता और मानव समाज को इसकी देन के प्रमाण उपलब्ध हैं पर कब से मंच गौड़ों की गुर्जर शाखा से अलग होकर देश देशान्तर में इन्होंने अपना अस्तित्व विस्तार किया यह अभी तक अनुसंन्धेय ही है। पौराणिक आख्यानों के आधार पर भृगु ऋषि के पुत्र गुर्जर के तृतीय पुत्र ऋचीक के पुत्र पुष्कर के वंशज ही पुष्करणा कहलाए।

एक अन्य उपाख्यान के आधार पर सैंधवारण्य ब्राह्मणों की आगरिस ऋषियों के शाप से मुक्त करने के लिए लक्ष्मी ने उन्हें उदार, संतोषी और ब्राह्मण धर्म को पुष्ट करने वाले ऐसे पुष्टिकर होने का वरदान दिया और वे पुष्करणा कहलाए कई विद्वान पौकरणा स्थान के नाम पर तथा अन्याय दंत कथाओं तथा कतिपय अन्य ग्रंथों के आधार पर विभिन्न मत प्रदर्शित करते हैं पर अभी तक कोई सुस्पष्ट और सर्वमान्य आधार भविष्य की खोज पर ही निर्भर करता है। कई लोग इष्टदेवी उष्ट्रवाहिनी मातेश्वरी के सहयो से मां-लक्ष्मी के श्रीमुख से निकले इन शब्दों से हुआ :

वेदवेदांग तत्वज्ञा भविष्यथ द्विजर्षभा:।

उदार राज्य पूज्याश्च शुद्धा: संतोषिण: सदा।

ब्राह्मणानां पुष्किरा धम्र पुष्टिरा स्तथा।

ज्ञान पुष्टिकरास्तस्मात् पुष्करणाख्या भविष्यथा॥

अर्थात्-हे द्विजवर्य ! आप वेद और वेदाग के तत्व के ज्ञाता होवोगे, आपका व्यवहारोचित स्वभाव उदारमना होगा, आपकी राज्यवर्ग में प्रतिष्ठा बनी रहेगी-पूज्यनीय होवोगे-आपका मन शुद्ध और संतोषी सदासर्वदा बना रहेगा, समस्त ब्राह्मण समाज के ब्रह्मत्व को परिपुष्ट आप ही करोगे। धर्म की पुष्टि करने के और ज्ञान की पुष्टि करने के कारण आप इस देश में पुष्करणा नाम से विख्यात होवोगे।

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