पुष्करणा शादी ओलंपिक ‘सावा’

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पुष्करणा समाज ने लगभग सैंकडां वर्ष पहले सामूहिक विवाह का प्रारम्भ एक राजनैतिक समझौते से उत्पन्न स्थिति के कारण किया। इस समझौते के पीछे छिपी सामाजिक बौद्धिक क्षमता जो सामूहिकता के अर्थ को व्यापक रुप से समझती थी इसे अंगीकार किया साथ ही भविष्य पर सही नजर रखने वाले पुष्करणा ब्राह्मण समाज ने आर्थिक विषमता से फैलने वाली बुराईयों पर अंकुश लगाने की सोच व अन्य समाजों को भी नई दिशा देने की पहल की। एक जानकारी के मुताबिक इस सावे की शुरुआत जैसलमेर जिले में हुई जिसे व्यापक रुप और विस्तार पुष्करणा बाहूल्य बीकानेर ने दिया। सावे पर एक कहावत प्रचलित है-लगावण नैं कुंकू बजावणनैं पूंपूं-सगे-सम्बन्धी एक-दूसरे के कुंकू लगाते हुए शंख ध्वनि बारात में करते थे। बींद विवाह के समय पीताम्बर पहनकर खिड़किया पाग बांध कर पेवडी, किलंगी, मावाड़ व हाथ में लोहे का या आजकल चांदी का गेडिया लेकर लाल लोंकार की छाव में नंगे पांव भगवान विष्णु का रूप बनाकर शादी के लिए लक्ष्मी (दुल्हन) का वरण करने के लिए जाता है । वर्तमान में दूल्हों पर आधुनिकता का प्रभाव है जैसे बैण्ड बाजे, रथ, घोड़ी, सूट-बूट, डी.जे व आतिशबाजी । लेकिन समाज के लोग अभी भी इस पौराणिक परंपरा को बचाने में लगे हुए है, इसके लिए युवा पीढ़ी को इसका उद्देश्य व महत्व समझाकर इस और आकर्षित करने का प्रयास कर रहे है, इस प्रयासों के फलस्वरूप ही यह पौराणिक परंपरा आज भी कायम है । इसलिए आज भी सावे के दिन सेकड़ो शादियाँ बिना किसी तामझाम के हो रही है ।

पुष्करणा युवा शक्ति मंच व रमक झमक संस्था के पंडित छोटूलाल ओझा व प्रहलाद ओझा ‘भैरू’ द्वारा बारह गुवाड़ चौक में सावे के अवसर पर एक ही मंच सेवा व सुविधाए, पौराणिक सामग्री उपलब्ध करवाई जाती है तथा विष्णु गनवेशी दूल्हो का सम्मान व यात्रा पैकेज आदि देकर सम्मानित किया जाता रहा है ।

 

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